पवित्र बाइबल

नींव और नीतियों का चयन

उस गाँव में, जहाँ धूल के बादल हमेशा मौसम का हाल बताया करते थे, यूसुफ़ नाम का एक बूढ़ा किसान रहता था। उसकी झोंपड़ी पहाड़ी की तलहटी में थी, और हर सुबह जब सूरज की पहली किरण जैतून के पेड़ों के पत्तों को छूती, वह अपनी टूटी हुई चौखट पर बैठकर प्रार्थना करता। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। प्रार्थना के बाद वह अपने खेत की ओर चल पड़ा, जहाँ गेहूँ की बालियाँ पकने को तैयार थीं। रास्ते में उसका पड़ोसी, नादाब, मिल गया। नादाब का चेहरा तनाव से कठोर था।

“सुना है यूसुफ़,” नादाब ने आवाज़ में एक तीखापन लाते हुए कहा, “अराम का लड़का, वही जो नई नस्ल की भेड़ें लाया था, कल शाम शराब के नशे में अपने बाप से बदतमीज़ी से बोला। पूरा बाज़ार सुनता रहा। ऐसे दुष्ट को तो समुदाय से निकाल देना चाहिए।”

यूसुफ़ ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और एक गहरी सांस ली। हवा में गेहूँ की मीठी खुशबू तैर रही थी। उसने नादाब की आँखों में देखा, जहाँ क्रोध के साथ-साथ एक अजीब सा अभिमान भी था। “तुम्हारी अपनी भेड़ों का क्या हाल है, नादाब?” यूसुफ़ ने धीरे से पूछा। “कल ही तो देखा था, तुम्हारे बाड़े का दक्षिण वाला हिस्सा टूटा पड़ा है। कोई भेड़िया रात को आसानी से घुस सकता है।”

नादाब चौंका। वह दूसरे की निंदा में इतना खोया हुआ था कि अपनी झोंपड़ी की मरम्मत भूल गया था। उसकी आवाज़ नर्म पड़ी। यूसुफ़ ने आगे कहा, “हमारे गुरु कहते थे, दूसरे की आँख के तिनके को देखने से पहले, अपनी आँख के लट्ठे को निकाल लो। अराम का लड़का गलत कर सकता है, पर क्या उसके पिता का दुःख हमारे लिए प्रार्थना का विषय नहीं, निंदा का?”

नादाब बिना कुछ कहे अपने रास्ते चला गया। यूसुफ़ खेत में काम करने लगा। दोपहर तक, बादल छा गए। वह लौट रहा था तो रास्ते में तीन यात्री मिले। उनमें से एक, जिसके चेहरे पर एक उत्सुक, भोला भाव था, बोला, “बाबा, हम उस महागुरु के बारे में सुनकर आए हैं, जिसके बारे में कहा जाता है वह राज्य का रास्ता जानता है। क्या आप हमें उसकी शिक्षाओं के बारे में बता सकते हैं? हमें ज्ञान की बहुत भूख है।”

यूसुफ़ ने उन्हें अपनी झोंपड़ी में आमंत्रित किया। जब वे बैठे, तो उसने सूखे अंजीर और पानी परोसा। फिर वह बोला, “वह गुरु एक दृष्टांत देता था। कहता था, जो कोई उसकी बातें सुनकर उन पर चलता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान है जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। बारिश आई, बाढ़ आई, आँधियाँ चलीं, पर वह घर खड़ा रहा। और जो सुनकर नहीं चलता, वह उस मूर्ख के समान है जिसने रेत पर घर बनाया। बारिश और आँधियों ने उसे बहा दिया। उसका पतन भयानक हुआ।”

यात्रियों में से एक, जिसकी आँखों में एक तीखी चमक थी, बोला, “पर हमें तो चमत्कार चाहिए! ऐसे संकेत जो हमारा विश्वास दृढ़ करें। क्या आप कोई ऐसी बता सकते हैं?”

यूसुफ़ ने मुस्कुराते हुए अपनी हथेली में एक सूखा बीज दिखाया। “यह सरसों का दाना है। गुरु कहता था कि विश्वास इसी के समान होता है। तुम चमत्कारों की मांग करते हो, पर क्या तुम्हारे भीतर इतना छोटा सा विश्वास है? अगर है, तो तुम इस पहाड़ से कह सकते हो, ‘यहाँ से उठकर समुद्र में जा पड़,’ और वह ऐसा ही करेगा। पर सच्चा विश्वास दिखावे के लिए नहीं, एक निश्छल निर्मल हृदय से उपजता है।”

फिर उसने उन यात्रियों को एक और बात याद दिलाई। “सावधान रहना,” उसकी आवाज़ गंभीर हो गई, “झूठे भविष्यद्वक्ताओं से, जो भेड़ों के वस्त्र पहनकर तुम्हारे पास आते हैं, पर भीतर से वे रीढ़विहीन भेड़िए होते हैं। उन्हें तुम उनके फलों से पहचानोगे। क्या झाड़ी से अंगूर तोड़े जाते हैं? या ऊँटकटारे से अंजीर? हर अच्छा पेड़ अच्छा फल लाता है, बुरा पेड़ बुरा फल। जो अच्छा फल नहीं लाता, उसे काटकर आग में झोंक दिया जाता है।”

शाम ढलने लगी थी। यूसुफ़ उन्हें गाँव के बाहर तक छोड़ने गया। जाते-जाते सबसे चुप रहने वाला यात्री, एक जवान लड़का, मुड़ा और पूछा, “तो फिर, बाबा, स्वर्ग का राज्य पाने का रास्ता कितना आसान है?”

यूसुफ़ ने पहाड़ी की ओर इशारा किया, जहाँ से एक पतली, उबड़-खाबड़ पगडंडी गुज़रती हुई दिखाई दे रही थी, जबकि नीचे राजमार्ग चौड़ा और आसान था। “गुरु कहता था, प्रवेश करने का द्वार संकरा है, और रास्ता तंग है जो जीवन की ओर ले जाता है, और उसे पाने वाले थोड़े हैं। चौड़ा है वह द्वार और सुगम वह मार्ग जो विनाश की ओर ले जाता है, और उस पर चलने वाले बहुत हैं।”

वे यात्री चले गए। कई हफ़्ते बीत गए। एक रात भयानक तूफ़ान आया। बारिश कहर बनकर टूटी। यूसुफ़ की झोंपड़ी, जो सादगी से बनी थी पर उसकी नींव मज़बूत थी, झूठी नहीं थी, बची रही। पर गाँव के दूसरे छोर पर, एक धनी व्यापारी ने हाल ही में एक भव्य कुटिया बनवाई थी, बिना ज़मीन की सख़्त परत को जाँचे, सिर्फ़ दिखावे के लिए। वह कुटिया उस रात धंस गई, उसकी नींव के रेत हो जाने के कारण।

अगली सुबह, यूसुफ़ उसके खंडहर के पास खड़ा था। व्यापारी विलाप कर रहा था। यूसुफ़ ने कुछ नहीं कहा। उसने बस आँखें बंद कीं, और उस महागुरु के शब्द याद किए, जो उसने कभी स्वयं सुनें थे: “जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर चलता है, उसकी उपमा मैं उस बुद्धिमान पुरुष से दूँगा…”

हवा में गीली मिट्टी की खुशबू थी, और दूर, बादलों के पार, एक इंद्रधनुष उभर रहा था। रास्ता अब भी वही था – संकरा, कठिन, पर सच्चा। और यूसुफ़ जानता था कि चुनाव हर किसी को खुद करना होता है।

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