वह सुबह जैतून के पहाड़ की ढलानों से उतर रहा था, तो हवा में बसन्त की एक कोमल सुगंध थी। यरूशलेम नीचे दूर, धुंधली सुबह की रोशनी में चमक रहा था, मानो सफेद पत्थरों ने सूरज की पहली किरणों को पकड़ लिया हो। यीशु ने हमें रुकने को कहा। उसकी आँखों में एक गहरी, शांत दृढ़ता थी, वह दृढ़ता जो किसी बड़े निर्णय से पहले आती है।
“आगे जाकर गाँव में एक गधे का बच्चा बँधा हुआ मिलेगा,” उसने दो शिष्यों से कहा, उसकी आवाज़ शांत पर स्पष्ट थी। “उसे खोलकर ले आना। यदि कोई कुछ कहे, तो बस इतना कह देना – ‘प्रभु को इसकी आवश्यकता है।'”
हमने एक-दूसरे की ओर देखा। यह अजीब सा लगा – एक गधे का बच्चा? पर हम में से किसी ने प्रश्न नहीं किया। पतरस और यूहन्ना चले गए, और हम बाकी लोग झाड़ियों के पास बैठकर प्रतीक्षा करने लगे। मैंने देखा, यीशु की नजरें यरूशलेम पर टिकी थीं, पर उनमें विजय का उल्लास नहीं, एक विषाद-सा था, जैसे कोई अपने प्रिय के अंतिम दर्शन कर रहा हो।
थोड़ी देर में वे लौटे, एक छोटा, कोमल सा गधे का बच्चा उनके साथ था। लोगों ने अपने वस्त्र उसकी पीठ पर बिछा दिए, और यीशु धीरे से उस पर सवार हो गया। अब जब हम नगर की ओर बढ़े, तो एक अद्भुत घटना घटने लगी। रास्ते में लोग, शायद वे जो पिछले दिनों उसके चमत्कारों के गवाह बने थे या जिन्होंने उसके बारे में सुना था, अपने वस्त्रों को रास्ते में बिछाने लगे। कुछ पेड़ों की डालियाँ तोड़कर ला रहे थे, और वे हरी टहनियाँ भी मार्ग पर फैला देते। उनके चेहरों पर एक अकथनीय उम्मीद थी।
“होशाना!” उनका स्वर गूंज उठा। “धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है! धन्य है हमारे पिता दाऊद का आने वाला राज्य! होशाना सर्वोच्च में!”
गधे का बच्चा धीरे-धीरे कदम रखता जा रहा था, और उस पर सवार यीशु का चेहरा गंभीर था। यह विजय-यात्रा नहीं लग रही थी, बल्कि किसी भविष्यवाणी का साकार होना लग रहा था – वह प्राचीन भविष्यवाणी कि राजा नम्रतापूर्वक गधे के बच्चे पर सवार होकर आएगा। शोरगुल के बीच मैंने उसे एक बार मुड़कर पहाड़ की ओर देखते हुए देखा, मानो वहाँ छोड़कर आई शांति को याद कर रहा हो।
नगर में प्रवेश करते ही, उसने सब कुछ देखा, पर कुछ नहीं कहा। हम सीधे मंदिर की ओर गए। अब साँझ होने वाली थी, तो उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई और बाहर निकलकर बैतनिय्याह की ओर चल पड़ा। रास्ते में, उसने दूर से एक हरा-भरा अंजीर का पेड़ देखा। वह भूखा था। पर जब हम पेड़ के पास पहुँचे, तो उस पर पत्तों के अलावा कुछ नहीं था। फल का तो समय भी नहीं था।
तब उसने पेड़ से कहा, “अब से तुझ में कोई फल कभी न खाए।” उसकी आवाज़ में क्रोध नहीं, एक गहरी, निर्णायक निराशा थी, जैसे कोई किसी से सारी उम्मीद छोड़ दे। हम चकित रह गए। यह तो एक निर्जीव पेड़ था। पर पतरस ने भी कुछ नहीं कहा। हमारे मन में सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे।
अगले दिन फिर जब हम यरूशलेम जा रहे थे, तो वही अंजीर का पेड़ सचमुच जड़ से सूखा हुआ पड़ा था। पतरस चिल्लाया, “रब्बी! देखो, जिस अंजीर के पेड़ को तूने शाप दिया था, वह सूख गया है!”
यीशु ने हम सबकी ओर देखा। उसकी आँखों में एक शिक्षक वाली चमक थी। “परमेश्वर पर विश्वास रखो। मैं तुमसे सच कहता हूँ, यदि तुम्हारे मन में संदेह न हो, पर विश्वास हो, तो न केवल इस अंजीर के पेड़ के साथ ऐसा कर सकोगे, बल्कि यदि इस पहाड़ से कहो कि तू उठ और समुद्र में जा पड़, तो वह ऐसा ही करेगा। इसलिए जो कुछ तुम प्रार्थना में माँगो, विश्वास करो कि तुम्हें मिल गया, और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा।”
उसकी बातों का पूरा अर्थ हम उस समय नहीं समझ पाए। हम मंदिर पहुँचे। और वहाँ का दृश्य हम सबके लिए एक झटका था। बाहरी आंगन, जो सब देशों के लोगों के लिए प्रार्थना का स्थान होना चाहिए था, एक कोलाहल भरे बाजार में बदला हुआ था। बैल और भेड़ें रंभा रही थीं, कबूतरों के पिंजरे ऊँचे-नीचे टंगे थे, सर्राफे मेजों पर बैठकर सिक्कों की खनखनाहट के साथ लेन-देन कर रहे थे। धूप और गंदगी की गंध हवा में मिली हुई थी। यह प्रार्थना का स्थान नहीं, लूट का अड्डा बन गया था।
तब यीशु में एक परिवर्तन आया। वह शांत, धीर गुरु नहीं रहा। उसके चेहरे पर एक पवित्र क्रोध था, वह क्रोध जो अन्याय के सामने नम्र नहीं रह सकता। उसने मेजों को पलटना शुरू कर दिया। सर्राफों के सिक्के खनखनाते हुए इधर-उधर बिखर गए। कबूतरों के पिंजरे खुल गए और पंख फड़फड़ाते हुए पक्षी आकाश में उड़ गए। उसकी आवाज़ गर्जन की तरह गूंजी – “क्या लिखा है? ‘मेरा घर सब जातियों के लिए प्रार्थना का घर कहलाएगा।’ पर तुमने इसे ‘डाकुओं की खोह’ बना दिया है!”
वह सब कुछ रोकना चाहता था। धर्म के नाम पर चल रहे इस व्यापार को, इस ढोंग को। अधिकारी वहाँ खड़े थे, क्रोध से काँप रहे थे, पर भीड़ के चेहरे पर एक अलग ही भाव था – विस्मय, और शायद एक छिपी हुई संतुष्टि। वे सुन रहे थे, समझ रहे थे। और यीशु ने उन्हें सिखाना शुरू किया, वहाँ, उसी उलट-पलट के बीच में। बीमार और लंगड़े उसके पास आने लगे, और वह उन्हें चंगा करने लगा।
जब हम शाम को मंदिर से निकले, तो प्रमुख याजक और शास्त्री उसे मारने का उपाय ढूंढ रहे थे। पर वे भीड़ से डरते थे, क्योंकि सब लोग उसके उपदेश से चकित थे।
रास्ते में, पतरस ने फिर उस सूखे अंजीर के पेड़ की बात छेड़ी। यीशु ने कहा, “परमेश्वर पर विश्वास रखो। यदि तुम किसी भी बात में संदेह न करो, वरन विश्वास करो कि जो कहते हो वह हो जाएगा, तो वह तुम्हारे लिए हो जाएगा। और जब कभी प्रार्थना में खड़े होकर कुछ माँगो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी के विरुद्ध कुछ हो, तो क्षमा कर दो, ताकि स्वर्ग में तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे।”
उस दिन की घटनाएँ मेरे मन में गहरे उतर गईं। गधे के बच्चे पर सवार नम्र राजा, बिना फल के पेड़ को शाप, मंदिर से सौदागरों का खदेड़ा जाना – ये सब एक ही सत्य के टुकड़े थे। वह सत्य यह था कि बाहरी दिखावा, धार्मिक रीति-रिवाज, सब व्यर्थ हैं यदि हृदय में सच्ची आस्था, प्रार्थना और क्षमा का फल नहीं है। वह मंदिर को शुद्ध करने आया था, न कि केवल पत्थरों के मंदिर को, बल्कि हमारे हृदयों के मंदिर को भी। और वह अंजीर का पेड़, जो पत्तों से भरपूर था पर फल से रहित, हमारे ऊपर ही एक चेतावनी थी – कि दिखावे की हरियाली किसी काम की नहीं, यदि जीवन में विश्वास और करुणा का फल नहीं है।




