कोरिन्थ का बंदरगाह दोपहर की धूप में चमक रहा था। हवा में नमक और जहाजों के रस्सों की गंध, तेल और दूर कहीं सड़ते हुए फलों की मीठी-सड़ी महक मिली हुई थी। दमास्कस का लिनन बेचने वाला एक व्यापारी, लूकियस, अपनी दुकान के सामने बैठा एक पपीरस के टुकड़े पर गिनती कर रहा था। उसके कानों में शहर का शोर था—बढ़ई की हथौड़ी की आवाज, यूनानी दार्शनिकों के विद्यार्थियों का कलहंस, और कहीं से आती हुई स्त्रियों की बहस। पर उसका मन कहीं और था। उसने सुना था कि एफिसुस से कोई यहूदी शिक्षक आया है, जो एक सूली पर चढ़ाए गए मसीह की बात करता है। लूकियस के लिए, जिसने एथेंस में भी कुछ समय बिताया था और स्तोइक विचारों से परिचित था, यह एक और अजीब पंथ लगा। उसने सोचा, ‘क्या एक देवता, जो मर गया, किसी की मुक्ति कर सकता है? यह तो बेतुका है। मुक्ति तो ज्ञान से आती है, विवेक से, न कि किसी क्रूर बलिदान से।’
उसी शाम, उसका सौदा पक्का करने आए एक ग्रीक जहाज़ के कप्तान ने उससे कहा, “कल अक्विला और प्रिस्किला के घर पर उसी यहूदी, पौलुस का प्रवचन है। सुनने चलोगे? वह पढ़ा-लिखा है, तर्सस का। तुम्हारी बौद्धिक भूख शायद तृप्त हो।” लूकियस ने हामी भर दी, मन में एक उपहास भरी उत्सुकता लिए।
अगले दिन का वह सभाकक्ष भीड़ से खचाखच भरा था। हवा में जलते हुए तेल के दीपकों का धुआँ और मानवीय पसीने की गंध थी। पौलुस, जिसकी छवि लूकियस ने एक उग्र प्रचारक की बनाई थी, शांत, थोड़ा झुके कंधों वाला एक व्यक्ति निकला। उसकी आँखों में थकान थी, पर आवाज़ स्पष्ट और नियंत्रित। उसने कोई जटिल दार्शनिक प्रवचन नहीं दिया। वह अपने आगमन की कहानी सुनाने लगा—कैसे वह डर और काँपते हदय के साथ कोरिन्थ आया था, कैसे उसने फैसला किया कि वह शब्दों के जादू या बुद्धि के झमेले से उन्हें प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेगा। “मैंने तुम्हारे बीच यहूदी मसीह के सिवा और कुछ नहीं, बल्कि उसी के सूली पर चढ़ाए जाने का प्रचार करने का निश्चय किया,” उसने कहा।
लूकियस के मन में एक प्रश्न उठा—’यह सब? सिर्फ एक मृत्यु? कोई जीवन-दर्शन नहीं? कोई नैतिक नियमों की सूची नहीं?’ वह निराश हुआ। पर पौलुस आगे बोल रहा था, और उसकी बातें धीरे-धीरे हवा में तैरने लगीं, “मेरा प्रचार और मेरा संदेश ज्ञान की मनोहर बातें सुनाने पर आधारित नहीं था, बल्कि आत्मा और सामर्थ्य के प्रमाण पर आधारित था, ताकि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों की बुद्धि पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामर्थ्य पर टिका रहे।”
कुछ दिन बीते। लूकियस का व्यापार चल निकला, पर उन शब्दों ने उसे छोड़ा नहीं। एक दिन, जब वह एक अमीर एथेनियन व्यापारी से मिला, जो ज्ञान की बातों का शौकीन था, तो बातचीत में उसने पौलुस और सूली के मसीह का ज़िक्र किया। एथेनियन हँसा, “ओह, वह! उसने एथेंस में भी कोशिश की। अरेपगुस के बाज़ार में खड़ा होकर ‘अनजाने देवता’ की वेदी के बारे में बात करने लगा। कुछ मज़ाक उड़ाया, कुछ ने कहा ‘कभी और सुनेंगे’। कोई बात नहीं। ज्ञान की दुनिया में, प्रेम और बलिदान के संदेश बहुत सरल लगते हैं, बचकाने। हमें तो तर्क चाहिए, प्रमाण चाहिए।”
उस रात लूकियस नींद नहीं आई। वह अपने छत पर टहलता रहा। आकाश में तारे, यूनानी दर्शन जिनकी गति और स्वभाव को समझने का दावा करता था, चमक रहे थे। पर उसका अपना हृदय—एक अकेला, गिनतियों और सौदों से भरा हृदय—क्या कभी उन तारों के रचयिता को जान पाया था? पौलुस के शब्द फिर गूंजे—’परमेश्वर ने यह ज्ञान हम पर आत्मा के द्वारा प्रकट किया है… आत्मा सब बातें, यहाँ तक कि परमेश्वर की गहरी बातें भी जाँचती है।’
एक शनिवार को, वह यहूदियों की सभा के पास से गुज़रा। अंदर से कलह सुनाई दे रही थी। पौलुस वहाँ से निकला, उसके चेहरे पर निराशा थी, पर गहरी शांति भी। लूकियस ने अपने को अचानक उसके सामने खड़ा पाया। “शिक्षक,” उसकी आवाज़ अनायास निकल गई, “तुम्हारा संदेश… वह इतना सरल क्यों है? दुनिया जटिलता माँगती है।”
पौलुस ने उसे देखा। उसकी नज़रें थकी हुई थीं, पर उनमें एक अद्भुत स्पष्टता थी। “लूकियस, क्या तुमने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को जाना है, जो तुमसे प्रेम करता हो, बिना किसी शर्त के? उस प्रेम को समझाने के लिए तुम कितने तर्क जोड़ोगे? वह प्रेम तो बस है। परमेश्वर का प्रेम, उसका ज्ञान—वह मनुष्य की बुद्धि की उलझन में नहीं, बल्कि उस आत्मा में प्रकट होता है, जो हमें दी गई है। हम उन बातों को बताते हैं, जो आत्मा सिखाती है, और आत्मिक बातों को आत्मिक शब्दों में समझाते हैं।”
वह चला गया। लूकियस वहीं खड़ा रहा। उसने अपने जीवन के सारे तर्कों, सारी गणनाओं को, जैसे एक तख़्ती पर सजा हुआ देखा। वे सब खोखले लगे। उस रात, उसकी दुकान के पिछवाड़े में, उसने अपने सारे ज्ञान का घमंड, अपनी सारी बौद्धिक उपलब्धियाँ, एक तरफ रख दीं। और पहली बार, एक साधारण, निर्बल प्रार्थना की—’हे अज्ञात देवता, यदि तू है, और यदि तूने सूली पर अपना प्रेम प्रकट किया है, तो मेरे इस अंधे हृदय में प्रवेश कर। मेरी बुद्धि नहीं, मेरा यह हृदय तुझे चाहता है।’
कुछ हुआ। कोई आकाश नहीं फटा, कोई स्वर नहीं सुनाई दिया। पर जैसे किसी ने अंदर से एक दरवाज़ा खोल दिया हो। अचानक, पौलुस के वे सभी सरल शब्द—सूली, प्रेम, आत्मा—उसकी समझ में एक नई गहराई से उतरने लगे। यह कोई मानसिक सहमति नहीं थी; यह ऐसा था जैसे किसी ने उसे पहचान लिया हो, उसके सबसे अंधेरे कोने तक जान लिया हो, और फिर भी उसे ग्रहण किया हो। यह ज्ञान नहीं था; यह जानना था। और उस जानने में, एक शांति और सामर्थ्य था, जो उसके सारे दार्शनिक अध्ययनों से कहीं बढ़कर था।
लूकियस अब भी दमास्कस का लिनन बेचता था। पर जब कोई ग्राहक बुद्धि की बड़ी-बड़ी बातें करता, तो वह मुस्कुराता। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। वह जानता था कि सच्चा ज्ञान बाज़ार के विवादों में नहीं, बल्कि उस साधारण, गहरे प्रेम में है, जिसे परमेश्वर की आत्मा ने उसके हृदय के दरवाज़े पर दस्तक देकर प्रकट किया था। और यह, उसकी समझ में, सभी यूनानी ज्ञान और यहूदी चमत्कारों से बढ़कर था।




