पवित्र बाइबल

पौलुस की अंतिम विरासत

रोम की उस अंधेरी कोठरी में हवा ठंडी और गीली थी, जैसे दीवारों से हमेशा के लिए सिमट गई हो। पौलुस ने एक लम्बी सांस ली। उसकी सांस का धुआं मद्धिम चिराग की लौ के सामने ठहरा रहा। उसकी कलाई में पड़ी जंजीरें, हिलने पर एक सुनसान, धात्विक स्वर भर देतीं, जो इस एकान्त का एकमात्र संगीत था। मेज पर चमड़े का एक खाली स्क्रॉल पड़ा था, और एक दोषपूर्ण कलम। पर उसके मन के भीतर, शब्दों का एक तूफान उमड़ रहा था – उसके बेटे, उसके पुत्र तीमुथियुस के लिए।

उसकी आँखें बंद हुईं, और लूद्रकिया की उस छोटी सी कलीसिया की याद ताजा हो गई, जहाँ तीमुथियुस ने पहली बार अपना विश्वास कबूल किया था। उसकी दादी लोइस और माँ यूनिके के चेहरे स्पष्ट हो गए – उनकी झुर्रियों में लिखी वफादारी, उनकी मृदु आवाज़ में सुनाई गई कहानियाँ… दाऊद की वीरता, भजनकार का विलाप, यशायाह की भविष्यवाणियाँ। वे सब उस बालक के हृदय में बीज की तरह बोए गए थे। “पर अंत के दिनों में…” पौलुस ने धीरे से कहा, और कलम उठा ली। शब्द उसकी उंगलियों से स्याही में रिसने लगे, जैसे कोई घाव से रक्त स्रावित हो रहा हो।

“कठिन समय आएंगे,” उसने लिखा। और अचानक, वह रोम की गलियों में खड़ा हो गया, पर उसकी आँखें उन चेहरों को देख रही थीं जो अभी तक आए नहीं थे। उसने ऐसे लोग देखे – स्वयं को प्रेमी कहते हुए, पर स्वार्थ में डूबे; धन के मोह में अंधे, घमंड से फूले, ईश्वर-निंदक, माता-पिता की अवज्ञा करते, कृतघ्न, अपवित्र। प्रेम और क्षमा का स्थान कठोरता ले लेगी। दिखावे की धार्मिकता का ढोंग रचने वाले, सत्य की शक्ति से इनकार कर देंगे। वे कमजोर स्त्रियों के मन भरेंगे, उन्हें पाप के बोझ से दबा कर, हमेशा सीखते रहेंगे पर सत्य का ज्ञान कभी प्राप्त न कर पाएंगे। यान्नेस और यम्ब्रेस की तरह, जिन्होंने मूसा का विरोध किया था, ये भी सत्य के विरुद्ध खड़े होंगे। उनकी बुद्धि व्यर्थ होगी, उनका विश्वास नकली।

पौलुस ने लिखना जारी रखा। पर उसका हृदय भारी था। क्या तीमुथियुस, उसका वह शर्मीला, अक्सर बीमार रहने वाला पुत्र, ऐसे समय में टिक पाएगा? फिर उसे वे दिन याद आए – इकोनियुम में पत्थरवाह, लुस्त्रा में उसके शरीर से बहता खून, जहाँ लोग उसे मरा हुआ समझ कर बाहर फेंक दिए थे। समुद्र में डूबने का भय, डाकुओं का खतरा, झूठे भाइयों की छल-कपट… हर कदम पर खतरा। “मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ,” उसने लिखा, “पर प्रभु ने मुझे सबसे बचाया।” यह केवल इतिहास नहीं था, यह एक वसीयतनामा था। एक चेतावनी: जो मसीह यीशु में जीवन जीना चाहते हैं, उन्हें सताया जाएगा। बुरे लोग और ठग, और भी बुरे होते जाएंगे, धोखा देते हुए और धोखा खाते हुए।

उसने कलम रोकी, और अपने चारों ओर नज़र दौड़ाई। जेल की इस निर्जनता में, एकमात्र सत्य, एकमात्र स्थिर आधार क्या था? उसकी दृष्टि उस पुराने, घिसे-पिटे स्क्रॉल पर टिक गई, जो उसकी दूसरी मेज पर रखा था – शास्त्र। वह उठा, उसे हाथों में लिया। चमड़े का स्पर्श, उस पर लिखे अक्षर… यह केवि कागज नहीं था। यह जीवित था। उसे अपने युवाकाल की याद आई, गमलीएल के पास तोराह की शिक्षा, हर शब्द पर बहस, हर अक्षर का वजन। पर अब उस अध्ययन का एक नया, गहरा अर्थ खुल गया था। ये शास्त्र, ये पवित्र लेख… इनमें प्रबोधन छिपा था। मसीह की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शन। यही वह हल था जो सबसे कठिन मिट्टी को भी तोड़ सकता था।

वह वापस बैठा, और अंतिम शब्द लिखे, जैसे कोई पिता अपनी सारी सम्पत्ति, अपना सारा ज्ञान एकमात्र वारिस को सौंप रहा हो। “तेरा बचपन से पवित्र शास्त्र का ज्ञान है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने की बुद्धि दे सकता है। हर एक पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है… ताकि परमेश्वर का सेवक सिद्ध हो, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।”

स्याही सूख गई। पौलुस ने स्क्रॉल को सावधानी से लपेटा। बाहर, रोम की गलियों में दिन का शोर शुरू हो गया था – व्यापारियों की आवाज़, सैनिकों के कदमों की आहट। पर इस कोठरी में एक गहरी शान्ति थी। उसे पता था, उसका समय कम है। उसे पता था, वह जिस संसार की बात कर रहा था, वह आएगा। पर उसे यह भी पता था कि वह जो सत्य सौंप गया है, वह केवल एक पत्र नहीं है। यह एक जलती हुई मशाल है, जो एक हाथ से दूसरे हाथ में जाएगी, अंधेरे को चीरते हुए। उसने स्क्रॉल को एक विश्वसनीय सहयोगी के हाथों में दे दिया, जो इसे एफेसुस की उस लम्बी, धूलभरी सड़क पर ले जाएगा, जहाँ तीमुथियुस, एक नवयुवक अगुवा, अपनी कलीसिया की प्रतीक्षा कर रहा था – उस पिता की आखिरी चेतावनी और अमूल्य विरासत के साथ, जो उसे बताना चाहता था कि अंत के दिनों की सबसे गहरी निराशा में भी, एक शब्द, एक सत्य, एक पवित्र लेख, टिकने का आधार बन सकता है।

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