पवित्र बाइबल

अंधेरे में प्रकाश की खोज

वह शाम ठंडी थी, और हवा में सर्दी की एक झलक महसूस हो रही थी। अमर कुर्सी पर बैठा, खिड़की से बाहर देख रहा था जहाँ अँधेरा धीरे-धीरे पेड़ों को निगल रहा था। कमरे में केवल एक दीये की लौ टिमटिमा रही थी, जिसकी रोशनी दीवारों पर लंबी-लंबी परछाइयाँ बना रही थी। उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, वही पुरानी खालीपन की भावना जो उसे महीनों से सताए जा रही थी। धर्मगुरु से बातचीत के बाद भी, कुछ तो अधूरा सा लगता था, जैसे कोई चीज़ उसकी आत्मा के दरवाज़े पर दस्तक दे रही हो पर अंदर आने का रास्ता नहीं ढूँढ पा रही।

उसने मेज़ पर पड़े पुराने बाइबल के पन्ने पलटे। पत्र-यूहन्ना का पहला अध्याय। उसकी नज़र शब्दों पर टिक गई: “जो आदि से था, जिसे हम ने सुना, जिसे हम ने अपनी आँखों से देखा, जिसे हम ने देखा और हाथों से छुआ…” अमर ने आँखें मूँद लीं। कल्पना की। एक युवा यूहन्ना, बूढ़ा हो चुका, अपनी यादों में खोया। वह शायद किसी ठंडी शाम को, समुद्र के किनारे बैठा होगा, उस आवाज़ को याद कर रहा होगा जो उसने गलील की झील के किनारे सुनी थी। उस चेहरे को याद कर रहा होगा जो दया और सत्य से चमकता था। उन हाथों को याद कर रहा होगा जिन्होंने अंधों की आँखें खोली थीं। यह कोई सिद्धांत नहीं था, कोई ठंडा धर्मदर्शन नहीं – यह तो एक जीवित अनुभव था, गर्म और स्पर्शयोग्य।

अचानक अमर को अपना बचपन याद आ गया। दादी की गोद, जहाँ वह रात की कहानियाँ सुनता था। दादी कहती थीं, “बेटा, परमेश्वर प्रकाश है, और उसमें ज़रा भी अंधेरा नहीं।” तब वह समझता नहीं था। आज, इस एकांत कमरे में, वह उन शब्दों का भार महसूस कर रहा था। प्रकाश। सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि सब कुछ उजागर कर देने वाली एक निर्मल सच्चाई। वह अपने भीतर झाँका। वहाँ कितने कोने अँधेरे में थे? झूठ, जो उसने दफ़नाने की कोशिश की थी? वह ईर्ष्या, जो उसने अपने मित्र की सफलता पर महसूस की थी? वह स्वार्थ, जो प्रेम के वेश में छिपा था?

उसने आगे पढ़ा: “यदि हम कहें कि हमारे भीतर पाप नहीं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं…” अमर का गला सूख गया। धोखा। कितनी बार उसने यही किया था। अपने आप से, दूसरों से, और शायद परमेश्वर से भी। एक सफ़ेद झूठ यहाँ, एक आधा सच वहाँ। ऐसा करके वह खुद को सहज महसूस करता था, लेकिन आज उसे एहसास हुआ कि यह सहजता एक क़ैदखाना थी। अंधेरे में रहने का आदी मनुष्य, प्रकाश से डरता है क्योंकि प्रकाश उसे वैसा दिखा देगा जैसा वह है।

थोड़ी देर वह उठा और कमरे में टहलने लगा। दीये की लौ हिली, परछाइयाँ नाच उठीं। वह रुका। “पर यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करेगा…” क्षमा। यह शब्द इतना सरल लगता था, पर इसे ग्रहण करना इतना कठिन क्यों था? शायद इसलिए कि क्षमा माँगने के लिए पहले स्वीकार करना पड़ता है। और स्वीकार करने के लिए विनम्रता चाहिए। उसकी इच्छा नहीं थी, पर उसकी आत्मा तड़प रही थी।

अमर मेज़ के पास लौटा और घुटनों के बल बैठ गया। सिर झुकाया। पहली बार, बिना किसी बहाने के, बिना किसी सफ़ाई के, उसने अपने अंधेरे को नाम दिया। वे शब्द धीरे-धीरे, काँपते हुए फूटे। हर स्वीकारोक्ति के साथ, एक भार उतरता गया। ऐसा नहीं था कि तुरंत कोई आकाशीय प्रकाश फूट पड़ा, न ही कोई दिव्य आवाज़ हुई। बस, वही टिमटिमाती लौ, वही ठंडी हवा। पर कुछ बदल गया था। भीतर की वह जकड़न, जो उसे सालों से घेरे हुए थी, ढीली पड़ गई थी। ऐसा लगा जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया हो, जिस पर अब तक ताला लगा था।

वह उठा, और खिड़की के पास गया। बाहर अब पूरा अँधेरा था, पर आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। छोटे-छोटे प्रकाश के बिंदु, अंधकार के विशाल फैलाव में। वह मुस्कुराया। शायद यही बात थी। प्रकाश से मिलन का अर्थ यह नहीं था कि सब अंधेरा ग़ायब हो जाएगा। बल्कि, अंधेरे के बीच में भी प्रकाश के साथ चलना सीखना था। उसकी गलतियाँ, उसकी कमज़ोरियाँ – वे शायद बनी रहेंगी। पर अब वह उन्हें छिपाएगा नहीं। उन्हें स्वीकार करेगा, और उस प्रकाश की ओर लौटता रहेगा जो उन्हें शुद्ध कर सकता है।

उसने बाइबल का वह पन्ना बंद किया। रात अब भारी नहीं लग रही थी। वह एक साथ नाज़ुक और मज़बूत महसूस कर रहा था, जैसे बारिश के बाद की धूप में खिला फूल। आखिरी पंक्तियाँ उसकी साँसों में गूँज रही थीं: “यदि हम कहें कि हम ने पाप नहीं किया, तो उसे झूठा ठहराते हैं…” नहीं, वह अब झूठा नहीं ठहराना चाहता था। सच्चाई, चाहे वह कितनी भी कड़वी क्यों न हो, मुक्त करती है। और आज, इस सन्नाटे भरी शाम में, अमर ने पहली बार उस मुक्ति का स्वाद चखा था। धीरे-धीरे, प्रकाश की एक किरण ने अंधेरे को चीरना शुरू किया। नया दिन दूर नहीं था।

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