पवित्र बाइबल

वाचा और पिता की छाया

धूप चट्टानों पर पिघलती हुई सी प्रतीत हो रही थी। शफात्याह अपने पिता के तम्बू के सामने बैठा, उँगलियों से रेत में कुछ अनिश्चित आकृतियाँ बना रहा था। उसके मन में एक तूफान था, और वह तूफान उसकी अपनी ही एक वाचा, एक प्रतिज्ञा से उपजा था। कल रात, भाई-बहनों के बीच बातों के चढ़ते-चढ़ते, उसने कह दिया था कि वह अगले सात दिन तक कोई मीठी ताड़ का रस नहीं पिएगा, यहाँ तक कि सब्त के दिन भी नहीं। यह उसकी ओर से यहोवा को एक मन्नत थी, एक संकल्प। पर अब सुबह की स्पष्टता में, वह प्रतिज्ञा उसे एक बोझ लग रही थी।

उसकी बहन, नोमा, ने ताज़ा दबाया हुआ रस का प्याला उसकी ओर बढ़ाया। “ले लो, इतनी गर्मी में प्यास तो लगी होगी,” उसने कहा। रस की सुगंध ने उसके मन को दो भागों में बाँट दिया। एक भाग कह रहा था कि प्रतिज्ञा पवित्र है, दूसरा कह रहा था कि यह तो एक छोटी सी, अविवेकपूर्ण बात थी। उसने मना कर दिया, पर उसका चेहरा उदास था।

उसके पिता, एलीआब, जो तम्बू के प्रवेश पर एक खाल पर बैठकर चमड़े की मरम्मत कर रहे थे, ने उसकी ओर देखा। एलीआब की आँखें अनुभव से धुंधली थीं, पर उनमें एक गहरी पैठ थी। “तुम्हारा मन आज भारी है, पुत्र,” उन्होंने कहा, उंगलियाँ अभी भी सूई और धागे से काम कर रही थीं। “क्या बात है?”

शफात्याह ने सब कुछ कह सुनाया। रेत में बनी आकृतियाँ अब उलझी हुई लकीरों जैसी थीं। “मैंने एक मन्नत मानी थी, पिता। पर अब… अब लगता है यह मेरे बस की नहीं। मैं इसे निभा नहीं पाऊँगा। क्या यह पाप नहीं होगा?”

एलीआब ने काम रोक दिया। उनकी निगाह दूर, उस विशाल तम्बू पर टिक गई जो मण्डली के केंद्र में खड़ा था। “यहोवा ने मूसा के मुँह से हमें ऐसे ही मार्ग दिए हैं,” उन्होंने धीरे से कहा। “एक पुरुष जब वाचा बाँधे, तो उसे पूरी करनी ही होगी। उसके शब्द अटल हैं, जैसे इस रेगिस्तान की चट्टानें। पर एक स्त्री… या एक पुत्र जो अभी भी पिता के तम्बू में रहता है… उसकी वाचा पर उसके पिता या पति की सुन्नी हुई चुप्पी या अस्वीकार की छाया पड़ सकती है।”

वह चुप हुए, फिर बोले, “तुम अभी भी मेरे कुटुम्ब में हो, शफात्याह। तुम्हारे शब्द, तुम्हारी मन्नत, अगर मैं सुनते ही उसे रद्द कर दूँ, तो वह मान्य नहीं होगी। यहोवा तुम्हें क्षमा करेगा। पर अगर मैं चुप रहा… तो वह प्रतिज्ञा तुम पर बंध जाएगी, और तुम्हें उसका पालन करना होगा।”

हवा ने रेत की सतह पर हल्की लहर दौड़ा दी। शफात्याह ने पिता की ओर देखा। “तो… आप मेरी इस मन्नत को रद्द कर सकते हैं?”

“कर सकता हूँ,” एलीआब ने कहा। “पर पहले मुझे जानना होगा कि यह मन्नत किस भाव से मानी गई थी। क्या यह हठ था? या फिर यहोवा के प्रति एक सच्ची भक्ति का भाव? क्योंकि जो शब्द हम बोलते हैं, वे केवल हवा में नहीं मिल जाते। वे हमारी आत्मा से बँध जाते हैं।”

यह कहकर एलीआब उठे और तम्बू के भीतर चले गए। शफात्याह बाहर बैठा रहा। उसकी बहन नोमा ने रस का प्याला एक ओर रख दिया था। उसे अब एहसास हो रहा था कि उसकी जल्दबाज़ी के शब्दों का कितना वज़न था। यह कोई मामूली बात नहीं थी। यह उसके और उसके परमेश्वर के बीच एक वाचा थी, और उस वाचा में उसके परिवार का अधिकार भी सम्मिलित था। यह एक सूत था जो उसकी इच्छा, उसके कुटुम्ब के प्रमुख, और यहोवा से बँधा हुआ था।

दो दिन बीत गए। शफात्याह ने मीठे रस से दूरी बनाए रखी, पर अब वह कष्ट नहीं, बल्कि एक सीख बन गई थी। तीसरे दिन, संध्या के समय, जब सारे परिवार के सामने थोड़ी सी सूखी अंजीर और जौ की रोटी रखी थी, एलीआब ने उसकी ओर देखा।

“शफात्याह,” उन्होंने कहा, “तुम्हारी मन्नत के बारे में मैंने सोचा है। मैंने देखा है कि तुम इसे गम्भीरता से ले रहे हो, चाहे वह तुम्हारे लिए कितनी ही छोटी क्यों न प्रतीत हो। पर मैं यह भी जानता हूँ कि तुमने यह हमारे परमेश्वर को प्रसन्न करने के भाव से नहीं, बल्कि लोगों के सामने अपनी शक्ति दिखाने के भाव से मानी थी। यहोवा हृदय को देखता है।”

एलीआब ने एक गहरी सांस ली। “इसलिए, मैं, तुम्हारा पिता, तुम्हारी इस मन्नत को इस समय रद्द करता हूँ। तुम इस बन्धन से मुक्त हो। पर यह याद रखो: आज के बाद, जब भी तुम कोई प्रतिज्ञा करो, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उसे पूरा करने के लिए तैयार रहो। क्योंकि एक स्वतंत्र पुरुष का शब्द ही उसकी प्रतिज्ञा है।”

एक अजीब सी हल्कापन शफात्याह के भीतर फैल गया। यह दम घुटने वाली मुक्ति नहीं थी, बल्कि एक गम्भीर, मधुर भारीमुक्ति थी। अगले ही क्षण, नोमा ने, मुस्कुराते हुए, उसके सामने रस का प्याला रख दिया। इस बार उसने पिया। रस का मिठास उसके गले से नीचे उतरा, पर उससे भी अधिक मीठा उसका मन था, जो अब इस व्यवस्था की गहरी बुद्धिमत्ता को समझ पा रहा था।

उस रात, लेटे हुए, वह सितारों को देखता रहा। उसे लगा जैसे यहोवा की व्यवस्था केवल पत्थरों पर खुदी हुई आज्ञाएँ नहीं, बल्कि जीवन की बुनावट में गुंथी हुई एक करुणामय रीढ़ है। यह मनुष्य की दुर्बलता को जानती है, परिवार के बन्धन को मानती है, और शब्दों के पवित्र महत्व की रक्षा करती है। उसकी मन्नत टूटी नहीं थी, बल्कि एक पिता की समझदारी और परमेश्वरीय अनुग्रह के बीच समाहित हो गई थी। और यही ज्ञान, उस रेगिस्तानी रात में, उसके लिए ताड़ के रस से कहीं अधिक मधुर था।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *