पवित्र बाइबल

पश्चाताप और विजय: शमूएल का समय

उन दिनों की बात है जब इज़राइल के लोग यहोवा को भूल चुके थे। वर्षों तक परमेश्वर का सन्दूक किर्यत-यारीम में पड़ा रहा, और लोग बाल देवताओं, अश्तोरेत की मूरतों के आगे झुकते रहे। एक पूरी पीढ़ी ऐसे ही बीत गई, मानो सब कुछ सूनापन था, एक गहरी निस्तब्धता जो प्रार्थनाओं के अभाव में और गहरी होती जाती थी।

फिर शमूएल उठ खड़ा हुआ। वह अब बालक नहीं रहा था। उसके चेहरे पर समय की लकीरें थीं और आवाज़ में एक गम्भीरता, जो सीधे दिल को छूती थी। उसने सारे इज़राइल के सामने ये शब्द कहे: “यदि तुम सच्चे मन से यहोवा की ओर फिरना चाहते हो, तो इन विदेशी देवताओं को अपने बीच से दूर करो। अश्तोरेत की मूरतों को तोड़ डालो, और अपने मन केवल यहोवा पर लगाओ। तब ही वह तुम्हें फिलिस्तीनियों के हाथ से बचाएगा।”

ये बात लोगों के दिल में उतर गई। एक अजीब सी बेचैनी, एक पश्चाताप की लहर सारे इलाके में फैल गई। बाल-बेवल नामक स्थान पर लोग जमा हुए। वहाँ क्या दृश्य था! लोग अपने-अपने घरों से निकलकर लाए हुए थे – चाँदी के टुकड़ों से जड़ी छोटी-छोटी मूरतें, बाल देवता के पत्थर, अश्तोरेत की कुरूप काष्ठ-मूर्तियाँ। एक ढेर लगाया गया। कोई रो रहा था, कोई मौन खड़ा था। फिर शमूएल के इशारे पर सब कुछ तोड़ा-फोड़ा गया और अन्त में आग के हवाले कर दिया गया। धुआँ ऊपर उठा, एक तीखी गन्ध हवा में फैली। यह कोई जश्न नहीं था, बल्कि एक विदाई थी – गुलामी की विदाई।

शमूएल ने फिर सबको आदेश दिया: “मिज़पा में एकत्रित हो। वहाँ मैं तुम्हारे लिए यहोवा से प्रार्थना करूँगा।”

मिज़पा का टीला। हर तरफ से लोग आने लगे – बूढ़े, जवान, स्त्रियाँ, बच्चे। वे खाली हाथ नहीं आए थे। हर एक के साथ उसका दुःख, उसका अपराध-बोध और एक नन्ही सी आशा की लौ थी। वहाँ उन्होंने पानी निकाल कर यहोवा के सामने उड़ेल दिया। यह कोई औपचारिक कर्मकाण्ड नहीं था, बल्कि उन आँसुओं का प्रतीक था जो उनकी आत्मा से निकल रहे थे। उन्होंने उस दिन उपवास किया और कहा, “हमने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है।” और शमूएल वहीं, उसी टीले पर, इज़राइल के लोगों के लिए न्यायी बनकर बैठ गया।

खबर फिलिस्तीनियों तक पहुँची। इज़राइलियों का इकट्ठा होना उनकी नज़र में विद्रोह जैसा लगा। उनके सरदारों ने सेना इकट्ठी की। लोहे के रथ, भारी पैदल सेना, और वे ऊपर से मिज़पा की ओर बढ़ने लगे। जब इज़राइलियों ने दूर से धूल का बादल और रथों की आहट सुनी, तो डर के मारे उनके प्राण सूखने लगे। वे शमूएल के पास गए और हाथ जोड़कर कहने लगे, “हमें यहोवा से फुसफुसाकर प्रार्थना करने को न कहना, बल्कि हमारे लिए चिल्ला-चिल्लाकर विनती कर, कि वह हमें इन फिलिस्तीनियों के हाथ से बचाए।”

शमूएल ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने एक दूध का मेम्ना लिया, जो पूरी तरह से निर्दोष और कोमल था, और उसे यहोवा के लिए होमबलि की तरह चढ़ाया। और जब वह बलि चढ़ा रहा था, और प्रार्थना कर रहा था, तभी फिलिस्तीनी सेना ने हमला बोलने के लिए निकट आ लिया।

तभी आकाश में बदलियाँ गरजने लगीं। पहले तो बस दूर एक गड़गड़ाहट, फिर वह गूँज नज़दीक आई। आकाश काला पड़ गया। और फिर यहोवा ने उसी घड़ी फिलिस्तीनियों पर अपना प्रचण्ड शब्द गरजाया। बिजली कड़कने लगी, इतनी तेज और भयानक कि जैसे आकाश फट गया हो। बिजली के गिरने की आवाज़ और रथों के टूटने की आवाज़ एक हो गई। फिलिस्तीनी सेना में भगदड़ मच गई। वे इधर-उधर भागने लगे, लेकिन भगदड़ में ही एक दूसरे को कुचलने लगे। वह दृश्य अवर्णनीय था – जो सेना विजय पताका लहराती आई थी, वह अब तितर-बितर हो रही थी, प्रकृति के कोप के आगे बौनी।

यह देख इज़राइली पुरुष मिज़पा से निकल पड़े। वे भागते हुए फिलिस्तीनियों का पीछा करने लगे। वे बेतकल्लुफ़ नहीं थे, बल्कि एक नई शक्ति से भरे हुए थे। उन्होंने उनका पीछा किया, और एक स्थान तक, जिसे बेत-कर के नीचे कहा जाता है, तक उन्हें मार भगाया। वहाँ तक, जहाँ से वे आए थे, उनकी शक्ति टूट गई।

तब शमूएल ने एक बड़ा पत्थर लिया और उसे मिज़पा और शेशन के बीच खड़ा कर दिया। उसने उसका नाम “एबन एजर” रखा, यानी “सहायता का पत्थर।” और उसने कहा, “यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है।” वह पत्थर केवल एक निशानी नहीं था; वह एक गवाह था, एक चुप्पा गवाह, कि जब लोग अपने मन से परमेश्वर की ओर फिरते हैं, तो वह उनकी लड़ाई लड़ता है।

उस दिन के बाद फिलिस्तीनियों का दबदबा टूट गया। वे फिर कभी इज़राइल की सीमा में उस तरह नहीं घुसे। यहोवा का हाथ फिलिस्तीनियों के विरुद्ध रहा, शमूएल के जीवन भर। और जो नगर फिलिस्तीनियों ने इज़राइल से छीन लिए थे, वे एक्केक, अशदोद से लेकर गत तक, सब इज़राइल के वश में आ गए। इज़राइल और एमोरी के बीच भी शान्ति रही।

शमूएल जीवन भर इज़राइल का न्यायी बना रहा। वह हर साल बेतेल, गिलगाल और मिज़पा के चक्कर लगाता, और इन स्थानों पर लोगों का न्याय करता। पर उसका घर रामा में था। वहीं वह लौटता, और वहीं उसने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई थी। वहीं, उसकी अपनी जगह पर, वह प्रार्थना करता, और लोगों के विवाद सुनता। और देश में शान्ति रही – एक ऐसी शान्ति जो केवल युद्ध का अभाव नहीं थी, बल्कि वह सबक थी जो मिज़पा के टीले पर, एबन एजर के पत्थर पर, और एक नबी की निस्वार्थ प्रार्थना में लिखा गया था।

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