पवित्र बाइबल

दाऊद की विजयों का स्वर्णिम युग

यरूशलेम की गर्मियों की धूप पत्थरों को तपा रही थी, पर दाऊद के महल के शाही आँगन में एक शीतल हवा का झोंका चल रहा था। राजा एक खुले चबूतरे पर खड़ा था, उसकी नज़रें पूर्व की ओर, यरदन पार के उन विस्तृत मैदानों पर टिकी थीं जहाँ कभी उसके पूर्वज भटकते थे। उसके मन में शांति थी, पर चैन नहीं। प्रभु ने उसे चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ छोड़ दिया था, और वह जानता था कि विश्राम का समय अभी नहीं आया है। वाचा का सन्दूक अब शहर में विद्यमान था, और उसकी उपस्थिति एक आशीष तो थी, पर एक दायित्व भी – इस्राएल के सभी शत्रुओं से भूमि को शुद्ध करने का।

पहला संदेश फिलिस्तीन के दक्षिणी इलाकों से आया। पलिश्तियों ने, जो कभी गात के शहर पर क़ब्ज़े के लिए ललकते थे, अब खुद ही अपनी मातहती स्वीकार कर ली थी। दाऊद की सेनाओं ने न तो बहुत ज़ोर लगाया था और न ही बहुत खून बहाया था। ऐसा लगा जैसे प्रभु ने उनके मनोबल को पहले ही तोड़ दिया था। गात के बुजुर्गों ने ही चाबियाँ सौंप दीं, और दाऊद के युवा अधिकारियों ने शहर के फाटकों पर इस्राएल के झंडे गाड़ दिए। यह कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, बल्कि एक स्वीकारोक्ति थी – एक ऐसी शक्ति का सामना करने की, जो मनुष्य की नहीं थी।

पर असली चुनौती तो उत्तर में थी।

सोवा के राजा हददेजेर ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए फरात नदी की ओर रुख किया था। उसकी महत्वाकांक्षा स्पष्ट थी। दाऊद ने जब इसकी सूचना पाई, तो उसने तुरंत अपने विश्वस्त सेनापति योआब को बुलाया। बैठक लम्बी चली। दाऊद ने कहा, “प्रभु ने मुझे चारों ओर से शांति दी है, पर यह शांति तलवार की म्यान में नहीं, बल्कि हाथ में पकड़ी गई मूठ में है। हददेजेर की चाल को रोकना होगा।”

योआब ने सिर हिलाया, “उसके पास लोहे के रथ हैं, और बहुत से पैदल सैनिक। पर हमारे पास प्रभु है।”

और इस तरह वह अभियान शुरू हुआ। इस्राएली सेना ने यरदन पार किया। मार्च करते हुए उनके पैरों से उड़ती धूल आकाश में छा गई। हददेजेर की सेना से मुठभेड़ हेलाम के मैदान में हुई। वह दृश्य भयानक था – दो विशाल सेनाएँ आमने-सामने, सूरज की रोशनी में चमकती तलवारें, और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ हवा में गूंज रही थी।

पर लड़ाई उतनी लम्बी नहीं चली जितनी की दाबी से डर लगता था। इस्राएली सैनिक, हल्के ढालों और फुर्तीले कदमों वाले, लोहे के भारी रथों के बीच घुस गए। वे ऐसे लड़ रहे थे मानो प्रत्येक की तलवार पर स्वयं यहोवा का हाथ हो। देखते-ही-देखते सोवा की सेना छिन्न-भिन्न हो गई। हददेजेर भाग निकला, पर पकड़ा गया। जब उसे दाऊद के सामने पेश किया गया, तो दाऊद ने उसका वध नहीं किया। उसने उसे जीवित छोड़ दिया, पर एक शर्त पर – भविष्य में कभी इस्राएल के विरुद्ध हथियार नहीं उठाएगा। हददेजेर ने स्वीकार किया, और अपने साथ सोने और कांसे के बने बहुत से बर्तन, और सबसे बढ़कर, अपने रथों के घोड़ों की लगामों में लगी सोने की डोरियाँ भेंट में दीं।

पर उत्तर की ओर से एक और ख़तरा मँडरा रहा था। दमिश्क के अरामियों ने, जब सोवा की हार का समाचार सुना, तो हददेजेzer की सहायता के लिए एक विशाल सेना भेज दी। उनका सेनापति शोभक अभिमान से चूर था। उसने सोचा, इस्राएल की सेना तो एक लड़ाई से थकी हुई होगी, उसे हराना आसान होगा।

दाऊद को जब यह समाचार मिला, तो वह प्रार्थना में घंटों खड़ा रहा। फिर उसने योआब से कहा, “तैयार रहो। प्रभु ने एक को हराया है, तो दूसरे को भी हराएगा। हम रुके नहीं।”

दोनों सेनाएँ फिर आमने-सामने हुईं। इस बार लड़ाई और भी भीषण थी। अरामी सैनिक लम्बे भालों और मज़बूत कवच से लैस थे। पर दाऊद की सेना में एक अद्भुत जोश था। योआब स्वयं मोर्चे की अगली कतार में लड़ रहा था, उसकी तलवार चमकती आग सी लग रही थी। और फिर वही हुआ – अरामी सेना तितर-बितर हो गई। इस्राएलियों ने उनका पीछा किया, और अंततः दमिश्क तक जा पहुँचे। शोभक ने आत्मसमर्पण कर दिया।

विजय की विपुल लूट यरूशलेम लाई गई। सोने के हज़ारों शेकेल, कांसे के असंख्य बर्तन, और दमिश्क के महीन कपड़े। दाऊद ने इन सबको पवित्र भेंट के रूप में अलग रखवा दिया, भविष्य के मन्दिर के लिए। उसने दमिश्क में अरामी सैनिक रखे, जो इस्राएल के प्रति कर देते थे। उस क्षण, दाऊद को अपने युवावस्था के वे शब्द याद आए, जब शमूएल ने उसका अभिषेक किया था। प्रभु ने वादा पूरा किया था।

दक्षिण की ओर, एदोम का मामला बिलकुल भिन्न था। एदोमी, जो एसाव के वंशज थे, लाल सागर के पार के पहाड़ी रास्तों पर नियंत्रण रखते थे। उन्होंने इस्राएल के व्यापार मार्गों को कई बार लूटा था। दाऊद ने इस बार योआब को नहीं, बल्कि अपने दूसरे सेनापति अबीशय को भेजा। सेना ने नमक की घाटी में डेरा डाला। वह जगह बंजर थी, चारों ओर सफेद नमक की चादर बिछी हुई, और सूरज की गर्मी जलती हुई।

एदोमी सेना पहाड़ियों से नीचे उतरी, उनकी संख्या इस्राएलियों से कहीं अधिक थी। अबीशय ने अपने सैनिकों से कहा, “डरो मत। आज प्रभु हमारे सामने है, चाहे यह भूमि कितनी भी विषम क्यों न हो।”

लड़ाई पूरे छह महीने चली, एक लम्बी और थका देने वाली गुरिल्ला युद्ध। एदोमी पहाड़ियों में छिप जाते, और अचानक हमला कर देते। पर अंततः, इस्राएली सेना ने उनके सभी गढ़ों पर कब्ज़ा कर लिया। अबीशय ने हर रणनीतिक स्थान पर इस्राएल के रक्षक नियुक्त कर दिए। एदोम की पहाड़ियाँ अब दाऊद के राज्य का हिस्सा थीं।

यरूशलेम लौटकर, दाऊद ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया। लेकिन यह उत्सव सेना की शक्ति का नहीं, बल्कि प्रभु की महिमा का था। उसने सारी लूट को प्रभु के सामने रखवाया, और लेवीयों से भजन गवाए। रात के समय, जब महल शांत हो गया, दाऊद अपने कक्ष में अकेला बैठा रहा। उसने एक पत्री पर लिखा, “हे यहोवा, तू ने मेरे हाथ में विजय दी है, पर मैं जानता हूँ कि यह मेरी नहीं, तेरी ही विजय है। इन सब राष्ट्रों के बीच में तूने मेरी प्रतिष्ठा बढ़ाई है, और तेरा नाम पवित्र हुआ है।”

उसने अपने दिनों का हिसाब लगाया। फिलिस्तीन, मोआब, अम्मोन, एदोम, सोवा और अराम – सब उसके अधीन थे। पर उसका हृदय गर्व से नहीं, बल्कि एक गहरी विनम्रता से भर गया। उसने याद किया कि कैसे वह एक चरवाहे के रूप में भेड़ों को लेकर जंगल में घूमता था, और कैसे प्रभु ने उसे इस सिंहासन तक पहुँचाया। उसकी आँखों में आँसू आ गए – कृतज्ञता के आँसू।

अगले दिन, उसने अपने सभी अधिकारियों को बुलाया। सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, लेवीय याजक – सभी उपस्थित थे। दाऊद ने कहा, “सुनो, प्रभु ने हमें विश्राम दिया है चारों ओर से। अब हमारा काम है कि हम इस विश्राम को उसकी व्यवस्था के अनुसार कायम रखें। न्याय करो, पर दया से। शासन करो, पर नम्रता से। क्योंकि यह राज्य हमारा नहीं, प्रभु का है।”

और इस तरह दाऊद का शासन स्थापित हुआ। यरूशलेम से लेकर दमिश्क तक, लाल सागर के तट से लेकर फरात नदी के किनारे तक, लोगों ने देखा कि एक ऐसा राजा है जो न केवल युद्ध में विजयी है, बल्कि शांति में न्यायी भी है। उसके दरबार में हर दिन न्याय होता, और हर रात भजन गाए जाते। दाऊद जानता था कि ये सभी विजयें, ये सभी भूमियाँ, केवल एक बड़ी योजना का हिस्सा थीं – एक ऐसे वंश को तैयार करने की, जिससे एक दिन वह मसीहा जन्म लेगा, जिसका राज्य कभी अंत नहीं होगा।

और जब भी वह अपने महल की छत से ब

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