धूप तीखी थी, और उसके सामने फैला हुआ मैदान, सूखा और बेरंग, एक मौन गवाह सा खड़ा था। अय्यूब धूल भरी हवा में बैठा, उसकी आँखों में वही पुरानी जलन थी, शरीर पर फोड़ों का दर्द तो अब आदत सा हो चला था। पर आज उसका मन कहीं और था। वह अतीत के उन दिनों में खोया हुआ था, जब उसका सिंहासन सम्मान से घिरा रहता था, और लोग उसके न्याय के लिए उसकी ओर देखते थे। पर आज? आज वह स्वयं अपने न्याय की कसौटी पर खड़ा था।
उसने अपनी सूखी हथेलियाँ देखीं। “क्या मैंने कभी किसी दास या दासी का न्याय करते समय, उनकी गुहार को अनसुना किया?” उसकी आवाज़ धीमी थी, पर शब्द हवा में लटकते प्रतीत होते थे। “वह तो ऊपर वाला भी जानता है, जिसने हम सब को गर्भ में रचा। अगर मैंने अन्याय किया होता, तो मेरी बाहें कंधों से गिर चुकी होतीं, और कुल्हाड़ी उनकी जड़ काट देती।”
उसकी नज़र दूर, क्षितिज के किनारे पर लगी एक टूटी हुई चरनी पर पड़ी, जहाँ से एक गिद्ध उड़ा। उसे याद आया धन के दिन। “सोना मेरा भरोसा नहीं बना,” वह बुदबुदाया, जैसे स्वयं से बात कर रहा हो। “चाँदी की ओर मैंने कभी हर्षित नेत्रों से नहीं देखा। अगर मैं उन पर मोहित होता, तो यह स्वीकार करना पड़ता कि मैंने स्वर्ग की ज्योति और चंद्रमा की शीतल चाँदनी को, मूक देवता मानकर, उन्हें दंडवत प्रणाम किया। ऐसा कुकर्म तो दंड के योग्य है।”
एक लोमड़ी तेज़ी से एक झाड़ी के पीछे से निकली और धूल के बादल में लुप्त हो गई। अय्यूब की साँसें भारी थीं। “और क्या मैंने कभी किसी पड़ोसी की पत्नी की ओर लालच भरी नज़र से देखा? अगर ऐसा होता, तो मेरी पत्नी दूसरे की सेवा करती, और दूसरे उस पर प्रवृत होते। वह तो आग सरीखा पाप है, जो सारी फसल को जला देता है।”
वह थोड़ा रुका, गले में एक गाँठ सी महसूस करते हुए। उसने अपने दरवाज़े की याद की। “मेरे द्वार पर कोई परदेशी थककर नहीं ठहरा। मैंने यात्री के लिए अपने द्वार खुले रखे। क्या मैंने आदम के भय से, या समाज के डर से, अपने पाप छुपाए? क्या मैं भीड़ से घबराकर चुप हो गया, और बाहर नहीं निकला?”
अचानक एक तेज़ हवा का झोंका आया, उसके बाल और दाढ़ी में धूल भर गई। उसने आँखें मूंद लीं। “क्या मैंने कभी किसी के विरुद्ध, उसकी ज़मीन हड़पने की लालसा से, हाथ उठाया? क्या मैंने किसी अनाट की भूमि पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश की? अगर ऐसा है, तो मेरी फसल में घुन पड़ जाए, और जंगली पौधे उग आएँ।”
उसकी आवाज़ में एक तीव्रता आ गई, जैसे वह किसी अदृश्य अदालत में गवाही दे रहा हो। “क्या मैंने कभी किसी निर्धन को, उसकी लाचारी देखकर, तुच्छ समझा? क्या उसके दिल टूटने पर मैंने उसकी ओर देखा भी नहीं? अगर मैं ऐसा करता, तो परमेश्वर सुन लेता, और वह मेरा न्याय करता। मैं उसके सामने कैसे खड़ा होता?”
दोपहर ढलने लगी थी, और लम्बी-लम्बी परछाइयाँ ज़मीन पर फैल रही थीं। अय्यूब की थकान साफ झलक रही थी, पर उसका आत्म-निरीक्षण अभी थमा नहीं था। उसे अपने व्यापार के दिन याद आए। “क्या मेरे तराज़ू में कभी कमी रही? क्या मैंने माप-तौल में धोखा दिया? क्या मैंने दूसरे के धन पर नज़र डालकर, उसे हड़पने के लिए जाल बुना? अगर ऐसा है, तो दूसरा मेरी जगह खड़ा हो, मेरे खेतों की उपज दूसरे काटें।”
एक क्षण के लिए उसने चुप्पी साधी। रेगिस्तान की यह चुप्पी, उसके अपने विचारों से भी गहरी थी। फिर वह बोला, अपने आप से, पर शायद उस सर्वव्यापी से भी। “क्या मैंने अपनी सफलता पर, अपनी शक्ति और बुद्धि का घमण्ड किया? क्या मैंने यह सोचा कि यह सब मेरे हाथ की उपज है? हे परमेश्वर, तू जानता है। मैंने कभी अपने शत्रु के विनाश पर हर्ष नहीं मनाया। मैंने उसे श्राप देने की कोशिश नहीं की। मेरे तंबू के लोग गवाह हैं, कोई परदेशी मेरे यहाँ रात को बिना रोटी के नहीं सोया। मैंने अपने दरवाज़े को सबके लिए खुला रखा।”
उसने अपने चिथड़ों में लिपटे शरीर को देखा। “पर अब… अब तो मैं धूल और राख में बैठा हूँ। लोग मुझसे दूर भागते हैं, मेरे ही कुटुम्ब मुझे नहीं पहचानते। और फिर भी… फिर भी मैं यही कहता हूँ। मैंने अपनी शपथ नहीं तोड़ी। मैंने उसके मार्ग से पैर नहीं हटाए। मेरा किसी से वैर नहीं रहा। मेरे खेतों का फल गरीब ने खाया, और अनाट उससे तृप्त हुआ।”
सूरज अब क्षितिज को छू रहा था, आकाश लाल और सुनहरा हो गया था। अय्यूब की आँखों में एक अजीब सी चमक थी – दुख, थकान, पर एक अडिग निश्चय भी। उसने अपनी हथेलियाँ आकाश की ओर फैला दीं, न किसी याचना के लिए, बल्कि एक गवाही के लिए।
“यहाँ, मेरा चिह्न है। सर्वशक्तिमान के सामने मेरा उत्तर लिख दिया जाए। मैं उसे अपने कंधे पर धारण करूंगा, उसे अपने सिर पर मुकुट की तरह बाँधूंगा। मैं उसके सामने अपने हर कदम का हिसाब दूंगा, एक शासक की तरह नहीं, बल्कि एक दीन प्राणी की तरह।”
हवा रुक सी गई। सन्नाटा गहरा था। अय्यूब की बाँहें धीरे-धीरे नीचे आ गईं। उसकी गवाही पूरी हो चुकी थी। अब केवल प्रतीक्षा थी – उस रेगिस्तान की, उस आकाश की, और उस सुनने वाले की, जिसके सामने उसने अपना सब कुछ, नंगा और निष्कपट, रख दिया था। और इस निष्कपटता में ही, उसकी पीड़ा के बीच, एक गहरी शांति के बीज छिपे थे, जो अभी अंकुरित होने की प्रतीक्षा में थे।




