वह दिन ऐसे समाप्त हुआ, जैसे पीतल के बर्तन पर धूल जम जाती है—बिना चमक, बिना आशा। अविनाश अपनी झोंपड़ी के स्फटिक के पास बैठा, आँखें दूर जंगलों में खोई हुई थीं। हवा में सूखी पत्तियों की सड़न की गंध थी। उसके मन में वही प्रश्न दोहराता रहा, जो कई वर्षों से एक खुरचन की तरह उसे कुरेद रहा था: “यदि वह है, तो यह सब क्यों? यदि वह सर्वशक्तिमान है, तो दुष्ट फलते क्यों हैं?”
उसके गाँव का दृश्य हृदय विदारक था। बुजुर्ग ललित, जिसने जीवनभर ईमानदारी से काम किया, बीमार पड़ा था और उसकी फसल नष्ट हो गई थी। युवा दीपक और उसके साथी राहगीरों को लूटते, जमकर मौज मनाते, और समाज में उनका डंका बजता था। न्याय नाम की कोई चीज़ नहीं दिखती थी। अविनाश ने अपने पिता से, फिर गाँव के पुजारी से पूछा था। उत्तर हमेशा धुँधले, सिद्धांतों से भरे होते, जो उसकी पीड़ा को नहीं छू पाते थे। धीरे-धीरे, उसके भीतर का विश्वास एक पत्थर की तरह ठंडा हो गया। उसने तय कर लिया—कोई सुनवाई करने वाला नहीं है। यह सब एक निष्ठुर, खामोश संयोग है।
इस निर्णय के बाद एक अजीब सी स्वतंत्रता आई। उसने प्रार्थना करना बंद कर दिया। नैतिकता उसके लिए केवल एक सामाजिक समझौता बन गई, जिसे आवश्यकता पड़ने पर तोड़ा जा सकता था। वह दीपक के चंगुल में नहीं फँसा, पर उसकी दुनिया संकुचित होती गई। उसकी दृष्टि में केवल भूख, सुरक्षा, और अगले दिन का संघर्ष रह गया। उसका हृदय, जो कभी करुणा से भरा रहता था, अब एक सूखे बीज की तरह सिकुड़ गया। वह देख नहीं पा रहा था कि उसकी अपनी बुद्धि ही उसका पतन बन रही थी। “मूर्ख ने अपने मन में कहा, ‘कोई परमेश्वर नहीं है।'” और उस मूर्खता ने उसके अंदर एक खालीपन पैदा कर दिया, जिसे भरने के लिए अब केवल निराशा और स्वार्थ बचे थे।
एक सर्द रात, जब आकाश में बादल इतने घने थे कि तारे भी दिखाई नहीं दे रहे थे, दीपक और उसके साथियों ने एक यात्री कारवाँ पर हमला बोल दिया। चीखें गूँजीं। अविनाश ने अपनी झोंपड़ी में दरवाज़ा बंद कर लिया, उसके कानों में उसकी माँ की पुरानी बात गूँज उठी, “बुराई देखकर आँखें मूँद लेना भी पाप है।” पर उसने क्या किया? कुछ नहीं। परमेश्वर नहीं है, तो पाप-पुण्य का खेल किस लिए? वह सो गया, पर उसकी नींद बेचैन थी।
अगली सुबह, गाँव में सन्नाटा पसरा था। लूटपाट में एक बूढ़ा व्यक्ति मारा गया था, जो अपने पोते के लिए दवाई लेकर जा रहा था। उसके हाथ में एक टूटी हुई ताबीज़ थी, जिस पर खरोंच से कोई शब्द उकेरा गया था: “परमेश्वर।” अविनाश ने उस ताबीज़ को देखा। कुछ भी नहीं हुआ। कोई आकाशवाणी नहीं, कोई क्रोधित बिजली नहीं। बस वह टूटा हुआ चमड़ा और एक मरा हुआ बूढ़ा। उसने मुड़कर देखा—दीपक और उसके साथी गाँव के कुएँ पर पानी पी रहे थे, हँस रहे थे। उनके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, कोई डर नहीं। “क्या सब भ्रष्ट हो गए हैं? क्या कोई भी भला नहीं? कोई नहीं, एक भी नहीं।” भजन की यह पंक्ति उसके मस्तिष्क में चलने लगी, हालाँकि उसे याद नहीं था कि उसने इसे कब पढ़ा था।
पर फिर कुछ हुआ। दोपहर को, जब सूरज चरम पर था, दीपक के एक साथी, रमेश, का पैर फिसला और वह कुएँ में गिर गया। वह कुएँ का पानी, जो उन्होंने अभी पिया था, अचानक एक भयानक जाल बन गया। दीपक और अन्य भाग खड़े हुए। कोई उसे बचाने नहीं गया। अविनाश वहाँ खड़ा देखता रहा। रमेश का एक हाथ पानी के ऊपर था, जो हवा में बेबस लहरा रहा था, फिर धीरे-धीरे डूब गया। उस पल में, अविनाश ने अपनी आत्मा के भीतर एक तूफान महसूस किया। यह डर नहीं था। यह एक भयानक, स्पष्ट प्रकाश था। यह वह पल था जब उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर का ‘न होना’ ही सबसे बड़ा अंधकार है। यह शून्यता ही तो वह जगह है जहाँ से सब बुराई फूटती है। जब कोई ऊपर नहीं देखता, तो वह नीचे ही गिरता चला जाता है। “परमेश्वर ने स्वर्ग से मनुष्यों की ओर देखा… सब भटक गए।”
वह शाम, अविनाश उस बूढ़े यात्री की अनाम कब्र पर गया। वहाँ उसने रोते हुए, बिना शब्दों के, एक प्रार्थना की। यह प्रार्थना नहीं थी, यह एक चीख थी—हार की, पश्चाताप की, और एक सहारे की तलाश की। और तब, हवा के एक झोंके में, उसे वह अनुभव हुआ जिसे वर्णन करना कठिन है। ऐसा लगा जैसे उसके हृदय की जमी हुई मिट्टी में एक दरार आ गई हो। कोई दृश्य नहीं दिखा, कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी, पर एक गहरा विश्वास, एक ज्ञान उमड़ आया कि वह अकेला नहीं है। उसकी बुद्धि ने जिसे नकार दिया था, उसकी आत्मा ने उसे उस क्षण में जान लिया। “क्या सिय्योन से उद्धार नहीं आएगा?” इस प्रश्न का उत्तर उसे मिल गया। उद्धार बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है—उस पल में जब मनुष्य अपनी भटकन को पहचानता है और उस प्रकाश की ओर मुड़ता है जिसे उसने कभी नकारा था।
अविनाश ने अगले दिन से वह टूटी ताबीज़ अपने पास रख ली। वह दीपक से नहीं डरा, हालाँकि उसने सीधा सामना नहीं किया। उसने छोटे-छोटे काम शुरू किए—ललित की देखभाल करना, अनाथ बच्चे को भोजन देना। यह उद्धार नहीं था, पर यह उद्धार की ओर एक कदम था। उसने समझ लिया कि परमेश्वर का अस्तित्व एक आदेश नहीं, बल्कि एक आमंत्रण है। वह तब प्रकट होता है जब मनुष्य अपनी मूर्खता को त्यागकर, अपनी भ्रष्टता को स्वीकार कर, उस स्रोत की ओर देखता है जहाँ से सच्ची दया और न्याय प्रवाहित होते हैं।
और इस तरह, उस गाँव में, एक आदमी के हृदय में हुए इस मौन संघर्ष ने कोई बड़ा चमत्कार नहीं दिखाया। पर एक पत्थर हिला था। एक मन बदला था। और कभी-कभी, बस इतना ही काफी होता है—एक आत्मा का जागना, ताकि वह अंधकार में भी, उस प्रकाश की किरण को पहचान सके, जो हमेशा से वहाँ थी।




