यह कहानी उस समय की है जब दाऊद के वंश के राजा यहोशापात ने यरूशलेम पर राज किया था। वह समय शांति का नहीं था। पूर्व से अम्मोनियों और मोआबियों की एक विशाल सेना ने यहूदा पर चढ़ाई की थी, और लोगों के मन में भय समा गया था। एक ऐसे ही संध्या समय में, एक बूढ़ा लेवीय, एलियाब, जो अब भजन गाने के लिए मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने भर का सामर्थ्य रखता था, अपनी झोंपड़ी के द्वार पर बैठा आकाश में उभरते तारों को देख रहा था। उसके हाथ में एक पुराना वीणा था, जिसके तार अब धुंधली आवाज़ ही निकालते थे।
उसका पोता, नूर, एक चंचल दस वर्ष का बालक, उसके पास आ बैठा। “दादा, आज मंदिर में कोई नया गीत नहीं गाया। सब चेहरे उदास हैं। क्या परमेश्वर हमें भूल गया है?”
एलियाब ने नूर के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखों में एक दूर की चमक थी, जैसे कोई पुरानी स्मृति ताज़ा हो रही हो। “भूलता है वह कभी अपने प्रतिज्ञा किए हुए लोगों को? नहीं, बेटा। मगर कभी-कभी वह हमें एक नया गीत सिखाने के लिए ऐसी घड़ी लाता है। एक ऐसा गीत जो केवल संकट की आग में ही गढ़ा जा सकता है।”
उस रात, एलियाब को नींद नहीं आई। राजा ने घोषणा की थी कि अगले दिन सभी लोग उपवास रखेंगे और यहोवा से प्रार्थना करेंगे। भय का साया इतना गहरा था कि हवा तक मानो साँस रोके खड़ी थी। अगली सुबह, लोगों की भीड़ यरूशलेम के मैदान में एकत्र हुई। पुरुष, स्त्रियाँ, बच्चे – सभी के चेहरे पर वही सवाल था जो नूर ने पूछा था। राजा यहोशापात स्वयं सामने खड़ा था, उसके राजकीय वस्त्रों के बजाय साधारण चमड़े का एक एप्रन बंधा था, उपवास और प्रार्थना का चिह्न।
तभी, भीड़ के पीछे से एक कंपकंपाती, परन्तु दृढ़ आवाज़ सुनाई दी। एलियाब, अपने पोते का हाथ पकड़े, आगे बढ़ रहा था। उसकी आँखें चमक रही थीं। वह बूढ़ा लेवीय, जो सालों से केवल पुराने भजन दोहराता रहा था, अचानक एक नई स्फूर्ति से भर गया लग रहा था। उसने राजा की ओर देखा, और फिर आकाश की ओर।
और फिर उसने गाना शुरू किया। यह कोई ज्ञात धुन नहीं थी, न ही कोई पुराना भजन। यह सीधे उसके हृदय से, गहरी विषाद और गहरी आशा के मिश्रण से निकल रहा था। वह ऐसे गा रहा था मानो स्वयं परमेश्वर उसके कंठ में बोल रहा हो।
**”यहोवा में आनन्द कर, हे सिय्योन के लोगों!**
**अपने उद्धारकर्ता के कारण जयजयकार करो!**
**उसकी स्तुति में नाच उठो, बाजे पर गाओ!**
**क्योंकि यहोवा अपनी प्रजा से प्रसन्न है।**
**वह दीनों को विजय का मुकुट पहनाता है!”**
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, जैसे कोई ज्वार उमड़ पड़ा हो, एक और आवाज़ उससे जुड़ गई। एक युवा योद्धा, जिसके हाथ में तलवार के बजाय एक ढोल था, जोर से बजाने लगा। फिर एक स्त्री की आवाज़ गूँजी, फिर दस, फिर सौ। वह नया गीत, एलियाब का गीत, हवा में फैलने लगा। लोग नाच उठे। आँसू उनकी आँखों से बह रहे थे, मगर अब वे भय के नहीं, एक अद्भुत, दबी हुई शक्ति के उमड़ आने के आनन्द के आँसू थे। वह भीड़, जो क्षण भर पहले डरी हुई थी, अब विजयी सेना जैसी लग रही थी। उनके गीत में वह बल था जो तलवारों से भी अधिक तीखा था।
राजा यहोशापात ने घुटने टेके, और सबने उसका अनुसरण किया। प्रार्थना समाप्त हुई, मगर वह गीत, वह नया गीत, हवा में ऐसे रमा हुआ था जैसे स्वर्गदूतों का कोई दस्ता उसे आगे बढ़ा रहा हो।
अगले दिन, सेना युद्ध के लिए रवाना हुई। एलियाब बूढ़ा और कमज़ोर था, वह नहीं जा सका। नूर भी नहीं जा सका। मगर जब सेना ने यरूशलेम से प्रस्थान किया, तो उसके साथ वह गीत भी गया। योद्धा उसे गाते हुए जा रहे थे, उनके कदमों में वही लय थी। एलियाब ने अपने पोते से कहा, “देख, नूर। यही है संतों का महिमा। यह तलवार चलाना नहीं, बल्कि वह गीत गाना है जो परमेश्वर हमारे हृदय में डाल देता है। वह गीत ही हमारी दोधारी तलवार है।”
खबर कई दिन बाद आई। एक धूल से सने हुए दूत ने यरूशलेम में प्रवेश किया। उसके चेहरे पर अविश्वसनीय विजय का भाव था। उसने बताया कि कैसे शत्रु सेना आपस में ही लड़ पड़ी थी। कैसे अम्मोनियों और मोआबियों ने एक-दूसरे पर ही वार कर डाले थे। यहूदा की सेना को तो केवल खड़े होकर परमेश्वर के उद्धार को देखना था। उन्होंने कोई तलवार नहीं चलाई, केवल वह गीत गाते रहे जो एलियाब ने शुरू किया था।
जब विजयी सेना लौटी, तो उनके साथ वह गीत भी लौटा, मगर अब वह और भी समृद्ध, और भी शक्तिशाली हो चुका था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे एलियाब के पास नूर फिर आया। “दादा, क्या यह वही नया गीत था जिसकी तुमने बात की थी?”
बूढ़े लेवीय की आँखों में चमक थी। उसने अपना पुराना वीणा उठाया, और इस बार उसके तारों से एक स्पष्ट, मधुर स्वर निकला। “हाँ, बेटा। यह वही गीत था। देख, जब संत सच्चे मन से यहोवा का गुणगान करते हैं, तो उनकी स्तुति न्याय की पुस्तक में लिख दी जाती है। वह गीत ही हमारी तलवार बन जाता है। आज, उस गीत ने हमारे शत्रुओं का न्याय किया है। यह उन सभी राजाओं और सरदारों के विरुद्ध है, जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं।”
उस रात, यरूशलेम में दीपक जल उठे। लोग फिर से नाचे और गाए। एलियाब का नया गीत अब सबका गीत बन चुका था – एक ऐसा गीत जो उनकी पहचान था, उनका अस्त्र था, और उनके परमेश्वर के प्रति प्रेम का प्रमाण था। और नूर ने, अपने दादा के पास बैठे-बैठे, समझ लिया कि सच्चा बल वीरता में नहीं, बल्कि उस स्तुति के गीत में छुपा है, जो दीन के हृदय से निकलकर, स्वयं परमेश्वर की सामर्थ्य से भर जाता है। यही भजन संहिता की वह आत्मा थी, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गूँजती रही।




