पवित्र बाइबल

बाबिल से लौटते हुए

वह दिन ठीक वैसा ही था, जैसा अम्मीन को याद था। बाबिल की गुलामी के उन लंबे, धूल-भरे वर्षों में भी, उसकी स्मृतियों में यरूशलेम के आसपास के पहाड़ों का रंग सुनहरी शाम को ऐसा ही हुआ करता था। हवा में ठंडक घुलने लगी थी, और दूर, भवनों के अधूरे ढाँचे सिल्हूट की तरह उभरे हुए थे। उसने एक लम्बी सांस ली, और वह सारी थकान, सारा डर, जो उसकी रीढ़ में जम गया था, मानो थोड़ा सा ढीला पड़ा।

कई सप्ताह पहले, जब कारवाँ शहर के पास पहुँचा था, तो अम्मीन का दिल एक अजीब-सी गाँठ में बँधा हुआ था। यह वह शहर नहीं था, जिसे उसके पिता ने बचपन में बताया था। यह तो विध्वंस, टूटे हुए पत्थर और उजाड़ का एक स्थान था। परमेश्वर का नगर। उस नाम में अब क्या बचा था? पहले कुछ दिन तो उसने बस अपने परिवार के लिए एक झोंपड़ी खड़ी करने में लगाए। हर घास-फूस की झोपड़ी, हर उखाड़े गए पत्थर के नीचे दबी जड़ें, एक कड़वी याद दिलाती थीं। उसकी पत्नी, मिरियम, चुपचाप काम करती रहती, पर उसकी आँखों में भी वही सवाल तैरता रहता – क्या यही है वादा किया हुआ सब कुछ?

फिर एक दोपहर, जब वह शिलोह के कुएँ के पास पत्थर ढो रहा था, कुछ हुआ। कुछ ऐसा, जिसे वह शब्द नहीं दे सकता। हवा रुक-सी गई। चहल-पहल का शोर धीमा पड़ गया। और उसने महसूस किया… एक उपस्थिति। वह कोई आवाज़ नहीं थी, कोई दर्शन नहीं था। बस एक गहरा, दबा हुआ विश्वास, जो उसकी हड्डियों में उतर गया, जैसे कोई बासी प्यास अचानक ताज़े पानी से भर गई हो। “उस दिन तू कहेगा,” विचार आया, बिल्कुल स्पष्ट, जैसे कोई पुराना, भूला हुआ गीत याद आ गया हो, “हे यहोवा, मैं तेरी स्तुति करूँगा; यद्यपि तू मुझ से क्रोधित था, तौभी तेरा क्रोध शान्त हुआ, और तू ने मुझे शान्ति दी।”

वह वाक्य उसके भीतर गूँजता रहा। क्रोध। हाँ, क्रोध तो था। उसने अपने माता-पिता को गुलामी में सड़ते देखा था। उसने अपने बचपन के घर को जलते देखा था। वह परमेश्वर का क्रोध ही तो था। लेकिन ‘शान्त हुआ’… यह शब्द उसके लिए नया था। क्या क्रोध स्थायी नहीं होता? क्या दंड अंतिम नहीं होता? पर यहाँ… यहाँ तो एक मोड़ था। एक रुकाव। जैसे कोई बादल छँट गया हो।

उसी रात, झोंपड़ी में, अम्मीन ने मिरियम से बात की। आग की लपटों की लौरें उसके चेहरे पर नाच रही थीं। “मैंने आज… कुछ महसूस किया,” उसने कहा, शब्दों को तलाशता हुआ। “ऐसा लगा जैसे वह, जिसने हमें तितर-बितर किया, वही अब हमें इकट्ठा कर रहा है। उसका क्रोध ज्वाला था, जिसने हमें शुद्ध किया। लेकिन अब… अब वह जल नहीं रहा। वह प्रकाश है। हमारा प्रकाश।”

मिरियम ने लम्बी देर तक उसकी ओर देखा। फिर उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े, चुपचाप। वे दुःख के आँसू नहीं थे। वह एक राहत थी, एक ऐसी राहत जो सालों से अटकी हुई थी।

अगले दिनों में, अम्मीन बदल गया। वह अब सिर्फ पत्थर नहीं ढो रहा था। वह एक घर बना रहा था। वह सिर्फ कुआँ नहीं खोद रहा था। वह जीवन का स्रोत तैयार कर रहा था। और जब वह काम करता, तो उसके मन में एक नया गीत बजने लगा। “देखो, परमेश्वर ही मेरा उद्धार है; मैं भरोसा रखूँगा और न डरूँगा; क्योंकि यहोवा ही मेरी शक्ति और मेरा गान है, और वही मेरा उद्धारकर्ता हुआ।”

एक शनिवार को, जब लोग थोड़ा विश्राम कर रहे थे, वह शहर के उन टीलों पर चढ़ गया, जहाँ से पुराने मंदिर का दृश्य दिखता था। नीचे, लोग इधर-उधर बैठे थे। कुछ बातें कर रहे थे, कुछ चुप थे। तभी उसने देखा, बूढ़ा एलियाकीम, जो अपने परिवार में अकेला बचा था, धीरे-धीरे कुएँ की ओर बढ़ा। उसके कंधे झुके हुए थे। अम्मीन नीचे उतरा और उसके पास पहुँचा। बिना कुछ कहे, उसने पानी का घड़ा भरा और बूढ़े के हाथ में दे दिया। एलियाकीम ने पानी पिया, और उसकी सूखी आँखों में एक चमक आ गई। उसने अम्मीन के हाथ को दबाया। उस छोटे से स्पर्श में एक सम्पूर्ण वार्तालाप समा गया।

और तब अम्मीन ने समझा। उद्धार केवल बाबिल से छुटकारा नहीं था। उद्धार यह था कि तुम्हारे भीतर का कुआँ फिर से भर जाए। कि तुम डरना छोड़ दो। कि तुम उस स्रोत से पानी खींच सको, जो कभी सूखता नहीं।

वह शाम, जब सब लोग इकट्ठा हुए, तो अम्मीन ने अपना सिर उठाया। आग के चारों ओर बैठे लोगों के चेहरे उज्ज्वल दिख रहे थे। उसने आवाज़ उठाई, शुरू में धीमी, फिर दृढ़। “हे यहोवा के लोगों, उसकी स्तुति करो! उसका नाम प्रचार करो! उसके काम जाति-जाति में जतलाओ! स्मरण कराओ कि उसका नाम क्या है!”

लोग हैरान थे। फिर एक, दो, तीन आवाज़ें उससे जुड़ गईं। कोई फुसफुसा रहा था, कोई गा रहा था। यह सही सुर में नहीं था, यह एक साथ नहीं था। यह टूटा-फूटा था। लेकिन यह वास्तविक था। यह मानवीय था।

“पूरी पृथ्वी के बीच में उसके महान कामों का गान गाओ!” अम्मीन ने कहा, और उसकी आवाज़ भावनाओ से भर उठी। “हे सिय्योन के निवासियो, जयजयकार करो और मगन होकर आनन्द करो, क्योंकि इस्राएल का पवित्र एक तुम में महान है!”

‘मगन होकर आनन्द करो’। यह आज्ञा नहीं थी। यह एक निमंत्रण था। एक ऐसा आनन्द, जो दुःख की गहराई से उपजा था। एक ऐसा गान, जो मौन के बाद आया था।

आग की लपटें ऊँची उठीं, और उन लोगों के चेहरे, जिन पर गुलामी की झुर्रियाँ थीं, एक अद्भुत प्रकाश से नहा गए। वह प्रकाश बाहर से नहीं आ रहा था। वह उनके भीतर से उभर रहा था। उनके उद्धार के स्रोत से।

अम्मीन ने आँखें बंद कर लीं। वह दिन आ गया था। वास्तव में आ गया था। और वह जानता था, यह केवल शुरुआत थी। क्योंकि जब तक वह कुआँ है, प्यासे उसके पास आएँगे। और पानी कभी खत्म नहीं होगा।

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