बेबीलोन की गर्मी सिर पर चढ़ी हुई थी। हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और दूर से आती हथौड़ों की टनटनाहट, लकड़ी के छिलने की आवाज़, और कभी-कभी पिघलती धातु की तीखी गंध – यह सब उस शहर की रोज़मर्रा की साँस थी। रेविद नाम का एक कारीगर अपनी छोटी सी दुकान के अंदर बैठा, एक लकड़ी के तने को रेती से सहला रहा था। पसीने की बूँदें उसकी कनपटी पर जमा होकर गिरती थीं, और वह बड़े ध्यान से लकड़ी के रेशों के उभार को महसूस कर रहा था। यह देवता का पाँव बनना था। या शायद हाथ। अभी तय नहीं था।
उसकी दुकान के बाहर, बाज़ार का शोरगुल था। सौदागर, फेरीवाले, गुलामों की ज़ंजीरों की खनखनाहट। रेविद के मन में एक अजीब सी खालीपन थी। वह यहूदी था, पर यहूदाह से दूर, इस विदेशी धरती पर जहाँ देवी-देवता इतने थे कि गिनती में न आते। उसके हाथों ने सैकड़ों मूर्तियाँ गढ़ी थीं – बेबीलोन के मर्दुक की, अश्शूर के अश्शूर की, चाँद देवता सीन की। हर एक के लिए विधि अलग, चढ़ावा अलग, डर अलग। पर आज, इस लकड़ी को रेतते हुए, वह सोच रहा था कि कल जब यह मूर्ति तैयार हो जाएगी, तो कोई इसे सजाएगा, सिंहासन पर बिठाएगा, और फिर उसी के सामने झुककर प्रार्थना करेगा। वही हाथ जिसने इसे बनाया, वही सिर जिसने इसका रूप सोचा, वह इसके सामने नतमस्तक होगा। एक विचित्र सा चक्कर था यह।
दिन ढलने लगा। रेविद ने काम रोका और बाहर निकलकर फुरसत में नहर के किनारे टहलने लगा। कुछ बूढ़े यहूदी वहाँ बैठे बातें कर रहे थे। उनमें से एक, एलियाकीम नाम का, जिसकी दाढ़ी बर्फ जैसी सफेद हो चुकी थी, धीमे स्वर में कुछ पढ़ रहा था। रेविद धीरे से पास बैठ गया। एलियाकीम की आवाज़ में एक अजब की ताकत थी, जैसे पुराने पहाड़ों की गूँज।
“सुनो, हे याकूब के घराने, और हे इस्राएल की सारी शेष जनता,” वह बोला, “तुम्हें गर्भ से ढाला, बचपन से सहारा दिया। मत डर, हे मेरे दास याकूब, और हे येशुरुन, जिसे मैंने चुना है।”
रेविद ने आँखें बंद कर लीं। शब्द उसके भीतर उतर रहे थे, जैसे प्यासी ज़मीन में पानी। एलियाकीम पढ़ता गया, यशायाह के शब्दों को हवा में बुनता गया। वह उस स्रष्टा की बात कर रहा था जो आकाशों को फैलाता है, पृथ्वी की नींव रखता है, और मनुष्य के भीतर की साँस उसकी ही देन है। फिर, अचानक, उसकी आवाज़ में एक तीखापन आया, एक व्यंग्य जो चुभता था।
“लोहार छेनी से काम करता है, कोयले की आग में तपाता है, हथौड़ों से उसे गढ़ता है… वह भूखा हो जाता है, उसमें शक्ति नहीं रहती, पानी न पीता तो थक जाता। बढ़ई नापनेवाला सूत खींचता, खुरचनी से खुरचता, कारणों से घेरता, और परकार से रेखा खींचकर मनुष्य के रूप में बनाता है, सुन्दर मूर्ति के रूप में, कि वह मन्दिर में रहे।”
रेविद का साँस रुक सा गया। यह तो उसके अपने काम का हिसाब था। वह लकड़ी चुनता था, उसे सुखाता था, मापता था, रेखाएँ खींचता था। भूखा-प्यासा रह जाता था काम पूरा करने में। और फिर…
“उसका अधिकांश भाग आग में जलाया जाता है, वह उसी आग से अपना खाना पकाता, भूनता मांस खाकर तृप्त होता है… और बाकी से एक देवता बनाकर उसके सामने झुकता है, पूजा करके प्रार्थना करता है, ‘मुझे बचा ले, क्योंकि तू मेरा देवता है।’”
एलियाकीम ने एक गहरी साँस ली। “वे न तो जानते हैं और न ही समझते। क्योंकि उनकी आँखें इतनी मूँद दी गई हैं कि वे देख नहीं सकते, और उनके हृदय इतने बंद हैं कि वे समझ नहीं सकते।”
रात हो चली थी। रेविद अपनी दुकान में लौट आया। कोयले की भट्ठी की लालसा अब भी थी, पर उसकी गर्मी अब उसे सहलाती नहीं, झुलसाती लगती थी। वह उस अधूरी मूर्ति के पास गया, जिसका पाँव उसने बनाना शुरू किया था। लकड़ी चिकनी थी, पर सुन्न। उसने हाथ रखा। कोई जवाब नहीं। कोई साँस नहीं। बस उसी का दिया हुआ आकार।
एलियाकीम के शब्द गूँज रहे थे – “हे इस्राएल, मैं तुझे भूल न जाऊँगा। देख, मैंने तुझे अपनी हथेलियों पर खोद रखा है।”
रेविद ने अपने हाथों को देखा। उनपर छिलने, काटने, जलने के निशान थे। ये वही हाथ थे जो देवता गढ़ते थे। पर किसी ने उसे, रेविद को, क्या कभी गढ़ा था? क्या उसकी रगों में दौड़ती जान किसी लुहार की भट्ठी की देन थी? नहीं। यह बात अलग थी। गहरी। अनकही।
अगले दिन, बाज़ार में एक सौदागर आया, एक नई देवी की मूर्ति मँगाने। रेविद ने उसे टकर देखा। “नहीं,” उसने कहा, आवाज़ सपाट। “मैं नहीं बनाऊँगा।”
सौदागर हैरान रह गया। “दाम दोगुना कर दूँगा।”
“दाम नहीं चाहिए,” रेविद ने कहा। “मेरे हाथ अब किसी और काम के लिए हैं।”
उसने अपनी दुकान के पिछवाड़े जमा लकड़ी के टुकड़े, पत्थर के अधूरे ढाँचे, धातु के साँचे – सब नहर में बहा दिए। यह कार्य उसने चुपचाप किया, बिना किसी नाटक के। कोई आकाशीय आवाज़ नहीं हुई, कोई चमत्कार नहीं दिखा। बस एक कारीगर का फैसला था, जो थक गया था अपने ही हाथों के बनाए भ्रम से।
शाम को वह फिर एलियाकीम के पास गया। बूढ़े ने उसे देखा, और उसकी आँखों में एक सूक्ष्म समझदारी चमकी। बिना कुछ पूछे, वह फिर से पढ़ने लगा, पर अब आश्वासन के शब्द – “मैं उस सूखे पेड़ पर पानी बरसाऊँगा, और बहती नदियाँ बहा दूँगा। लोग उगेंगे घास की तरह, दोनों के बीच में देवदार के वृक्षों सा। एक कहेगा, ‘मैं यहोवा का हूँ’… दूसरा याकूब के नाम से लिखेगा, और दूसरा हाथ से यहोवा के नाम पर लिखेगा।”
रेविद ने नहर का पानी देखा, जिसमें उसकी बनाई मूर्तियों के अवशेष तैर रहे थे। पानी का प्रवाह उन्हें बहा ले जा रहा था, निगल रहा था। और उसे लगा, जैसे कोई बहुत पुराना बोझ उतर गया हो। वह देवता नहीं बनाएगा। वह उसके लिए एक नाम लिखेगा। अपने भीतर, अपने घर में, अपने लोगों के बीच। एक ऐसे स्रष्टा का, जो लकड़ी या पत्थर में नहीं, पर हर साँस में, हर सुबह की रोशनी में, और उसकी अपनी जागती हुई आत्मा में बसता है।
उस रात, बेबीलोन के आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, और हवा में अब भी धातु और धूल की गंध थी। पर रेविद के भीतर एक नई शांति थी। वह जान गया था कि मूर्ति वह नहीं जो हाथों से गढ़ी जाती है, बल्कि वह है जिसने हाथों को गढ़ा है। और यह जानना ही उसके लिए एक मुक्ति थी, एक वाचा, उस यरूशलेम से भी दूर, पर उसके हृदय के बहुत करीब।




