यह बात उन दिनों की है जब यरूशलेम की गलियों में अजीब सी बेचैनी हवा के साथ बहती थी। हम लोग, यहूदा के बूढ़े, दमिश्क दरवाजे के पास जैतून के एक पेड़ के नीचे बैठा करते थे। वहीं से शहर का वह हिस्सा दिखता था जहाँ नए लोग, व्यापारी, और कभी-कभी दूर देशों के यात्री ठहरते थे। एक दिन, मैंने अपने पोते मीकायाह को वहाँ देखा। वह एक छोटी सी, चमकदार मूरत लिए हुए था, जिसे उसने किसी बाबुल के व्यापारी से लिया था। वह मूरत सोने-चाँदी की तरह चमकती थी, उस पर नीले कपड़े लिपटे थे। मीकायाह उसे बड़े गर्व से अपने दोस्तों को दिखा रहा था।
मेरा दिल भारी हो गया। मैंने अपने भाई हिलकिय्याह की तरफ देखा, जो मेरे बगल में चबूतरे पर बैठा था। उसकी आँखों में भी वही पीड़ा थी, वही पुरानी याद। हम दोनों ने बचपन में अपने पिता से यिर्मयाह नबी के उपदेश सुने थे। वह आवाज, जो कभी बुलंद और कभी करुणामय हो जाती थी, अब भी कानों में गूंजती थी।
“सुनो,” वह कहा करते थे, “देखो और समझो। ये गैर-राष्ट्रों की रीतियाँ हैं, जो आकाश के तारों से डरते हैं, जो काठ की मूरतों के आगे झुकते हैं। एक बढ़ई लकड़ी काटता है, उसे छेनी से गढ़ता है, सुन्दर बनाता है। फिर उस पर सोने का पानी चढ़ाता है, चाँदी की पत्तरियाँ ठोंकता है। और फिर वह उसे कीलों से जड़ देता है ताकि हिले नहीं। वह मूरत तो बोल भी नहीं सकती, चल भी नहीं सकती, उसे उठाना पड़ता है। उससे मत डरो, वह न तो भला कर सकती है, न ही बुरा।”
मैंने मीकायाह को पास बुलाया। वह चमकती मूरत लिए मेरे सामने खड़ा हो गया। “दादा, देखो, यह कितनी सुन्दर है। कहते हैं यह हमारी फसल की रक्षा करेगी।”
मैंने उस गर्मी की दुपहरी में अपनी आँखें मूंद लीं। मेरे सामने एक और तस्वीर उभर आई – वह भीषण दिन जब बाबुल की सेना ने पहली बार हमारी सीमाओं को छुआ था। हम मूरतों के पीछे भागे, हमने यहोवा की वाचा को भुला दिया था। और क्या मिला? वे काठ के पुतले, सोने-चाँदी के ढाँचे, हमें क्या बचा पाए? वे तो स्वयं हवा में झूम रहे थे, जड़ें उखड़ चुकी थीं।
मैंने अपने पोते से कहा, “मीकायाह, तू जानता है इस चमक के पीछे क्या है? यह सब व्यर्थ है, एक भ्रम है। हमारा परमेश्वर, यहोवा, वह सच्चा परमेश्वर है, जीवित परमेश्वर, अनन्तकाल का राजा। उकाब उड़ाने वाली आँधी के सामने उसका क्रोध काँप उठता है। उसने अपने बल से पृथ्वी को स्थिर किया, अपनी ही बुद्धि से आकाश को तान दिया। जब वह बोलता है, तो आकाश के जल गरज उठते हैं, वह बादलों को पृथ्वी की छोर से उठाता है। वह बिजली चमकाता है और वर्षा लाता है, वह पवन को अपने भण्डारों से निकालता है।”
मेरी आवाज थोड़ी काँप रही थी, शायद बुढ़ापे से, शायद उस स्मृति से जो अब भी ताजा थी। “हर मनुष्य जो धातु गढ़ने का काम करता है, वह ठगा हुआ है। उसकी ढली हुई मूरत झूठ है, उनमें सांस नहीं। वे व्यर्थ हैं, हास्य का कारण हैं। जब उनके दंड का समय आएगा, तो वे नाश हो जाएँगी।”
मीकायाह ने मूरत को नीचे रख दिया। उसकी आँखों में प्रश्न था। “पर दादा, सब लोग तो ऐसा ही करते हैं। अस्सूर, बाबुल, सब। हम अकेले क्यों अलग रहें?”
हिलकिय्याह ने इस बार जवाब दिया। उसकी आवाज में गहरा, दर्द भरा धैर्य था। “क्योंकि हम अकेले नहीं हैं, बेटे। हमारा भाग यहोवा है। वही याकूब का अंश है। वह सब कुछ बनाने वाला है, और इस्राएल उसकी गद्दी की छड़ी है। हम उसके नाम के लोग हैं। और देख, यह शहर, यह यरूशलेम… यह उसकी राजधानी थी। पर हम भूल गए। हमने कहा, ‘हमारी शक्ति और हमारे हाथ के बल ने हमारे लिये यह सब धन कमाया है।'”
एक सन्नाटा छा गया। दूर से एक गधागाड़ी के पहियों की चरचराहट आ रही थी। मैंने फिर शुरू किया, जैसे यिर्मयाह ही मेरे मुँह से बोल रहे हों। “इसलिए यह सन्देश सुनाओ। कह दो कि देखो, इस बार मैं उन राष्ट्रों को, जिन्होंने यहूदा के घराने को पार कर लिया है, उन्हें उखाड़ रहा हूँ। पर मैं उन्हें पूरी तरह नहीं उखाड़ूँगा। देखो, एक आने वाला समय है, जब हर कोई अपनी कब्र से उठेगा और यह जानेगा कि उसका भरोसा किस पर था, और किस पर नहीं।”
मैंने मीकायाह की तरफ देखा। “इस चमकदार पुतले में कोई जान नहीं है, बेटे। पर तेरे भीतर, तेरी सांसों में, जो प्राण है, वह उसी की ओर से है। उसकी खोज कर। उसकी व्यवस्था को मान। क्योंकि वही मार्ग है, सच्चा मार्ग। बाक़ी सब, ये सब दिखावे… ये सब घास के समान हैं, जो एक झोंके में उड़ जाती है।”
शाम ढलने लगी थी। पश्चिम की तरफ आकाश सुनहरा और लाल हो रहा था, जैसे कोई विशाल अंगारा धीरे-धीरे बुझ रहा हो। मीकायाह ने उस मूरत को उठाया, और बिना कुछ कहे, उसे पास पड़ी एक टूटी हुई मिट्टी की दीवार के पास रख दिया, जहाँ खरपतवार उग आए थे। वह मूरत वहाँ पड़ी रही, उसकी चमक धीरे-धीरे बढ़ती हुई छायाओं में खोने लगी।
हिलकिय्याह और मैं चुपचाप बैठे रहे। हवा में ठंडक घुलने लगी थी। हम दोनों जानते थे कि यह सबक अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य था। नबी की आवाज शायद मंद पड़ गई थी, पर उसका सत्य अब भी जीवित था – एक ऐसा सत्य जो मूरतों की तरह जड़ नहीं था, बल्कि जीवित था, श्वास लेता था, और उन सभी के लिए प्रतीक्षा कर रहा था जो अपने हृदय से उसे खोजेंगे। और आकाश, वह विशाल और नीला आकाश, उस सच्चे राजा के सिंहासन की निशानी की तरह हम पर मुस्कुरा रहा था।




