यह उस समय की बात है जब यरूशलेम की दीवारें धूल में मिल चुकी थीं। राजा नबूकदनेस्सर की सेना ने नगर को घेर लिया था, और परमेश्वर के मन्दिर के सोने-चाँदी के पात्र भी, जिन पर इज़राइल के पूर्वजों की सांसें लगी थीं, अब बेबीलोन के रास्ते पर थे। हवा में जलते लकड़ी का धुआँ और हार की कड़वाहट घुली थी। उन्हीं दिनों, राजा ने अपने दरबारी अशपनज को आदेश दिया कि इस्राएल की सन्तानों में से कुछ युवकों को चुन लिया जाए – कोई दोष न हो, सुन्दर, हर प्रकार की ज्ञान की बुद्धि से भरे हुए, और जो राजमहल में खड़े होने के योग्य हों।
ऐसे ही चुने गए चार युवक थे: दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल, और अजर्याह। उनके यहूदी नामों में उनके परमेश्वर का स्मरण जुड़ा था – ‘एल’, यानी परमेश्वर। पर अब बेबीलोन की भूमि पर, उन्हें नए नाम मिले। दानिय्येल बन गया बेल्तशत्सर; हनन्याह, शद्रक; मीशाएल, मेशक; और अजर्याह, अबेद्नगो। नाम बदलना केवल पुकारने का तरीका नहीं था; यह उनकी पहचान, उनकी विरासत पर एक चोट थी, मानो कहा जा रहा हो कि अब वे जो थे, वह यहाँ कोई मायने नहीं रखता।
उन्हें तीन वर्ष के लिए राजकीय प्रशिक्षण में डाल दिया गया। उन्हें कसदियों का ज्ञान सीखना था – ज्योतिष, जादू-टोना, भविष्यवाणियों की कला, और न जाने कितनी भाषाएँ। राजा का भोजन और दाखमधु, जो उनके भोजन के लिए नियत था, वह प्रतिदिन परोसा जाने लगा। यह कोई साधारण भोजन न था। यह मोटा-माँस, दारू, और ऐसे पकवान थे जो पहले मूर्तियों को चढ़ाए जाते थे। यहूदी व्यवस्था में यह सब अशुद्ध था। दानिय्येल के मन में एक तूफान उठा। वह जानता था कि यह भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था; यह उसकी आत्मा को, उसकी प्रतिज्ञा को दूषित करने का एक उपकरण था। राजा की कृपा खोने का भय था, पर अपने विश्वास को कलंकित करने का भय उससे भी गहरा था।
एक दिन, जब अशपनज आया, दानिय्येल ने धीरे से, पर दृढ़ता से कहा, “हम से प्रार्थना है कि हमें परीक्षा के लिए दस दिन दिए जाएँ। हमें केवल सब्जियाँ खाने और पानी पीने दिया जाए। फिर हमारा मुख और उन युवकों का मुख, जो राजा का भोजन खाते हैं, देख लेना। और जैसा तू देखे, वैसा हमारे साथ करना।”
अशपनज की आँखों में चिंता थी। राजा यदि इन युवकों को दुबला-पतला देखता, तो उसका अपना सिर जोखिम में पड़ जाता। पर दानिय्येल के चेहरे पर एक ऐसी शांति और निश्चय था कि अशपनज ने हाँ कर दी। शायद उसे भी कुछ अलग ही आशा थी।
अगले दस दिन एक मौन प्रयोग की तरह बीते। जहाँ अन्य युवक मोटे माँस और दाखमधु से अपनी जिह्वा तृप्त करते, वहीं चारों मित्र साधारण दाल, सब्जियाँ, और साफ पानी पर निर्भर रहे। भोजन का स्वाद फीका था, पर उनकी प्रार्थनाएँ मीठी थीं। वे यहोवा से प्रतिदिन बल माँगते, न केवल शरीर के लिए, बल्कि मन की दृढ़ता के लिए। दानिय्येल कभी अपने छोटे कमरे की खिड़की से पश्चिम की ओर देखता, जहाँ यरूशलेम था, और मन ही मन भजन गुनगुनाता।
दस दिन बीते। अशपनज उन्हें देखने आया। उसने दानिय्येल, शद्रक, मेशक और अबेद्नगो के चेहरों को निहारा। वह चकित रह गया। अन्य सभी युवकों की तुलना में इनके मुख अधिक तेजोमय, शरीर अधिक स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट लग रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई अदृश्य हाथ उन्हें पोषित कर रहा हो, केवल सब्जियों के सहारे ही नहीं, बल्कि आस्था के बल पर। अशपनज ने राहत की सांस ली, और तब से उन्हें वही साधारण भोजन दिया जाने लगा।
परमेश्वर की कृपा केवल शारीरिक नहीं थी। जैसे-जैसे समय बीता, उसने इन चारों युवकों को हर प्रकार की ज्ञान-बुद्धि और समझ प्रदान की। दानिय्येल तो स्वप्नों और दर्शनों को समझने में भी निपुण हो गया। तीन वर्ष की अवधि पूरी हुई। जब राजा नबूकदनेस्सर के सामने सभी युवकों को लाया गया, और राजा ने उनसे वार्तालाप किया, तो दानिय्येल, हनन्याह, मीशाएल और अजर्याह सबमें दस गुना अधिक योग्य और ज्ञानी पाए गए। वे समस्त जादूगरों और तन्त्रवादियों से कहीं अधिक दूरदर्शी और बुद्धिमान थे।
और इस प्रकार, एक पराये देश में, अपने नाम तक छीन लिए जाने के बाद भी, उन चार युवकों ने एक बात कभी नहीं छोड़ी: अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति वह निष्ठा, जो भोजन की थाली से शुरू होकर, राजदरबार की चमक तक में उनका मार्गदर्शन करती रही। यह केवल एक कहानी का आरम्भ था, एक लम्बे संघर्ष और विश्वास की पहली जीत, जो आने वाले समय में और भी भयंकर परीक्षाओं में उनकी शक्ति बनी रहेगी।




