वह दिन ढल रहा था और यरूशलेम की हवा में पत्थर की धूल और उदासी का स्वाद था। जकर्याह खंडहर हो चुके मन्दिर के आँगन में खड़ा था। उसकी आँखों के सामने बिखरे पत्थरों के ढेर थे, जो एक ऐसी महिमा की याद दिला रहे थे जो अब केवल बुजुर्गों की कहानियों में बची थी। उसके मन में वही प्रश्न घूम रहा था जो हर उस इंसान के मन में था जो बाबेल से लौटा था: क्या यह छोटा सा, संघर्षों से भरा पुनर्निर्माण, सचमुच परमेश्वर की महान प्रतिज्ञाओं की पूर्ति है? हवा ठंडी होने लगी थी।
तभी, एक नींद जैसी अवस्था, पर नींद नहीं, उस पर छा गई। वह स्वप्न में नहीं, पर एक जागृत दर्शन में था। सब कुछ धुंधला सा हो गया, और फिर एक तेज, सुनहरी रोशनी ने उसे घेर लिया। उसके सामने एक दृश्य उभरा: शुद्ध सोने का बना एक दीपाधार। उसके ऊपर एक कटोरा था, और उस कटोरे से सात दीपक निकल रहे थे – हरेक के ऊपर सात-सात बत्तियाँ। रोशनी इतनी तेज नहीं थी कि आँखें चौंधिया जाएँ, बल्कि एक गर्म, जीवंत चमक थी, जैसे जीती-जागती आशा। और वह रोशनी कटोरे से निकलकर, सात नलिकाओं के जरिए, उन सात दीपकों को जलाती हुई फैल रही थी। कोई तेल नहीं डाला जा रहा था, फिर भी वह जलते ही जा रहे थे।
और फिर उसने देखा – दीपाधार के दोनों ओर, दो जैतून के वृक्ष। एक दाहिनी ओर, एक बाईं ओर। उनकी शाखाएँ हरे-चाँदी के पत्तों से लदी थीं, और उनकी टहनियों से सुनहरा तेल एक सूक्ष्म, निरंतर धारा में बह रहा था। यह तेल सीधे उस कटोरे में गिर रहा था, बिना किसी मानवीय हाथ के, बिना किसी परिश्रम के। एक अटूट, स्वतः सिंचित स्रोत।
तभी एक स्वर उसके कानों में गूंजा, जो हवा की सरसराहट जैसा नहीं, बल्कि मन के भीतर उठती एक स्पष्ट बात जैसा था: “यह क्या है, हे जकर्याह?”
जकर्याह हैरान था। यह दृश्य इतना रहस्यमय था। उसने कहा, “हे मेरे प्रभु, मैं नहीं जानता।”
और फिर वही स्वर उत्तर देता है, धीमा पर गहरा: “यह यहोवा का जरूबब्बेल से कहा हुआ वचन है: ‘न तो सेना के बल से, और न ही शक्ति से, बल्कि मेरे आत्मा के द्वारा ही यह काम पूरा होगा।’ हे महापर्वत, तू क्या है? जरूबब्बेल के सामने तू एक मैदान हो जाएगा। वह अनुग्रह के पत्थर को निकालेगा, और सब देखनेवाले पुकार उठेंगे: ‘क्या ही भला! क्या ही सुंदर!’”
शब्द जकर्याह के मन में गूँज रहे थे – ‘मेरे आत्मा के द्वारा।’ वह उन बिखरे पत्थरों की ओर देख रहा था, उस थोड़ी-सी प्रगति की ओर जो उन्होंने की थी, उन विरोधों की ओर जिनका सामना करना पड़ा था। क्या यह सब मनुष्य के पराक्रम से होगा? नहीं। यह तो वही आत्मा करेगा, जो इन जैतून के वृक्षों से तेल की तरह निरंतर बह रहा है।
फिर दर्शन और भी स्पष्ट हुआ। उसने फिर पूछा, “ये दाईं और बाईं ओर के ये दो जैतून के वृक्ष क्या हैं?” और थोड़ी देर बाद, “ये दो सोने की नलियाँ जो उन जैतून के वृक्षों से सुनहरे तेल की धारा उण्डेलती हैं, क्या हैं?”
उत्तर आया: “ये वे दो अभिषिक्त हैं जो सारी पृथ्वी के प्रभु के सामने खड़े रहते हैं।”
और तभी दर्शन का अर्थ उस पर टूट पड़ा, जैसे सुबह का सूरज पहाड़ियों पर। दीपाधार – यह परमेश्वर की वह स्थिर, निरंतर उपस्थिति थी जो उसके लोगों के बीच रोशनी फैलाती है। सात दीपक – पूर्णता, उसकी आँखें जो सारी पृथ्वी पर घूमती हैं। और वह तेल? वह परमेश्वर का आत्मा था, जो मनुष्य के व्यर्थ परिश्रम से नहीं, बल्कि स्वर्गीय स्रोतों से सीधे बहता है। वे दो वृक्ष – यहोशू महायाजक और जरूबब्बेल, वे अभिषिक्त, जो राजा और याजक के रूप में परमेश्वर के माध्यम बने हुए थे। वह पहाड़ – वह विरोध, वह निराशा, वह असंभव सा लगने वाला काम – वह मैदान हो जाएगा।
जकर्याह की आँखें खुलीं। अँधेरा हो चुका था, और आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसके आसपास वही खंडहर पड़े थे। लेकिन कुछ बदल गया था। हवा में अब केवल धूल का स्वाद नहीं था। उसे एक आशा की महक महसूस हुई, जैसे बारिश के बाद जमीन से उठने वाली सोंधी गंध। वह उठा, और उसने उन पत्थरों की ओर देखा। अब वे केवल बिखरे हुए पत्थर नहीं लग रहे थे। वे उस अनुग्रह के पत्थर थे, जिन्हें जरूबब्बेल निकालेगा। काम बहुत बड़ा लगता था, साधन बहुत कम। लेकिन अब वह जानता था कि यह उसकी सेना या उसके बल से पूरा नहीं होगा। यह उस आत्मा की सहज, निरंतर, अदृश्य धारा से पूरा होगा, जो स्वर्ग से सीधे उनके मध्य बह रही थी, उन्हें शक्ति दे रही थी, उन्हें जलाए रख रही थी।
उसने एक लम्बी साँस ली, और मन्दिर की नींव की ओर बढ़ चला। रात के अँधेरे में, उसे अपने कदमों की आहट सुनाई दे रही थी। लेकिन उसके मन की आँखों के सामने अब भी वह सोने का दीपाधार टिमटिमा रहा था – न बुझने वाली, न रुकने वाली रोशनी, जो न तो मनुष्य के हाथ से जलती थी और न ही उसके हाथ से बुझाई जा सकती थी।




