पवित्र बाइबल

क्षमा का असीम सागर

कफरनहुम की गलियों में दोपहर की धूप तिरछी पड़ रही थी। पत्थरों के घरों से उठती गर्मी की लहर हवा में तैर रही थी। यीशु, थके हुए कदमों से चलते हुए, एक बरगद के पेड़ की छाया में बैठ गए। उनके चेहरे पर एक गहरी सी स्थिरता थी, मानो कोई भारी बात उनके मन में घूम रही हो। शिष्य धीरे-धीरे इकट्ठा होने लगे। पतरस, जो हमेशा सबसे आगे रहता, अपने माथे का पसीना पोंछता हुआ पास आ बैठा। उसकी आँखों में एक सहज जिज्ञासा थी।

“गुरु,” पतरस ने पूछा, “अगर कोई भाई मेरे साथ दुर्व्यवहार करे, तो मैं उसे कितनी बार क्षमा करूँ? क्या सात बार पर्याप्त है?”

यीशु ने पतरस की ओर देखा। एक कोमल, पर दूर तक जाने वाली मुस्कान उनके होंठों पर आई। “मैं तुमसे कहता हूँ, सात बार नहीं,” उनकी आवाज़ में एक ठहराव था, “बल्कि सात गुना सत्तर बार।”

शिष्य चुप हो गए। यह संख्या, इतनी बड़ी, मानो क्षमा के सागर की गहराई बता रही थी। तभी यीशु ने हाथ का इशारा किया। एक छोटा बच्चा, शायद आठ-नौ साल का, जो पास ही अपनी माँ के साथ खड़ा था, दौड़ता हुआ आया। यीशु ने उसे अपने पास बैठा लिया। बच्चे के गाल गुलाबी थे, उसकी आँखों में बिना किसी छल की चमक।

“सुनो,” यीशु ने कहा, और उनकी आवाज़ गंभीर हो गई, “यदि तुम फिर से बच्चों की तरह न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। जो कोई इस छोटे से बच्चे की तरह अपने आप को दीन करे, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है। और जो ऐसे किसी एक बच्चे को, जो मेरे नाम पर विश्वास करता है, ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है।”

उन्होंने बच्चे के सिर पर हाथ रखा। “लेकिन जो कोई इन छोटों में से किसी एक को, जो मुझ पर विश्वास करते हैं, ठोकर खिलाए, उसके लिए यही अच्छा होगा कि उसकी गर्दन में चक्का लटका दिया जाए और वह समुद्र की गहराई में डुबो दिया जाए। संसार के लिए यह ठोकरें आनी ही हैं, परन्तु उस व्यक्ति पर हाय जिसके द्वारा ठोकर आती है।”

दृश्य बदल गया। अब यीशु एक भेड़ की कोठरी के पास खड़े थे, चरवाहे दिन भर की थकान के बाद भेड़ों को गिन रहे थे। “तुम क्या सोचते हो?” यीशु ने पूछा, “अगर किसी के पास सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को पहाड़ पर छोड़कर, उस भटकी हुई भेड़ को ढूंढने नहीं जाएगा? और यदि वह उसे पा ले, तो मैं तुमसे सच कहता हूँ, वह उस एक भेड़ पर निन्यानबे पर जो नहीं भटकीं, उससे अधिक आनन्दित होता है। इसी तरह तुम्हारे स्वर्गीय पिता की इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।”

शाम ढलने लगी थी। यीशु ने फिर बात जारी रखी, पर इस बार उनकी आवाज़ में एक व्यावहारिक, स्पष्ट सी धार थी। “अगर तुम्हारा भाई तुम्हारे विरुद्ध पाप करे, तो जाओ और उसे अकेले में समझाओ। यदि वह तुम्हारी सुन ले, तो तुमने अपने भाई को जीत लिया। पर यदि न सुने, तो एक या दो और व्यक्तियों को साथ लेकर जाओ, ताकि हर बात दो या तीन गवाहों के मुँह से पुष्ट हो जाए। और यदि वह उनकी भी न सुने, तो मण्डली से कहो। और यदि वह मण्डली की भी न सुने, तो उसके लिए अन्यजाति और लेखक की तरह समझो।”

पतरस ने सोचा, यह तो बहुत स्पष्ट नियम है। पर यीशु की बात अभी ख़त्म नहीं हुई थी। “मैं तुमसे सच कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वह स्वर्ग में बँधा हुआ ठहरेगा; और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुला हुआ ठहरेगा। फिर मैं तुमसे यह भी कहता हूँ, कि यदि तुम में से दो व्यक्ति पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर प्रार्थना करें, तो जो कुछ वे माँगेंगे, वह मेरे स्वर्गीय पिता की ओर से उनके लिए किया जाएगा। क्योंकि जहाँ दो या तीन व्यक्ति मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।”

फिर, मानो सब कुछ एक बिंदु पर केन्द्रित हो रहा हो, यीशु ने एक कहानी सुनानी शुरू की। उनकी आँखों में एक दूर की चमक थी। “स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिसने अपने सेवकों से हिसाब लेना चाहा। जब वह हिसाब लेने बैठा, तो एक व्यक्ति उसके सामने लाया गया, जो उसका दस हज़ार तालन्त का ऋणी था। चुकाने के लिए उसके पास कुछ न था।”

यीशु ने शब्दों से एक चित्र खींचा – वह राजा, क्रोधित, आदेश देता है कि सेवक, उसकी पत्नी, बच्चे और सब कुछ बेचकर ऋण चुकाया जाए। सेवक गिड़गिड़ाता है, “महाराज, धैर्य रख, मैं सब कुछ चुका दूंगा।” राजा का हृदय द्रवित हो जाता है। वह न केवल उसे छोड़ देता है, बल्कि उसका सारा ऋण माफ़ कर देता है।

“पर वही सेवक,” यीशु की आवाज़ कठोर हो गई, “बाहर जाकर अपने साथी सेवक से मिला, जो उसका सौ दीनार का ऋणी था। उसने उसे पकड़ लिया और गला दबाकर कहने लगा, ‘अपना ऋण चुका दे।’ उसका साथी उसके पैरों पर गिर पड़ा और विनती करने लगा, ‘मुझ पर धैर्य रख, मैं सब कुछ चुका दूंगा।’ पर उसने न माना, और जाकर उसे तब तक कैद में डलवा दिया, जब तक वह ऋण न चुका दे।”

सुनने वालों की सांसें रुक सी गईं। “जब अन्य सेवकों ने यह देखा, तो बहुत दुखी हुए, और जाकर राजा को सब कुछ बता दिया। तब राजा ने उस सेवक को बुलवा भेजा, और उससे कहा, ‘हे दुष्ट सेवक, जब तू ने मुझ से विनती की, तो मैंने तेरा वह सारा ऋण क्षमा कर दिया। क्या तुझे भी अपने साथी सेवक पर दया नहीं खेलनी चाहिए थी, जैसे मैंने तुझ पर दया की?’ और राजा क्रोधित होकर, उसे यातनाकर्ताओं के हवाले कर दिया, जब तक कि वह सारा ऋण न चुका दे।”

यीशु ने एक लंबी सांस ली। शाम की लाली आकाश में फैल रही थी। उनकी आवाज़ अंतिम चेतावनी की तरह गूंजी, “इसी प्रकार यदि तुम में से हर एक अपने भाई को मन से क्षमा न करेगा, तो मेरा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।”

वहाँ बैठे शिष्यों के मन में शब्द गूंज रहे थे – क्षमा, वह जो दिया गया है उसे बाँटना, छोटों का सम्मान, भटके हुए की खोज। यह सिर्फ नियम नहीं था; यह एक नई हृदय की दशा थी। पतरस ने अपने हाथों की मुट्ठियाँ खोलीं, मानो किसी भारी चीज़ को छोड़ रहा हो। दूर, भेड़ों की घंटियों की आवाज़ हवा में तैर रही थी, और एक बच्चे की हँसी, बिल्कुल स्पष्ट, उस शाम की शांति में घुल मिल गई।

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