पवित्र बाइबल

अंतिम भोज और वादा

उस ऊपरी कक्ष में हवा भारी थी। दिन भर की बातें, उस अजीब सी गूँजती चेतावनी कि ‘तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा,’ ने सबके मन को एक पत्थर की तरह दबोच रखा था। दीवार पर तेल के दीपक की लौ हल्की हवा से डगमगाती, और उसकी छायाएँ उनके चेहरों पर नाचतीं, जो भविष्य के एक काले, अनजाने गड्ढे की ओर देख रहे थे।

यीशु ने चारों ओर देखा। उसकी आँखों में वही थकान नहीं थी जो बाकियों के चेहरों पर थी; बल्कि एक गहरी, अथाह कोमलता थी, जैसे कोई माँ रात में जागकर बीमार बच्चे को सहलाती है।

“तुम्हारा मन व्याकुल न हो,” उसकी आवाज़ धीमी थी, पर ऐसी कि हर शब्द उस भारी हवा को चीरता हुआ सीधे उनके भीतर उतर गया। “परमेश्वर पर विश्वास रखो, मुझ पर भी विश्वास रखो।”

पतरस ने सिर उठाकर देखा, पर कुछ बोला नहीं। उसके मन में अभी भी वही बात घूम रही थी, कि वह तो सब छोड़कर, यहाँ तक कि प्राण देकर भी उसके साथ रहेगा। पर यीशु ने उसकी ओर देखा, मानो उसकी सोच पढ़ रहा हो, और एक दुखभरी मुस्कान उसके होंठों पर आई।

“मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं,” यीशु बोले, उनकी ओर देखते हुए। “यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता। मैं तुम्हारे लिए जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिए जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा, ताकि जहाँ मैं रहूँ, वहाँ तुम भी रहो।”

शब्द तो स्पष्ट थे, पर उनका अर्थ एक धुंधली, दूर की किसी चीज़ की तरह लग रहा था। थोमा, जिसका मन हमेशा हाथों से छूकर देखने वाली चीज़ों में अटकता था, बेचैन हो उठा। उसने अपनी मोटी उँगलियों से अपनी दाढ़ी को सहलाते हुए पूछा, “प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहाँ जा रहा है, तो हम मार्ग कैसे जान सकते हैं?”

यीशु ने थोमा की ओर देखा। उसकी आँखों में कोई नाराज़गी नहीं, बल्कि एक अनुकंपा थी, जैसे कोई शिक्षक बच्चे की उलझन को समझ रहा हो। “मार्ग मैं ही हूँ,” उसने कहा, और उसका स्वर इतना साधारण था, जैसे वह ‘पानी पिला दो’ कह रहा हो। “सत्य भी मैं ही हूँ, और जीवन भी मैं ही हूँ। कोई भी पिता के पास मेरे द्वारा ही आ सकता है।”

कुछ पल की खामोशी छा गई। दीपक की लौ सीधी खड़ी हो गई। तभी फिलिप्पुस, जो शायद सबसे अधिक भावुक था, अपनी जगह से उठकर बैठ गया। उसके चेहरे पर एक ऐसी लालसा थी, एक ऐसी साधारण, बच्चों जैसी इच्छा, जो सब कुछ समझने के बावजूद नहीं मिटती। “प्रभु,” उसने कहा, आवाज़ में एक कंपकंपी के साथ, “हमें पिता दिखा दे, और यही हमारे लिए बहुत है।”

यीशु ने फिलिप्पुस की ओर देखा। उसकी आँखों में एक ऐसा दर्द उभरा, जैसे कोई बहुत गहरा घाव छू गया हो। “फिलिप्पुस,” उसने कहा, और नाम का उच्चारण इतने प्यार से हुआ कि वह शब्द ही एक आलिंगन बन गया। “इतने दिनों तक मैं तुम्हारे साथ रहा, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है, उसने पिता को देखा है। तू कैसे कहता है, ‘हमें पिता दिखा दे?’ क्या तू विश्वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ, और पिता मुझ में है?”

उसने रुककर साँस ली, मानो इन सत्यों का भार उसके स्वयं के हृदय पर भी पड़ रहा हो। “मेरे कहे हुए वचन, मैं अपनी ओर से नहीं कहता; पर पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है। मेरा विश्वास करो, कि मैं पिता में हूँ, और पिता मुझ में है। नहीं तो, कामों ही के कारण मेरा विश्वास करो।”

और फिर वह बोले, उन सबकी ओर देखते हुए, जैसे भविष्य की हर पीड़ा, हर अकेलेपन, और हर मृत्यु को अपनी आँखों में समेट रहे हों। “मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है, जो काम मैं करता हूँ, वह भी वह करेगा; और इनसे भी बड़े काम करेगा, क्योंकि मैं पिता के पास जाता हूँ।”

बाहर रात और गहरी होती जा रही थी। ऊपरी कक्ष में वह संकेत, वह वादा, एक नए प्रकार के साहस की तरह हवा में तैरने लगा। “और मैं पिता से बिनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे। सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि न तो उसे देखता है, और न उसे जानता है। तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।”

उसने अपनी बात जारी रखी, उनके भीतर की बढ़ती हुई समझ को, उनकी चिंताओं को सहलाते हुए। वह उन्हें अनाथ नहीं छोड़ेगा। वह उनके पास वापस आएगा। और एक दिन, वह बोध होगा कि वह उनमें है, और वे उसमें, और पिता उसमें। जो आज्ञा उसने दी, प्रेम की आज्ञा, उसी में सब कुछ समाहित है।

अंत में, उसने कहा, “मैं तुम्हें शांति देता हूँ, अपनी शांति तुम्हें देता हूँ। जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता। तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।”

यह कहकर वह चुप हो गया। दीपक की लौ अब भी जल रही थी, स्थिर और निरंतर। बाहर, यरूशलेम की गलियों से रोमन सैनिकों के जूतों की आहट आ रही थी, और दूर कहीं एक कुत्ता भूँक रहा था। पर उस कमरे में, उन चौदह लोगों के बीच, एक अजीब सी शांति उतर आई थी। वह शांति न तो संकटों का अंत थी, न भय का अभाव। बल्कि वह एक गहरी, अटल निश्चितता थी, जैसे पानी की गहराई में पत्थर का डेरा। यह वह शांति थी जिसका उसने वादा किया था। और उस रात, जबकि अँधेरा सबसे सघन था, वह शांति उनके भीतर एक दीपक की तरह जलने लगी।

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