यहोवा की आज्ञा के अनुसार मिलापवाले तम्बू के सामने का आंगन सुबह-सुबह ही जीवंत हो उठता था। हवा में घास और जलती हुई लकड़ी की गंध मिली-जुली रहती, और भोर की ठंडी हवा में धुएं के कुंडल ऐसे उठते मानो प्रार्थनाएँ सीधे स्वर्ग की ओर जा रही हों। उस दिन भी कुछ ऐसा ही था। अहीर, शिमोन का बड़ा बेटा, एक दोषरहित युवा बछड़े को लेकर आंगन के द्वार पर खड़ा था। उसके हाथ बछड़े की गरदन पर रखे थे, जो शांत खड़ा था, मानो अपनी नियति को समझता हो। अहीर के माथे पर पसीना था, वह कोहनी से पोंछता रहा। उससे भूल हो गई थी। समुदाय के लिए तैयार किया जाने वाला विशेष अन्नबलि वह भूल गया था—एक ऐसी चूक जो पूरे गोत्र के लिए अशुद्धि ले आई थी। यह कोई जानबूझकर किया गया पाप नहीं था, न ही विद्रोह। बस, एक स्मृति-चूक, जो अब सामने खड़े इस निरीह प्राणी के जीवन की कीमत चुकाएगी।
हारून के पोते, याजक एलियाकीम, हाथ धोकर बाहर आए। उनके सफेद सनी के वस्त्रों पर कहीं-कहीं राख के धब्बे थे, यह दर्शाते हुए कि वह पहले से ही अपने पवित्र कर्तव्यों में लगे हुए थे। उनकी आँखों में कोई कठोरता नहीं, बल्कि एक गहरी, दुखभरी गंभीरता थी। उन्होंने बिना कुछ कहे अहीर के हाथ से बछड़े की रस्सी ली और उसे वेदी के पास ले गए। प्रक्रिया आरम्भ हुई।
“हे यहोवा,” एलियाकीम ने मंद स्वर में कहा, “तेरी दृष्टि में जो अशुद्ध हुआ है, उसे शुद्ध कर।” अहीर ने, जैसा कि नियम था, अपने दोनों हाथ बछड़े के सिर पर रख दिए। उसकी हथेलियों के नीचे जानवर की गर्माहट और नब्ज की धड़कन महसूस हो रही थी। उस पल का भार अथाह था—एक जीवन उसकी भूल की कीमत चुकाने वाला था। उसने आँखें मूँद लीं। वेदी के पास का स्थान पूरी तरह शांत हो गया, सिवाय दूर कहीं एक पक्षी के चहकने के।
एलियाकीम ने तेज चाकू से एक ही वार में काम कर दिया। बछड़ा बिना किसी संघर्ष के नीचे गिर गया। गर्म, गाढ़ा लहू तेजी से बह निकला, और एलियाकीम ने उसे एक कटोरे में एकत्र किया। लहू की गंध, मिट्टी और ताजे मांस की गंध के साथ मिलकर, हवा में फैल गई। फिर याजक ने अपनी उँगली लहू में डुबोई, और मिलापवाले तम्बू के भीतर जाकर, पर्दे के सामने वाले सोने के धूपवेदी के सींगों पर सात बार लहू लगाया। हर बार की बूँद एक गूँजती हुई प्रार्थना थी—शुद्धिकरण की, क्षमा की। शेष लहू उसने आंगन में ही वेदी के तले पर डाल दिया, जहाँ वह भूरी मिट्टी में समा गया।
अब काटने का काम शुरू हुआ। एलियाकीम के हाथ कुशलतापूर्वक चल रहे थे। चमड़ी उतारी गई। फिर उसने बछड़े के सारे मांस के टुकड़े किए—सिर, चर्बी, कलेजा, वृक्क—सब कुछ अलग किया। वह चर्बी जो आँतों को ढकती है, और वृक्कों के ऊपर की चर्बी, सब कुछ सावधानी से निकाला गया। ये सब वेदी पर रख दिए गए। लकड़ियों पर आग जल रही थी। एलियाकीम ने सारे अंगों को वेदी पर रखा, और एक भारी, मीठी गंध ने आंगन को भर दिया—यहोवा के लिए सुखद सुगंध। यह दृश्य कठोर था, पर आवश्यक था। यह अनुग्रह का एक कठोर चित्र था—पाप, चाहे वह कितना ही अनजाने में क्यों न हो, एक कीमत माँगता है।
बचा हुआ मांस—सारा बछड़ा—एलियाकीम ने शिविर के बाहर, एक स्वच्छ स्थान पर ले जाकर जला दिया। वहाँ की राख हवा में उड़ी, और धुएं का एक काला स्तंभ आकाश में उठने लगा। अहीर दूर खड़ा यह सब देखता रहा। उसके मन में एक अजीब सी शांति थी। भय नहीं, बल्कि एक गहरा अफसोस, और फिर एक ढीलापन। जो भूल हुई थी, उसके लिए प्रायश्चित हो गया था। समुदाय फिर से शुद्ध था। वह मुड़ा और अपने तम्बू की ओर चल पड़ा। उसके पैरों तले रेत चरचरा रही थी।
एलियाकीम वेदी के पास वापस आया, और उसने अपने हाथ और पाँव धोए। पानी उसकी उँगलियों से गिरता हुआ लहू के धब्बों को धीरे-धीरे हल्का कर रहा था। उसने आकाश की ओर देखा। बादल सफेद और कोमल थे। नियम कठोर थे, पर वह अनुग्रह के नियम थे। परमेश्वर ने उस अज्ञान के लिए भी एक मार्ग दिया था, एक रास्ता बनाया था जिससे उसके और उसके लोगों के बीच का रिश्ता टूटे नहीं। यह कृपा थी, एक ऐसी कृपा जो लहू और आग से होकर गुजरती थी, ताकि मनुष्य फिर से शुद्ध खड़ा हो सके। वह एक लम्बी सांस लेकर अंदर चला गया, अगले कार्य की तैयारी में। आंगन में केवल वेदी पर जलती हुई आग की सिसकारी रह गई थी, और हवा में चिपचिपी, पवित्र गंध तैर रही थी।




