पवित्र बाइबल

यर्दन नदी का चमत्कारी पार

शिखरों से उतरती ठंडी हवा ने यरीहो के मैदान की गर्मी को थोड़ा तोड़ा था, पर भीड़ के मन में उत्सुकता का ताप बढ़ता ही जा रहा था। तीन दिन से वे इसी यर्दन नदी के किनारे डेरा डाले हुए थे। आज सुबह से ही अफवाहों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था – “आज ही पार होना है। बिना नाव, बिना पुल। भला कैसे?”

यहोशू, जिसके चेहरे पर मूसा जैसी दाढ़ी अब पूरी सफेद हो चुकी थी, लेकिन आँखों में वही पुरानी चिंगारी बची थी, ने सरदारों को बुलाया था। उसकी आवाज़ में कोई उतावलापन नहीं, बस एक गहरी, दृढ़ शांति थी। “लोगों के बीच जाओ और कहो – ‘यहोवा के सन्दूक के पीछे-पीछे चलना, पर उससे एक हजार हाथ की दूरी बनाए रखना। ताकि तुम जान सको कि किस मार्ग से जाना है, क्योंकि इस मार्ग से तुम पहले कभी नहीं गए।’”

लोग सुनकर चुप हो गए। सन्दूक – वही सोने से मढ़ा हुआ, जिसमें दस आज्ञाओं वाली पट्टिकाएँ थीं। वही, जिसके ऊपर करूबों के पंखों के बीच यहोवा की महिमा विराजती थी। उसे आगे चलने का आदेश? मतलब, स्वयं परमेश्वर ही रास्ता दिखाएंगे।

दोपहर ढलते-ढलते आदेश फैल गया। “कल सुबह तैयार रहना।” रात भर कितनों की नींद उड़ी रही होगी। बूढ़े, जो मिस्र की गुलामी और चालीस वर्ष के जंगल की यादों से भरे थे, वे शायद मूसा के समय किए गए उस महान कार्य – लाल समुद्र के फटने – के बारे में बता रहे थे। जवान, जिन्होंने केवल रेगिस्तान की रेत ही देखी थी, वे एक नई भूमि के सपने संजोए थे।

सूरज अभी पूरी तरह उगा भी नहीं था कि यहोशू ने कहा, “पवित्र करो अपने आपको। क्योंकि कल यहोवा तुम्हारे बीच अद्भुत काम करेगा।”

फिर वह क्षण आया। कोहनियों के पुरोहित, अपने कंधों पर सन्दूक के डंडे उठाए, भीड़ से अलग होकर आगे बढ़े। उनके कदमों में एक अजीब-सा भार था – न सिर्फ सोने और शित्तीम की लकड़ी का भार, बल्कि एक ईश्वरीय प्रतिज्ञा का भार। लोग चुपचाप, एक सुनसान सी श्रद्धा के साथ, उनके पीछे चल पड़े। बीच में वह निर्धारित दूरी – एक हजार हाथ – जैसे एक अदृश्य रेखा थी, जो मनुष्य और पवित्रता के बीच खिंची हुई थी।

यर्दन नदी अपने वसंत ऋतु के उफान पर थी। बर्फ़ीले पहाड़ों का पानी पिघल-पिघलकर उसमें उतर रहा था, और वह अपने किनारों को चीरती हुई, गहरी और खतरनाक, आगे बह रही थी। पानी का शोर दूर से ही सुनाई देने लगा। जैसे-जैसे वे नज़दीक आते गए, वैसे-वैसे हृदय की धड़कने तेज़ होती गईं। क्या सचमुच इसे पार करना है?

यहोशू ने भीड़ को रोका। सबकी नज़रें उन पुरोहितों पर टिक गईं, जो बिना रुके, बिना डरे, सीधे उस उफनती नदी की ओर बढ़ रहे थे। नदी का किनारा चट्टानी और फिसलन भरा था। पहले पुरोहित का पैर ज्योंही पानी को छूने ही वाला था… एक सांस रुक गई। हज़ारों लोग एक साथ स्तब्ध।

पैर पानी में पड़ा। और फिर… कुछ नहीं हुआ। वे तो आगे बढ़ते रहे। दूसरा कदम, तीसरा… और तभी, अचानक, ऐसा लगा जैसे दूर उत्तर की ओर, शहर आदाम के पास, कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो। बहता हुआ पानी एकदम थम गया। उसकी धारा कट गई। और दक्षिण की ओर, नमकीन समुद्र की तरफ, पानी सिमटता चला गया, बहता रहा, जब तक कि नदी की पूरी तलहटी सूखी नहीं दिखने लगी।

पल भर को सन्नाटा छा गया। फिर एक सामूहिक साँस, हैरानी और विस्मय से भरी, हज़ारों कंठों से एक साथ निकली। सामने, जहाँ कल तक पानी का बहाव था, अब कीचड़ से सनी हुई नदी की भूमि दिख रही थी – चिकनी, चमकदार, उसमें पानी के रुक जाने से बने हुए ऊँचे-ऊँचे जल-स्तम्भ दूर उत्तर में दिखाई दे रहे थे, जमे हुए और स्थिर।

पुरोहित सन्दूक को उठाए, उस सूखी तलहटी के बीचोबीच जाकर खड़े हो गए। यहोशू का हाथ उठा। “अब पार चलो। इस्राएल के लोगों, देख लो कि जीवते परमेश्वर तुम्हारे बीच हैं।”

और फिर शुरू हुई वह अद्भुत गुज़र। पुरुष, स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, अपना-अपना सामान समेटे, एक-एक करके उस सूखी नदी की भूमि पर उतरे। कदमों की आहट, गाड़ियों के पहियों की चरचराहट, पशुओं की रंभाहट – सब मिलकर एक नया स्वर बना रहे थे। लोग चलते हुए भी दाएं-बाएं देखते रहे – वह पानी का बना हुआ भयानक बाँध दूर खड़ा था, मानों स्वयं प्रकृति ने आज्ञा मान ली हो। कुछ बुजुर्गों की आँखों से आँसू बह रहे थे; यह दृश्य उन्हें लाल समुद्र की याद दिला रहा था। पर यह उससे भी भिन्न था। वहाँ मूसा थे, यहाँ यहोशू। वहाँ पलायन था, यहाँ प्रवेश।

सारी प्रजा सकुशल पार हो गई। तब यहोशू ने एक और आज्ञा दी। बारह गोत्रों में से हर एक से एक-एक व्यक्ति चुना गया। उन्हें उस सूखी नदी की तलहटी में, उसी स्थान पर जहाँ सन्दूक ढोने वाले पुरोहितों के पैर खड़े थे, जाकर एक-एक बड़ा पत्थर उठाने को कहा गया। भारी, कीचड़ से सने पत्थर। वे उन्हें उठाकर दूसरे किनारे पर ले आए, और गिलगाल नामक स्थान पर, उन्हें एक स्मारक के रूप में खड़ा कर दिया।

“भविष्य में,” यहोशू ने घोषणा की, “जब तुम्हारे बच्चे पूछें कि ये पत्थर यहाँ क्यों रखे हैं, तो तुम उन्हें बताना – कि यर्दन नदी का पानी यहोवा के सन्दूक के सामने काट दिया गया था। ये पत्थर इस्राएलियों के लिए सदैव एक स्मृति चिन्ह रहेंगे।”

अंत में, जब सब पार हो चुके, तो यहोशू ने पुरोहितों को आदेश दिया कि वे सन्दूक समेत नदी के इस पार आ जाएँ। ज्योंही उनके पैर सूखी भूमि पर पड़े, त्योंही दूर खड़े हुए जल के स्तम्भ गिर पड़े। पानी उमड़ता हुआ, गरजता हुआ, अपने पुराने रास्ते पर लौट आया, ठीक वैसे ही बहने लगा जैसे पहले बह रहा था।

लोग नदी के किनारे खड़े होकर यह नज़ारा देखते रहे। कुछ काँप रहे थे। कुछ मस्तक झुकाए प्रार्थना कर रहे थे। आज केवल एक नदी पार करने का दिन नहीं था। आज एक सीमा पार हुई थी। वादे की भूमि अब केवल एक सपना नहीं, एक ऐसी वास्तविकता थी, जिसकी मिट्टी उनके पैरों के नीचे थी। और उन सबके मन में यहोशू के वे शब्द गूँज रहे थे, जो उसने पार होने से पहले कहे थे – “इस से तुम जान लोगे कि जीवते परमेश्वर तुम्हारे बीच में हैं।”

और वे जान गए थे। नदी के पानी ने रास्ता दिया था, पर उससे कहीं अधिक, उनके भय ने रास्ता दिया था। अब आगे केवल यरीहो का विशाल द्वार और उसकी दीवारें थीं। पर आज की घटना ने उनके भीतर एक नया विश्वास डाल दिया था – जिस परमेश्वर ने जल को रोक दिया, वह दीवारों को भी गिरा सकता है। सूरज अब ऊँचा चढ़ आया था, और नई भूमि पर पड़ने वाली उसकी किरणें, पुराने रेगिस्तान की धूप से कुछ अलग, कुछ मधुर लग रही थीं।

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