वह दिन भी क्या दिन था जब दमिश्क के राजमहल में ख़ामोशी छाई हुई थी। हवा में ईख की मीठी गंध तैर रही थी, पर नामान, अराम की सेना के प्रधान सेनापति, अपने कक्ष की छत पर टहलते हुए उससे बेखबर थे। उनकी भुजाओं पर, जो शत्रुओं के लिए काँपने का कारण थीं, सफेद चकत्तों का एक मैप बन चुका था। कोढ़। यह शब्द उनके मन में गूँजता रहता, एक अदृश्य शत्रु की तरह जिससे वह युद्ध नहीं लड़ सकते थे।
उनकी पत्नी की दासी, एक इज़राइली लड़की जिसे युद्ध में बंदी बनाकर लाया गया था, ने एक दिन पानी का घड़ा भरते हुए सहज ही कहा था, “काश मेरे स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के सामने होते। वह उसे इस कोढ़ से छुटकारा दिलाता।” ये शब्द एक बीज की तरह गिरे थे। पहले तो नामान ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, पर धीरे-धीरे वह बात उसके मन में घर करने लगी। आखिरकार, उसने राजा से अनुरोध किया।
राजा बन-हदद ने एक पत्र लिखा, सोने-चाँदी के दस तोलों और वस्त्रों के दस जोड़ों के साथ, इज़राइल के राजा के नाम। पत्र में लिखा था, “अब जब यह पत्र तेरे पास पहुँचे, तो देख, मैं ने अपने सेवक नामान को तेरे पास भेजा है, कि तू उसका कोढ़ दूर करे।”
जब इज़राइल के राजा यहोराम ने वह पत्र पढ़ा, तो उसने अपने वस्त्र फाड़ डाले। “क्या मैं परमेश्वर हूँ?” वह चिल्लाया, “क्या मैं मार डाल सकता हूँ या जिला सकता हूँ? यह अराम का राजा मुझसे झगड़ा करने का बहाना ढूँढ रहा है!”
यह सब एलीशा तक पहुँचा। उसने राजा के पास कहला भेजा, “उसने अपने वस्त्र क्यों फाड़े? उसे उस पुरुष को मेरे पास भेज दे, तब वह जान लेगा कि इस्राएल में एक भविष्यद्वक्ता है।”
तो नामान अपने घोड़ों और रथों के साथ एलीशा के घर के द्वार पर आ खड़ा हुआ। उसने सोचा था कि भविष्यद्वक्ता स्वयं बाहर आएगा, कुछ भव्य चमत्कार दिखाएगा। पर एलीशा ने तो बाहर आने तक की कृपा नहीं दिखाई। उसने अपने एक सेवक को भेजकर सन्देश दिलवाया, “जा, यरदन नदी में सात बार नहा ले, तेरा शरीर पहले के समान हो जाएगा, और तू शुद्ध हो जाएगा।”
नामान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह भुनभुनाता हुआ लौटने लगा, “मैंने सोचा था वह निकलकर आएगा, और खड़े होकर अपने परमेश्वर यहोवा का नाम लेकर पुकारेगा, और अपना हाथ उस स्थान पर फेरेगा और कोढ़ को दूर करेगा। क्या दमिश्क की अबाना और पर्पर नदियाँ, इस्राएल की सब नदियों से अच्छी नहीं? क्या मैं उनमें नहाकर शुद्ध नहीं हो सकता?” और वह क्रोध में भरकर अपने रथ की ओर मुड़ा।
तभी उसके कुछ विश्वस्त सेवक पास आए और बोले, “हे मेरे पिता, यदि भविष्यद्वक्ता ने तुझ से कोई बड़ा काम करने को कहा होता, तो क्या तू न करता? फिर जब उसने कहा, ‘नहा ले और शुद्ध हो जा,’ तो तू ने क्यों नहीं माना?”
एक पल की रुकावट। हवा में लटके धूल के कण सूरज की रोशनी में नाच रहे थे। नामान ने अपने हाथों को देखा, उन पर छाए सफेद धब्बे। फिर एक गहरी साँस भरी। उसने अपने रथों को मोड़ने का आदेश दिया।
यरदन नदी के किनारे पहुँचकर उसने अपने वस्त्र उतारे। पानी हल्का मटमैला था, ठंडा। पहली बार डुबकी लगाई तो कुछ नहीं हुआ। दूसरी, तीसरी… हर बार वह बाहर निकलकर अपनी त्वचा की ओर देखता। छठी बार तक भी कोई फर्क नहीं था। उसके हृदय में निराशा का एक ठंडा सा भार बैठने लगा। फिर सातवीं बार। जब वह पानी से निकला, तो उसने अपनी बाँहों को देखा। वे एक नवजात शिशु की त्वचा जैसी कोमल, चिकनी और स्वच्छ थीं। कोई दाग़ नहीं, कोई कलंक नहीं। वह खड़ा रह गया, नदी का पानी उसके शरीर से टपक रहा था, और उसकी आँखों से भी कुछ बूँदें। वह चिल्लाया नहीं, बस धीरे से हँस दिया, एक ऐसी हँसी जो सालों से उसके भीतर कैद थी।
वह अपने सब दल-बल के साथ एलीशा के पास लौटा, और उसके सामने खड़ा होकर बोला, “देख, अब मैं जान गया कि सारी पृथ्वी पर इस्राइल के परमेश्वर के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है।”
उसने भेंट के रूप में लाए हुए सब उपहार देने चाहे, पर एलीशा ने एक दाम तक लेने से इनकार कर दिया। “जिसके जीवन की शपथ यहोवा खाई है, मैं कुछ न लूँगा।”
नामान ने एक अजीब सी प्रार्थना की, “अब तेरा दास एक बात की यहोवा से प्रार्थना करता है… जब मेरा स्वामी रिम्मोन के मन्दिर में जाकर दण्डवत् करे और वह मेरे ऊपर अपना हाथ रखे, तब मैं भी रिम्मोन के मन्दिर में दण्डवत् करूँ। इस बात के लिये यहोवा तेरे दास को क्षमा करे।”
एलीशा ने उससे कहा, “कुशल से जा।”
पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। एलीशा के सेवक गेहजी का मन लालच से भर उठा। उसने सोचा, “मेरे स्वामी ने इस अरामी नामान को कुछ न लेने दिया। जिसके जीवन की शपथ यहोवा खाई है, मैं उसके पीछे दौड़कर कुछ लूँगा ही।” और वह दौड़ा। जब नामान ने उसे देखा, तो रथ से उतरकर उसकी ओर दौड़ा और पूछा, “क्या सब कुशल है?”
गेहजी ने झूठ बोला, “सब कुशल है। मेरे स्वामी ने मुझे भेजा है। उसने कहा है कि अभी-अभी एप्रैम के पहाड़ी देश से दो जवान भविष्यद्वक्ता के पुत्र मेरे पास आए हैं। उनके लिये एक तोला चाँदी और वस्त्रों के दो जोड़े दे दे।”
नामान ने खुशी से दो तोले चाँदी और वस्त्रों के दो जोड़े देकर उसके दो सेवकों को भार सहित भेज दिया। गेहजी ने वे सब चीज़ें अपने कक्ष में छिपा लीं, और एलीशा के सामने आकर खड़ा हो गया।
“गेहजी, तू कहाँ से आ रहा है?”
“तेरा दास कहीं नहीं गया।”
एलीशा की आँखों में एक दुखद ज्ञान था। “क्या वह समय नहीं था जब उस पुरुष ने अपना रथ तेरे लिये मोड़ा? क्या यह समय चाँदी लेने का, वस्त्र लेने का, जैतून के बाग़ लेने का, भेड़-बकरियाँ लेने का, दास-दासियाँ लेने का है? नामान का कोढ़ सदा के लिये तुझ पर और तेरे वंश पर चिपक जाएगा।”
और गेहजी उसी क्षण कोढ़ी हो गया, उसका शरीर सफेद हुआ जाता था, जैसे पहाड़ों पर पड़ी बर्फ। वह चुपचाप निकल गया।
दूर, दमिश्क की ओर बढ़ते हुए नामान के रथ के पहियों से उड़ती धूल आकाश में मिल रही थी। उसकी त्वचा पर सूरज की रोशनी निखर रही थी, पर उसका हृदय उस एक सच्चे परमेश्वर को पहचानने के आनन्द से भी कहीं अधिक गहराई से भरा हुआ था। वह जान गया था कि चमत्कार नदियों की पवित्रता में नहीं, बल्कि एक साधारण आज्ञा में निहित विश्वास में होता है। और कभी-कभी, परमेश्वर की आवाज़ एक शक्तिशाली सेनापति से नहीं, बल्कि एक बंदी दासी की मधुर, विश्वास भरी फुसफुसाहट से आती है।




