पवित्र बाइबल

राजा आसा का आध्यात्मिक पुनरुत्थान

यहूदा के राजा आसा के शासन के पंद्रहवें वर्ष की बात है। वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी थी, पर हवा में अभी भी धूल और नमी का मिला-जुला सा भारीपन था। राजभवन के प्रांगण में खड़े आसा को यह महसूस हो रहा था कि उनका राज्य, बाहरी शांति के बावजूद, भीतर से किसी गहरे क्षय से जूझ रहा था। मिस्र और कूश की सेनाओं से तो उन्होंने विजय पा ली थी, पर लोगों के मनों में वह भय, वह अनिश्चितता बनी हुई थी, जैसे कोई बिना बादलों का तूफ़ान छाया हो।

उसी दिन, दोपहर के समय, एक व्यक्ति राजदरबार में उपस्थित हुआ। वह अजर्याह था, ओदेद नामक एक याजक का पुत्र। उसके वस्त्र साधारण थे, चेहरे पर लम्बी यात्रा की थकान थी, पर आँखों में एक अद्भुत तेज था, जैसे कोई दीपक भीतर से जल रहा हो। उसने कोई औपचारिकता नहीं की। सीधे राजा आसा की ओर देखकर वह बोला, उसकी आवाज़ गूंजती हुई, स्पष्ट और गम्भीर थी।

“हे राजा आसा, और हे यहूदा और बिन्यामीन के सब लोगो, मेरी सुनो। परमेश्वर तुम्हारे साथ है, जब तक तुम उसके साथ रहते हो। यदि तुम उसे ढूँढोगे, तो वह तुम्हें मिलेगा। पर यदि तुम उसे छोड़ दोगे, तो वह भी तुम्हें छोड़ देगा।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। अजर्याह ने पुराने दिनों का स्मरण कराया, उस समय का जब इस्राएल के पास न कोई सच्चा परमेश्वर था, न कोई याजक जो सिखाता, न कोई व्यवस्था। वह कैसा समय रहा होगा – हर कोई अपनी मनमानी करता, रास्तों पर यात्रा करना असुरक्षित, राष्ट्र के बीच उथल-पुथल। “पर जब संकट में उन्होंने परमेश्वर की ओर रुख किया,” अजर्याह की आवाज़ में जोश भर आया, “और उसे ढूँढा, तो उन्होंने उसे पाया।”

वह कुछ पल रुका, उसकी निगाहें राजा के चेहरे पर टिकी थीं। “पर तुम, हे राजा, मजबूत बनो। तुम्हारे हाथ निर्बल न पड़ें, क्योंकि तुम्हारे काम का फल मिलेगा।”

ये शब्द आसा के हृदय में उतर गए, जैसे सूखी धरती में पानी। उन्होंने उन वर्षों को याद किया जब उन्होंने पराए देवताओं की मूर्तियों और वेदियों को हटाने का प्रयास किया था, पर लोगों के मनों से वे छवियाँ कैसे हटतीं? एक उम्मीद, एक नई ऊर्जा ने उन्हें स्पर्श किया। अजर्याह के जाने के बाद भी, उसकी बातें उनके कानों में गूंजती रहीं।

कुछ ही दिनों बाद, आसा ने फैसला किया। उन्होंने पूरे यहूदा और बिन्यामीन से, और एप्रैम के पहाड़ी इलाकों से भी, जहाँ-जहाँ उनका अधिकार था, लोगों को इकट्ठा होने का आदेश दिया। वे सब यरूशलेम आए। यह कोई सैन्य जमावड़ा नहीं था। यह एक अलग ही तरह की एकजुटता थी – किसान, चरवाहे, शिल्पकार, स्त्री-पुरुष, बूढ़े और जवान, सबके चेहरे पर एक जिज्ञासा, एक प्रतीक्षा थी।

इकट्ठा हुए लोगों के सामने, आसा ने फिर से वे शब्द दोहराए जो अजर्याह ने कहे थे। “हम परमेश्वर को ढूँढेंगे, और वह हमें मिलेगा।” फिर एक बड़े काम की शुरुआत हुई। पूरे देश से, हर नगर और गाँव से, उन मूर्तियों को इकट्ठा किया गया जिनकी पूजा चुपके-चुपके या खुलकर की जाती थी। अस्थरोत की कुरूप मूर्तियाँ, विदेशी देवताओं के पत्थर के स्तंभ – सब यरूशलेम लाए गए। उन्हें किद्रोन नदी के पास ले जाया गया। वहाँ, राजा के सामने, उन्हें तोड़कर, कुचलकर, चूर-चूर कर दिया गया। पत्थरों के टुकड़े उड़ते रहे, धूल का एक बादल उठा, और लोगों की आँखों में एक अजीब सी चमक थी – जैसे कोई बड़ा बोझ उतर गया हो।

पर आसा जानते थे कि केवल नाश ही काफी नहीं है। एक नई शुरुआत चाहिए थी। उन्होंने अपने पिता अबीय्याह के समय से छूट गए, परमेश्वर के भवन के पवित्र स्थान को फिर से बनवाया और सजाया। और फिर, एक निश्चित दिन, उन्होंने सब लोगों से कहा कि वे अपने साथ भेंट लेकर आएँ।

वह दिन देखने लायक था। लोग लौटे – उनके हाथों में मेम्ने थे, बैल थे, अनाज की बोरियाँ थीं, सोने-चाँदी के पात्र थे। उन्होंने स्वेच्छा से, अपने मन से, एक भेंट चढ़ाई। सात सौ बैल और सात हज़ार भेड़-बकरियाँ उस दिन परमेश्वर के लिए पवित्र की गईं। भेंट की गई वस्तुओं का ढेर लग गया। धुआँ और सुगन्ध आकाश की ओर उठने लगी। और लोगों ने एक शपथ खाई – एक गंभीर, हृदय से निकली हुई प्रतिज्ञा – कि वे अपने पूर्वजों के परमेश्वर, यहोवा की, सारे मन और सारी जान से खोज करेंगे।

और उस शपथ का असर हुआ। जो कोई परमेश्वर की खोज नहीं करता था, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, पुरुष हो या स्त्री, उसे मृत्युदंड देने की घोषणा की गई। यह कठोर लगता है, पर उस समय के लिए यह एक आवश्यक नींव थी। और लोगों ने खुशी-खुशी, पूरे उत्साह के साथ यह शपथ मानी, क्योंकि उन्होंने वह शांति और आनन्द महसूस किया था जो सच्ची वापसी में मिलता है।

उस दिन के बाद से राज्य में एक नई शांति छा गई। सड़कें सुरक्षित हो गईं, व्यापार फिर से फलने-फूलने लगा। राजा आसा ने अपनी दादी माका को, जो एक मूर्ति पूजक थी, रानी के पद से उतार दिया और उसकी बनवाई घृणित मूर्ति को तुड़वाकर जला डाला। सुधार की यह लहर दूर-दूर तक फैली।

यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि एक नबी ने सच्चाई का वचन बोला था, और एक राजा ने उसे सुना था। उन्होंने ढूँढा, और पा लिया। और किद्रोन की वह घाटी, जहाँ मूर्तियों का चूर-चूर बिखरा पड़ा था, चुपचाप गवाह बनी रही – कि परमेश्वर के साथ रहने का वादा हमेशा खरा उतरता है, बशर्ते हृदय पूरी तरह उसकी ओर मुड़ जाए। सूरज ढलने लगा था, और यरूशलेम की दीवारों पर सुनहरी रोशनी फैली हुई थी, जैसे एक प्रतिज्ञा की मुहर।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *