शूशन के राजभवन की शांति उस दिन कुछ ज्यादा ही गहरी लग रही थी। नहेम्याह ने राजमहल के ऊँचे खंभों वाले कक्ष में खड़े होकर बाहर बाग़ों को देखा। फारस की गरमी थी, पर हवा में एक उदासी थी जो उसके भीतर तक रिस रही थी। वह शाहनशाह अर्तक्षत्र का मदिरा परिचारक था – एक ऊँचा और विश्वासपात्र पद, पर आज उसका मन बेचैन था। कुछ दिन पहले हननी नाम के एक व्यक्ति के साथ कुछ यहूदियों का एक छोटा सा दल यहूदाह से आया था। वे लोग बातें कर रहे थे, और नहेम्याह ने अनिच्छा से, पर एक अजीब आकर्षण से, उनकी बात सुन ली थी।
“यरूशलेम,” एक बूढ़े ने कहा था, आवाज़ में एक टूटन थी, “वह नगर जिसकी दीवारें टूटी पड़ी हैं। उसके फाटक जलकर राख हो गए हैं। जो बचे हैं, वे बड़ी दुर्दशा और निराशा में हैं।”
ये शब्द उसके दिल में एक कील की तरह धंस गए थे। नहेम्याह ने यरूशलेम को कभी नहीं देखा था। वह बेबीलोन की बंधुआई में ही पैदा हुआ था। पर उसके पुरखे उस नगर के थे। दाऊद और सुलैमान की कहानियाँ उसकी रग-रग में बसी थीं। परमेश्वर का मंदिर, सिय्योन का गीत – ये सब एक धुंधली सी याद थे, जो अब एक तीखे दर्द में बदल गई थीं।
उस दिन के बाद से, नहेम्याह का चैन लुप्त हो गया। राजकीय कार्य वह करता, पर उसका मन कहीं और होता। खाना उसके गले से नीचे नहीं उतरता। वह शाही बाग़ों में टहलता, पर हर फूल, हर पत्ता उसे उजड़े हुए यरूशलेम की याद दिलाता। एक शाम, जब सूरज लाल होकर डूब रहा था, वह अपने कक्ष में लौटा। उसने अपने सारे सेवकों को बाहर जाने को कहा। अकेला रह गया।
वह धीरे से घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले – कोई रोता नहीं था, ये तो अपने आप ही छलक पड़े थे। उसने अपने हाथ फैलाए, मानो कोई सामने खड़ा हो। और फिर उसके मुँह से शब्द निकले, धीमे, टूटे-फूटे, पर गहरे विश्वास से भरे।
“हे स्वर्ग के परमेश्वर, हे महान और भययोग्य प्रभु,” उसने कहना शुरू किया, “तू उनसे प्रेम रखता है जो तेरी आज्ञाओं को मानते हैं। कृपा करके कान लगा और आँखें खोल… मैं तेरे दास इस्राएलियों के पापों को मानता हूँ, जो हमने तेरे विरुद्ध किए हैं। हमने भी, मैंने भी और मेरे पिता के घराने ने भी पाप किया है।”
उसकी प्रार्थना सरल थी, बिना किसी शास्त्रीय आडंबर के। वह अपने और अपने लोगों के पापों को स्वीकार कर रहा था। मूसा की व्यवस्था की बातें याद आ रही थीं – कि यदि लोग पाप करें और तेरे पास लौट आएँ, तो तू उन्हें बिखेर देगा, पर फिर भी एक स्थान पर इकट्ठा करेगा। वह उन्हीं वादों को दोहरा रहा था, परमेश्वर को उसकी अपनी बात याद दिला रहा था।
“ये वे लोग हैं जिन्हें तू ने छुड़ाया था, अपनी बड़ी सामर्थ्य से,” उसकी आवाज़ में एक गिड़गिड़ाहट थी, “कृपया सुन ले, क्योंकि मैं तेरा दास हूँ, और ये लोग तेरे दास हैं। हम उस नगर के लिए तेरी दया चाहते हैं, जिसके लिए तू इतना व्याकुल रहता है।”
वह कितनी देर तक प्रार्थना करता रहा, उसे पता नहीं था। बाहर अँधेरा हो चुका था। मोमबत्ती की लौ टिमटिमा रही थी। उसके गाल आँसुओं से भीगे थे, पर उसके हृदय में एक नई हलचल शुरू हो गई थी। दुःख अब केवल दुःख नहीं रह गया था। वह एक संकल्प में बदल रहा था। उसकी प्रार्थना में एक याचना भी थी – कि आज जब वह शाहनशाह के सामने जाएगा, तो परमेश्वर उसके शब्दों को अनुकूल बनाए। वह कुछ करना चाहता था। केवल रोना नहीं, पर हाथ उठाना चाहता था।
अगले दिन, जब वह राजा के सामने मदिरा लेकर गया, तो उसके चेहरे पर उदासी के भाव साफ़ झलक रहे थे। राजा अर्तक्षत्र की नज़र पड़ी। “तू बीमार क्यों दिख रहा है?” राजा ने पूछा, “यह तो दुःख का चेहरा है।”
नहेम्याह का हृदय जोरों से धड़कने लगा। यही क्षण था। उसने मन ही मन एक छोटी सी प्रार्थना की, फिर बोला, “महाराज जीवित रहें। मेरा चेहरा क्यों उदास न हो, जबकि मेरे पूर्वजों की कब्रों का नगर उजड़ा पड़ा है, और उसके फाटक आग से जल गए हैं?”
राजा ने पूछा, “तो तू क्या चाहता है?”
नहेम्याह ने फिर, चुपचाप, परमेश्वर से प्रार्थना की। फिर उसने अपनी योजना रखी – वह यरूशलेम जाना चाहता है, उसे फिर से बसाना चाहता है। और अचरज की बात, राजा ने न केवल उसे जाने की अनुमति दी, बल्कि उसे सुरक्षा और सामग्री भी प्रदान की।
नहेम्याह ने उस रात फिर प्रार्थना की। पर अब आँसू नहीं थे। अब एक धीमी, दृढ़ आशा थी। वह जानता था कि यह उसका काम नहीं, परमेश्वर का हाथ था जो चल रहा था। और उस उजड़े हुए नगर की ओर एक लंबी यात्रा का पहला कदम, एक दर्द से भरी प्रार्थना से, अभी-अभी उठा था।




