याकूब का सपना और परमेश्वर का वादा
(उत्पत्ति 28)
याकूब अपने पिता इसहाक और माता रिबका के घर से चल पड़ा। उसका भाई एसाव उससे नाराज था, क्योंकि याकूब ने उसके जन्मrights और पिता का आशीर्वाद छीन लिया था। रिबका ने याकूब को अपने भाई के क्रोध से बचाने के लिए उसे अपने भाई लाबान के पास पदन-अराम भेज दिया था। याकूब अकेला था, लेकिन उसके मन में परमेश्वर का भय और विश्वास था।
उसने अपनी यात्रा जारी रखी और सूर्यास्त के समय एक स्थान पर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि जगह खुली और शांत थी। चारों ओर पत्थर बिखरे हुए थे, और आकाश में तारे चमक रहे थे। याकूब ने एक पत्थर को सिरहाने के रूप में इस्तेमाल किया और वहीं लेट गया। थकान के कारण वह जल्दी ही सो गया।
उसकी नींद में एक अद्भुत दर्शन हुआ। उसने एक सीढ़ी देखी जो पृथ्वी से आकाश तक पहुँच रही थी। उस सीढ़ी पर स्वर्गदूत ऊपर चढ़ते और नीचे उतरते हुए दिखाई दे रहे थे। सीढ़ी के शीर्ष पर परमेश्वर खड़े थे, और उनकी महिमा से पूरा स्थान प्रकाशित हो रहा था।
तब परमेश्वर ने याकूब से बात की और कहा, “मैं तेरे पिता इब्राहीम का परमेश्वर हूँ, और इसहाक का भी परमेश्वर हूँ। वह भूमि जिस पर तू सो रहा है, मैं उसे तुझे और तेरे वंश को दूंगा। तेरा वंश धरती की धूल के कणों के समान बहुत होगा, और पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में फैल जाएगा। तेरे द्वारा पृथ्वी के सभी कुल आशीष पाएंगे। और देख, मैं तेरे साथ हूँ। जहाँ कहीं तू जाएगा, मैं तेरी रक्षा करूंगा और तुझे इस भूमि पर वापस ले आऊंगा। मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा, जब तक मैंने वह सब कुछ पूरा नहीं कर दिया जो मैंने तुझसे कहा है।”
याकूब की नींद टूट गई। वह डर गया और चौंककर उठ बैठा। उसने कहा, “निश्चय ही यह स्थान परमेश्वर का है, और मैं इस बात से अनजान था। यह तो स्वर्ग का द्वार है!” उसने अपने सिरहाने के पत्थर को उठाया और उसे एक स्तंभ के रूप में खड़ा कर दिया। फिर उसने उस पर तेल अर्पित किया, ताकि वह स्थान पवित्र हो जाए। उसने उस जगह का नाम “बेतेल” रखा, जिसका अर्थ है “परमेश्वर का घर।”
याकूब ने परमेश्वर से एक प्रतिज्ञा की। उसने कहा, “यदि परमेश्वर मेरे साथ रहेंगे, मेरी इस यात्रा में मेरी रक्षा करेंगे, मुझे भोजन और वस्त्र देंगे, और मुझे सकुशल मेरे पिता के घर वापस ले आएंगे, तो यहोवा मेरा परमेश्वर होगा। और यह पत्थर जिसे मैंने स्तंभ के रूप में खड़ा किया है, परमेश्वर का घर होगा। और जो कुछ भी तू मुझे देगा, उसका दसवां भाग मैं तुझे अर्पित करूंगा।”
याकूब ने अपनी यात्रा जारी रखी, लेकिन उसका हृदय अब भरा हुआ था। परमेश्वर का वादा और उसकी उपस्थिति ने उसे नई ताकत और आशा दी। वह जानता था कि चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न चला जाए, परमेश्वर उसके साथ है और उसे कभी नहीं छोड़ेगा।
इस प्रकार, याकूब का सपना और परमेश्वर का वादा उसके जीवन में एक नई शुरुआत का प्रतीक बन गया। उसने सीखा कि परमेश्वर की योजना हमेशा हमारे लिए अच्छी होती है, और वह हमारे साथ रहता है, चाहे हम कहीं भी हों।