रामनगर की गलियाँ सुबह की धूप में नहाई जा रही थीं, परन्तु अमर की दुनिया अँधेरे में डूबी हुई थी। उसकी छोटी-सी मिट्टी की दुकान, जो पीढ़ियों से चली आ रही थी, अब बंद होने के कगार पर थी। असली मुसीबत तो दुकान नहीं, बल्कि वे लोग थे जो उसे घेरे हुए थे। शहर के बड़े व्यापारी, गुंडे, यहाँ तक कि कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करवा चुके कर्मचारी भी – सब मिलकर एक जाल बुन रहे थे। उनकी बातें मीठी थीं, पर उनकी आँखों में छिपी तलवारें तेज़ धार वाली थीं।
अमर अक्सर रातों को जागता। छत पर बैठकर आकाश की ओर देखता। प्रार्थना? वह तो बस एक गहरी, अनकही पीड़ा थी, जो उसके सीने से निकलकर खामोशी में विलीन हो जाती। “हे परमेश्वर,” वह कभी-कभी फुसफुसाता, “मेरी आवाज़ सुन। इनसे मेरी रक्षा कर। ये चुपके-चुपके अपनी योजनाएँ बनाते हैं। कोई उन्हें देखता नहीं, ऐसा समझकर वे अपने जाल फेंकते हैं।”
उसका दर्द भजन संहिता के उन शब्दों जैसा था, जो सदियों पहले किसी और ने महसूस किए होंगे। शत्रु तीर चलाते, पर वे तीर ज़हर में डूबे हुए शब्द थे। झूठे इल्ज़ाम, छल से भरे दस्तावेज़, समाज में फैलाई गई बदनामी की कहानियाँ। वे एक-दूसरे को उकसाते, “चलो, हम उस पर छिपकर वार करें। कोई हमें पकड़ नहीं पाएगा।” उनका विश्वास दृढ़ था कि उनकी चालाकी अडिग है, कि उनके मन के गहरे इरादे कभी प्रकट न होंगे।
एक दिन, जब अमर लगभग टूट चुका था, तब उसने दुकान की एक पुरानी अलमारी के पीछे अपने पिता की पड़ी हुई एक पुरानी बाइबल देखी। धूल झाड़कर उसे खोला। पन्ने पलटते हुए उसकी उँगलियाँ भजन 64 पर रुक गईं। शब्द उसकी आँखों के सामने से गुज़रे, पर उसके मन में उतर गए। “परमेश्वर अपने तीर चलाकर उन पर अचानक वार करेगा… वे अपनी ही जीभ के कारण ठोकर खाएँगे।”
कुछ दिन बाद एक अजीब घटना घटी। उनमें से एक प्रमुख व्यापारी, जो सबसे ज़्यादा चालाक माना जाता था, अपने ही एक झूठे दस्तावेज़ में फँस गया। वह दस्तावेज़, जो अमर को फँसाने के लिए तैयार किया गया था, अचानक सार्वजनिक हो गया। फिर तो जैसे बाँध टूट गया। एक के बाद एक, उनकी योजनाएँ उजागर होने लगीं। वे एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। जो जाल उन्होंने बुना था, वही उन्हें फँसाने लगा। शहर के लोग हैरान रह गए। वे सब, जो इतने सावधान और गोपनीय समझे जाते थे, अपनी ही चाल में फँसते दिखाई दे रहे थे।
अमर चुपचाप देखता रहा। उसके मन में कोरा विजय का भाव नहीं था, बल्कि एक गहरी विस्मय की भावना थी। वह समझ गया कि यह कोई साधारण संयोग नहीं था। यह उसी न्याय का हाथ था, जिस पर उसने कभी आँख मूँदकर भरोसा किया था। लोग डरने लगे, और धीरे-धीरे सच्चाई सामने आई। अमर की दुकान फिर से खुल गई। नहीं, वह एकदम से धनी नहीं बन गया, पर उसका संघर्ष समाप्त हो गया। जो लोग उसके विरोध में खड़े थे, वे बिखर गए।
एक शाम, जब पहली बारिश की हल्की-हल्की बूँदें गिर रही थीं, अमर फिर से अपनी छत पर बैठा था। इस बार उसकी आँखों में शांति थी। आकाश में बादलों के पीछे से सूरज की एक किरण निकली, और पूरा रामनगर सुनहरी आभा में नहा गया। अमर ने मन ही मन कहा, “सचमुच, धर्मी परमेश्वर में आनन्दित होंगे, और उसकी शरण लेंगे। हर वह व्यक्ति जो सीधे मन का है, अपनी जयकार करेगा।” यह जयकार ज़ोर की नहीं थी, बल्कि उसके हृदय की गहराई में बसी एक ऐसी शांति थी, जो केवल उसी को मिल सकती है जिसने अँधेरे को देखा हो, और फिर उजाले का स्वागत किया हो।



