यह कहानी उस गाँव की है जो पहाड़ियों की कोख में बसा था, जहाँ सुबह का सूरज दाख की बारियों को सोने जैसा चमकाता था। वहाँ रहता था अनंत, एक किसान, जिसकी हथेलियाँ मिट्टी और मेहनत की कहानी कहती थीं।
उसका दिन भोर से पहले शुरू हो जाता, जब ओस की बूँदें अभी जैतून के पत्तों से लिपटी रहतीं। वह अपने खेतों की ओर चल पड़ता, उसकी धोती की मरोड़ में उसकी पत्नी मीरा द्वारा बाँधा गया सूखा आंवला का टुकड़ा रहता, एक मौन प्रार्थना की तरह। अनंत कोई पंडित नहीं था, न कोई बड़ा धर्मज्ञानी। पर उसके लिए परमेश्वर का भय, वह श्रद्धा का भाव, उसकी जुताई की प्रथम फाल में निहित था, उस हल के फेरे में जो भूमि को सहजता से चीरता था, बलपूर्वक नहीं। वह जानता था कि यह भूमि उसकी नहीं, एक ऋण है, और उसका कर्म ही उसकी पूजा है।
दिन भर वह खेत में रहता। धूप तेज होती, तो वह अपने सिर के पल्लू को सहलाता, पसीना पोंछता, और दूर अपनी कुटिया की ओर देखता। वहाँ से धुँए की एक बारीक रेखा उठती, जो बताती कि मीरा उसके लिए, उनके बच्चों के लिए रोटी सेंक रही है। यह दृश्य, यह धुआँ, उसके लिए शांति का दूत था। शाम को थका-माँदा लौटता, तो दहलीज पर उसके दोनों बेटे – विशाल और कोमल – उसका इंतज़ार करते। एक उसका हल सम्भालता, दूसरा पानी से भरा लोटा ले आता। यह सब एक लय में होता, बिना किसी शोर के, जैसे पेड़ों में हवा का स्वाभाविक सरसराहट।
घर में प्रवेश करते ही उसकी थकान कुछ कम हो जाती। मीरा चूल्हे के पास बैठी होती, उसके चेहरे पर लपटों की लयदार छाया नाचती। वह उसकी ओर देखती, और बिना कुछ कहे, एक थाली आगे रख देती। साधारण भोजन – रोटी, दाल, हरी सब्ज़ी – पर उसमें एक तृप्ति थी जो राजाओं के भोजन में भी दुर्लभ थी। यह वह आनंद था जो भजन कहता है – “तू अपने परिश्रम का फल खाएगा।”
एक बार की बात है, गाँव में अकाल पड़ने की आशंका हुई। बारिश नहीं हुई, खेत सूखे दरारें दे रहे थे। गाँव के कुछ लोग मंदिर में जाकर जयकारे लगाने लगे, कुछ ने यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी। अनंत शांत था। वह सुबह अपने खेत में जाता, बीज बोने की तैयारी करता, जैसे सब कुछ सामान्य हो। एक पड़ोसी ने व्यंग्य किया, “अनंत भाई, बादल तो दूर-दूर तक नहीं दिखते, और तू बीज बिखेर रहा है? यह मूर्खता नहीं तो और क्या?”
अनंत ने मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई, उसे अपनी हथेली में देखा। “मेरा काम है बोना,” उसने धीरे से कहा। “वर्षा देना या न देना, मेरे हाथ में नहीं। पर यदि मैं आज बोऊंगा नहीं, तो यदि कल वर्षा होगी भी, तो क्या उगेगा? मेरा विश्वास मेरे कर्म में है, नतीजे में नहीं।”
और फिर एक अद्भुत बात हुई। बादल नहीं आए, पर पहाड़ों से एक छोटी सी जलधारा, जो सूख गई थी, अचानक फूट निकली। लोग कहने लगे कि कहीं दूर पहाड़ों पर बर्फ पिघली होगी। पर अनंत के खेत तक वह धारा आई, उसकी भूमि को तर किया। उसका विश्वास, उसका स्थिर कर्म, एक आशीष बन गया।
साल बीतते गए। विशाल और कोमल बड़े हुए। विशाल ने पिता की खेती सँभाली, और कोमल ने गाँव में एक छोटी सी पाठशाला खोली। अनंत अब बूढ़ा हो चला था। शाम को वह अपने घर के आँगन में बने चबूतरे पर बैठता, और उसकी नजर अपने परिवार पर टिकी रहती। विशाल का बेटा, उसका पोता, उसकी गोद में खेलता। मीरा अब भी चूल्हे के पास बैठती, हालाँकि अब बहू भी साथ होती। घर में हँसी की आवाज़ गूँजती।
एक शाम, जब नीबू जैसा पीला सूरज डूब रहा था, अनंत ने अपने पोते को गोद में लिया। उसने दूर अपनी दाख की बारी देखी, जहाँ अंगूरों के गुच्छे लदे थे। उसने अपने घर के कोने में लगे युवा जैतून के पौधे देखे, जो हरे-भरे थे। उसका मन एक अकथनीय भाव से भर गया। यह वह दृश्य था जिसकी भविष्यवाणी भजनकार ने की थी – “तेरी पत्नी तेरे घर की लता के समान फलवन्त होगी, और तेरे बच्चे जैतून के पौधे के समान तेरे मेज के चारों ओर होंगे।”
उसे एहसास हुआ, आशीष कोई चमत्कारी वस्तु नहीं होती। वह तो जीवन के इन साधारण, मिट्टी से सने पलों में निवास करती है – हल की मूठ पर पड़े हाथों में, सांझ के धुएँ की सुगंध में, बच्चों के किलकारी में, और उस शांति में जो परमेश्वर पर भरोसे से आती है। यह समृद्धि नहीं थी, यह तृप्ति थी। यह लंबी आयु नहीं थी, यह पूर्णता थी।
और जब अनंत की आँखें मूंद गईं, तो गाँव वालों ने कहा, वह शांति से सो गया। पर मीरा जानती थी, और उसके बेटे जानते थे, कि वह जिस आशीष की छाया में रहता था, वह अभी खत्म नहीं हुई थी। वह उनकी स्मृतियों में, उनकी दिनचर्या में, और उस मिट्टी में बसी रह गई, जिसे उसने सम्मान से सींचा था। क्योंकि वास्तव में, “यहोवा से भय मानने वाला ऐसा ही धन्य होता है।” और यह धन्यता, एक गूँज की तरह, उस पहाड़ी गाँव की हवा में हमेशा के लिए समा गई।




