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यहोना और नीनवे: परमेश्वर की दया की कहानी

यहोना 4 की कहानी हिंदी में विस्तार से:

यहोना भविष्यद्वक्ता ने नीनवे शहर में परमेश्वर का संदेश सुनाया था, और वहाँ के लोगों ने पश्चाताप किया था। परमेश्वर ने उनकी प्रार्थना सुनी और उन्हें नष्ट करने का निर्णय बदल दिया। लेकिन यहोना इससे खुश नहीं था। वह नीनवे के लोगों के प्रति क्रोधित था और उसका मन परेशान था। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और कहा, “हे यहोवा, क्या यही वह बात नहीं है जो मैं अपने देश में रहते हुए कहता था? इसीलिए मैं तर्शीश भाग गया था, क्योंकि मैं जानता था कि तू दयालु और कृपाशील परमेश्वर है, धीरजवन्त और अति करुणामय, और दु:ख देने से पश्चाताप करता है। इसलिए, हे यहोवा, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मेरे लिए मरना जीने से अच्छा है।”

यहोना नीनवे से बाहर निकल गया और शहर के पूर्व की ओर एक स्थान पर बैठ गया। वहाँ उसने एक झोपड़ी बनाई और उसके नीचे बैठकर यह देखने लगा कि शहर का क्या होगा। वह उम्मीद कर रहा था कि शायद परमेश्वर नीनवे को दंड देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

तब परमेश्वर ने यहोना की सहायता के लिए एक रेंड़ का पेड़ उगाया, जो उसके सिर के ऊपर छाया करने लगा ताकि वह धूप से बच सके। यहोना को इस पेड़ से बहुत आनंद हुआ। लेकिन अगले दिन भोर के समय, परमेश्वर ने एक कीड़े को भेजा, जिसने रेंड़ के पेड़ को काट दिया और वह सूख गया।

जब सूरज निकला, तो परमेश्वर ने पूर्व की ओर से एक तेज़ गर्म हवा चलाई, और सूरज की किरणें यहोना के सिर पर पड़ने लगीं। वह बेहोश होने लगा और फिर से मरने की इच्छा करने लगा। उसने कहा, “मेरे लिए मरना जीने से अच्छा है।”

तब परमेश्वर ने यहोना से कहा, “क्या तू इस रेंड़ के पेड़ के लिए क्रोधित है?” यहोना ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं क्रोधित हूँ, यहाँ तक कि मरने के लिए भी।”

परमेश्वर ने कहा, “तू इस पेड़ के लिए दुखी है, जिसे तूने न तो लगाया और न ही उसे बढ़ाया, जो एक रात में बढ़ा और एक रात में नष्ट हो गया। फिर क्या मैं नीनवे उस बड़े शहर के लिए दुखी न होऊँ, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक लोग हैं, जो अपने दाएँ-बाएँ में फर्क नहीं जानते, और बहुत से पशु भी हैं?”

यहोना की कहानी यहाँ समाप्त होती है, लेकिन इसके माध्यम से परमेश्वर हमें यह सिखाता है कि उसकी दया और करुणा सभी के लिए है, चाहे वह कितने भी बड़े पापी क्यों न हों। परमेश्वर चाहता है कि हम भी उसकी तरह दयालु और क्षमाशील बनें, और दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा दिखाएँ। यहोना की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि परमेश्वर की इच्छा हमेशा हमारी इच्छा से ऊपर होती है, और हमें उसकी योजना पर भरोसा करना चाहिए।

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