यहूदा के पुत्र यूहन्ना को एक दिन प्रभु यीशु मसीह की ओर से एक विशेष दर्शन हुआ। वह पतमुस द्वीप पर था, जहाँ वह प्रभु के वचन और यीशु की गवाही के कारण कैद किया गया था। एक दिन, जब वह प्रार्थना में लीन था, अचानक आकाश खुल गया और उसने एक दिव्य दर्शन देखा। उसने एक ऊँची आवाज़ सुनी, जो तुरही की तरह गूंज रही थी। आवाज़ ने कहा, “यहाँ ऊपर आ, और मैं तुझे वह दिखाऊँगा जो आने वाला है।”
यूहन्ना आत्मा में उठा लिया गया और अचानक वह स्वर्ग में था। वहाँ उसने एक सिंहासन देखा, जो आकाश में स्थापित था। सिंहासन इतना भव्य और प्रतापी था कि उसका वर्णन करना मुश्किल था। सिंहासन के चारों ओर एक इंद्रधनुष था, जो पन्ने के समान चमक रहा था। यह इंद्रधनुष शांति और परमेश्वर की वाचा का प्रतीक था। सिंहासन पर एक व्यक्ति विराजमान था, जिसका रूप यश्ब और सरदियोन के समान था। उसके चारों ओर बिजली की चमक और गर्जन थी, जो उसकी महिमा और शक्ति को प्रकट कर रही थी।
सिंहासन के सामने एक काँच के समान साफ समुद्र था, जो शांत और निर्मल था। यह समुद्र परमेश्वर की पवित्रता और उसके न्याय की पूर्णता का प्रतीक था। सिंहासन के चारों ओर चार जीवित प्राणी खड़े थे, जो आगे और पीछे से आँखों से भरे हुए थे। ये प्राणी परमेश्वर की सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता का प्रतीक थे। पहला प्राणी सिंह के समान था, दूसरा बछड़े के समान, तीसरा मनुष्य के चेहरे के समान, और चौथा उड़ते हुए उकाब के समान। ये चारों प्राणी दिन-रात बिना रुके यह कहते हुए परमेश्वर की स्तुति कर रहे थे, “पवित्र, पवित्र, पवित्र है प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, जो था, और जो है, और जो आने वाला है।”
जब भी ये जीवित प्राणी परमेश्वर की महिमा और आदर और धन्यवाद करते थे, तो चौबीस प्राचीन, जो सिंहासन के सामने बैठे थे, अपने सिंहासनों से उतरकर सिंहासन पर बैठे हुए परमेश्वर को दण्डवत करते थे। वे अपने मुकुट सिंहासन के सामने डाल देते थे और कहते थे, “हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा और आदर और सामर्थ्य के योग्य है; क्योंकि तू ने सब वस्तुओं की सृष्टि की, और तेरी ही इच्छा से वे अस्तित्व में आईं और सृजी गईं।”
यूहन्ना इस दर्शन से अभिभूत हो गया। उसने देखा कि स्वर्ग में सब कुछ परमेश्वर की महिमा और उसके राज्य के लिए समर्पित था। वहाँ कोई अशांति नहीं थी, कोई विवाद नहीं था, केवल शुद्ध आराधना और स्तुति थी। यह दर्शन यूहन्ना को यह याद दिलाने के लिए था कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और उसका राज्य अनंतकाल तक चलेगा। उसने महसूस किया कि पृथ्वी पर जो कुछ भी हो रहा है, वह अंततः परमेश्वर की योजना के अनुसार पूरा होगा।
यूहन्ना ने इस दर्शन को अपने हृदय में संजो लिया और उसे लिखकर संरक्षित किया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी परमेश्वर की महिमा और उसके राज्य की सच्चाई को समझ सकें। उसने जान लिया कि परमेश्वर का सिंहासन सदैव अटल है और उसकी आराधना ही सृष्टि का उद्देश्य है।