1 यूहन्ना 2 के आधार पर एक विस्तृत और गहन कहानी:
एक छोटे से गाँव में, जो पहाड़ियों की गोद में बसा हुआ था, एक बूढ़ा संत रहता था। उसका नाम यूहन्ना था। वह यीशु मसीह के प्रिय शिष्यों में से एक था और अब वह अपने जीवन के अंतिम दिनों में था। उसके पास गाँव के लोगों और आसपास के क्षेत्रों से लोग आते थे, ताकि वह उन्हें परमेश्वर के वचन की शिक्षा दे सके। यूहन्ना ने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा और अनुभव किया था। वह यीशु के साथ चला था, उसके चमत्कार देखे थे, और उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान के गवाह थे। अब वह अपने अनुभवों और ज्ञान को दूसरों के साथ साझा करना चाहता था।
एक दिन, गाँव के लोग यूहन्ना के पास इकट्ठे हुए। वे उससे परमेश्वर के प्रेम और उसकी आज्ञाओं के बारे में सुनना चाहते थे। यूहन्ना ने उन्हें देखा और मुस्कुराया। उसकी आँखों में एक गहरी शांति और प्रेम झलक रहा था। उसने अपनी धीमी और मधुर आवाज़ में कहना शुरू किया:
“मेरे प्रिय बच्चों, मैं तुम्हें परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने के लिए यहाँ हूँ। परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र यीशु मसीह के माध्यम से एक नई आशा और जीवन दिया है। यीशु हमारे पापों के लिए बलिदान हुए, ताकि हम अनन्त जीवन पा सकें। यदि हम उन पर विश्वास करते हैं और उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हम परमेश्वर के साथ एक गहरा संबंध बना सकते हैं।”
यूहन्ना ने आगे कहा, “परमेश्वर की आज्ञा यह है कि हम उससे प्रेम करें और उसके पुत्र यीशु मसीह पर विश्वास करें। यदि हम यह कहते हैं कि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं, लेकिन उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करते, तो हम झूठे हैं। परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदय में होना चाहिए, और यह प्रेम हमें दूसरों के प्रति भी प्रेम और करुणा से भर देता है।”
गाँव के लोग यूहन्ना की बातें ध्यान से सुन रहे थे। उनमें से एक युवक ने पूछा, “लेकिन संत यूहन्ना, हम कैसे जान सकते हैं कि हम वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं?”
यूहन्ना ने उत्तर दिया, “यदि हम परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हम उसे जानते हैं। जो कोई यह कहता है कि वह परमेश्वर को जानता है, लेकिन उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करता, वह झूठा है। परमेश्वर का वचन हमारे हृदय में रहना चाहिए, और यह हमें पाप से दूर रखता है।”
यूहन्ना ने आगे कहा, “मेरे प्रिय बच्चों, मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, जो यीशु मसीह ने हमें दी है। वह आज्ञा यह है कि हम एक दूसरे से प्रेम करें। जैसे यीशु ने हमसे प्रेम किया, वैसे ही हमें भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए। यदि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं, तो यह सिद्ध करता है कि हम परमेश्वर के प्रकाश में चल रहे हैं। लेकिन जो कोई अपने भाई से घृणा करता है, वह अंधकार में है और नहीं जानता कि वह कहाँ जा रहा है।”
गाँव के लोग यूहन्ना की बातों से प्रभावित हुए। उन्होंने महसूस किया कि परमेश्वर का प्रेम और यीशु मसीह का बलिदान उनके जीवन का केंद्र होना चाहिए। यूहन्ना ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि दुनिया और उसकी इच्छाएँ नश्वर हैं, लेकिन जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करता है, वह सदा बना रहता है।
अंत में, यूहन्ना ने कहा, “मेरे प्रिय बच्चों, मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ कि तुम अपने आप को दुनिया की चीज़ों से दूर रखो। दुनिया की इच्छाएँ और उसकी भव्यता नश्वर हैं, लेकिन परमेश्वर की इच्छा सदा बनी रहती है। यदि तुम परमेश्वर के साथ चलते हो और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम अनन्त जीवन पाओगे।”
गाँव के लोग यूहन्ना की बातों से प्रेरित हुए और उन्होंने परमेश्वर के प्रेम और यीशु मसीह के बलिदान को अपने जीवन में गहराई से उतारने का संकल्प लिया। यूहन्ना ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, “परमेश्वर का प्रेम और उसकी कृपा तुम्हारे साथ बनी रहे।”
इस तरह, यूहन्ना ने गाँव के लोगों को परमेश्वर के वचन की शिक्षा दी और उन्हें यीशु मसीह के प्रेम और बलिदान की याद दिलाई। उसकी बातों ने उनके हृदय को छू लिया और उन्हें परमेश्वर के करीब ले आया।