वह दिन ठंडी हवा के झोंकों से शुरू हुआ, जो खेतों में लहलहाती जौ की बालियों को हिला रही थी। शिमोन अपनी कुटिया के द्वार पर बैठा, लकड़ी के एक पुराने स्टूल पर अपना माथा टिकाए हुए था। शरीर में एक असहज सी गर्मी थी, और एक अजीब सी नमी उसके वस्त्रों को भिगोए जा रही थी। उसने आह भरकर अपनी आँखें बंद कर लीं। “फिर,” उसने अपने मन में कहा, “फिर वही।”
पिछले सात दिनों से, यह सिलसिला चल रहा था। एक स्राव, शुद्ध नहीं, बल्कि दूषित। उसने जाना कि कानून क्या कहता है। हर बार जब यह होता, वह स्वयं ही, अपने ही तम्बू में, एक तरह का देश-निकाला झेलता। उसकी पत्नी, मीका, दरवाज़े की चौखट पर खड़ी होकर उसकी ओर देख रही थी, उसकी आँखों में वही पुराना दर्द था जो अब आदत सा हो चला था।
“तुमने याजक एलीएज़र को भेजा?” शिमोन ने आवाज़ में किसी चीज़ की उम्मीद लिए पूछा, हालाँकि उसे पता था जवाब क्या होगा।
“भेज दिया है,” मीका ने कहा, आवाज़ धीमी और थकी हुई। “वे कहेंगे कि जब तक स्राव बंद न हो, और फिर सात दिन और… तुम जानते ही हो सब कुछ, शिमोन।”
हाँ, वह जानता था। लेविय्य व्यवस्था की वह धारा उसके दिमाग में अंकित थी, जैसे कोई निशान उसकी हड्डियों पर खुदा हो। अशुद्ध। जो कोई भी उसे छू ले, वह भी अशुद्ध हो जाएगा शाम तक। जो कोई उसकी चारपाई पर बैठे, उसे अपने वस्त्र धोने होंगे, नहाना होगा। बर्तन? अगर वह बिना हाथ धोए किसी मिट्टी के बर्तन को छू ले, तो उसे तोड़ दिया जाएगा। लकड़ी का बरतन धोया जा सकता था, पर कितनी बार? यह सब उसके लिए नहीं, बल्कि समुदाय की पवित्रता के लिए था। परिवार के लिए। परमेश्वर के डेरे के लिए।
उसका बेटा, याकूब, दूर खेत की मेड़ पर खड़ा था, अपने पिता की ओर पीठ किए हुए। वह अब उसके पास नहीं आता था, न हाथ मिलाने, न कंधे पर हाथ रखने। कानून ने एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी थी। शिमोन ने अपनी मुट्ठी बाँध ली। यह बीमारी नहीं थी, न पाप। बस… एक दशा। फिर भी उसकी कीमत कितनी भारी थी।
दोपहर बीतते-बीतते, एलीएज़ार याजक आए। उनके चेहरे पर कोई घृणा नहीं थी, न ही कठोरता। बस एक गहरा, शांत विचार। वे दूर खड़े रहे, जैसा नियम था। “शिमोन, तुम्हारा स्राव अब भी जारी है?”
“हाँ, महान याजक।”
एलीएज़ार ने सिर हिलाया। “फिर तुम अशुद्ध हो। तुम्हें समुदाय से अलग इसी कुटिया में रहना होगा। जब बंद हो जाए, तो सात दिन और गिनो। आठवें दिन, दो फाख्ते या दो घुँघरू वाले कबूतर लेकर आना, मिलापवाले तम्बू के द्वार पर। मैं एक को पापबलि के लिए, और एक को होमबलि के लिए चढ़ाऊँगा। तब परमेश्वर के सामने तुम्हारी शुद्धि होगी।”
शब्द सटीक और स्पष्ट थे, जैसे पत्थर पर उकेरे गए अक्षर। शिमोन ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ी, जो मिट्टी में खेती करते, बीज बोते, फसल काटते थे। अब वे केवल अपने आप को, और अपने अकेलेपन को छूते थे।
अगले कई दिन एक धुंधली दिनचर्या में बीते। मीका उसका भोजन एक लकड़ी के तख्ते पर रखकर चली जाती। वह उसे दहलीज के पास रखती, और शिमोन तभी उठकर लेता जब वह दूर चली जाती। पानी का घड़ा अलग था। कपड़े अलग धोए जाते। रातें सबसे कठिन थीं। तम्बू के अंदर का अँधेरा उसकी अलगाव की भावना से और गहरा हो जाता। कभी-कभी वह यहोवा से प्रार्थना करता, कोई जटिल प्रार्थना नहीं, बस एक ही वाक्य, “मैं यहाँ हूँ।”
फिर एक सुबह, ऐसा लगा जैसे शरीर ने फैसला कर लिया हो। वह जागा, और वह नमी, वह लगातार रिसाव गायब था। उसने सात दिन और गिने। हर दिन सुबह उठकर वह अपने आप को जाँचता, एक तरह की सतर्क आशा के साथ। सातवें दिन की शाम, उसने मीका को आवाज़ दी, जो तम्बू के दूसरे हिस्से में थी। “कल,” उसने कहा, आवाज़ में एक कंपकंपी थी, “कल मैं एलीएज़ार के पास जाऊँगा।”
मीका ने चौखट के पार से उसकी ओर देखा। उसकी आँखें चमक उठीं, एक ऐसी चमक जो महीनों से नहीं दिखी थी। “मैं पक्षी तैयार करूँगी,” वह बस इतना ही कह पाई।
अगली सुबह, भोर में ही, शिमोन ने सफेद सनी के नए वस्त्र पहने। उसके हाथ में एक टोकरी थी, जिसमें दो सफेद, कोमल कबूतर थे, जो कभी-कभी फड़फड़ाते। मीका और याकूब दूर से चल रहे थे, उसके पीछे, फासला बनाए हुए। अभी भी नियम था। शुद्धि के बाद ही वह फिर से ‘छू’ सकता था।
मिलापवाले तम्बू का आँगन सुबह की धूप में चमक रहा था। एलीएज़ार वहाँ थे, उनके सहायक याजकों के साथ। शिमोन ने टोकरी आगे बढ़ाई। रीति के अनुसार, एलीएज़ार ने एक पक्षी लिया, उसका सिर मोड़ा, और वेदी पर उसे चढ़ा दिया – पापबलि। रक्त वेदी के सींग पर लगाया गया। दूसरा पक्षी होमबलि के रूप में चढ़ाया गया, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक था।
इस सब के दौरान शिमोन खड़ा रहा, उसका सारा ध्यान उन कर्मकांडों पर था जो उसके लिए, केवल उसके लिए किए जा रहे थे। यह न्याय नहीं था, न दंड। यह पवित्रता का नक्शा था, जिसमें उसकी स्थिति एक धब्बा थी, और अब उसे मिटाया जा रहा था।
फिर एलीएज़ार ने उसकी ओर मुड़कर देखा। उनकी आँखों में एक कोमलता थी। “शिमोन बेन-यूधा,” उन्होंने घोषणा की, आवाज़ स्पष्ट और ऊँची, ताकि वहाँ खड़े कुछ और लोग भी सुन सकें। “परमेश्वर ने तुम्हारी भेंट स्वीकार की है। अब तुम शुद्ध हो। तुम समुदाय में लौट सकते हो, अपने परिवार के पास, और परमेश्वर के पवित्र स्थान में।”
ये शब्द सुनते ही शिमोन के कंधों से एक भारी बोझ उतर गया, जिसका वजन उसे पता भी नहीं था कि वह उठाए हुए है। वह मुड़ा। दरवाज़े पर, मीका और याकूब खड़े थे। याकूब की आँखें नम थीं। शिमोन धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा। जैसे ही वह नज़दीक पहुँचा, याकून ने हिचकिचाते हुए अपना हाथ बढ़ाया। शिमोन ने उसे थाम लिया। उस हाथ की गर्माहट, जो महीनों से उससे दूर थी, उसने उसे एक ऐसी शुद्धि का एहसास कराया जो किसी भी बलि से बढ़कर थी। यह वापसी थी। सिर्फ घर की नहीं, बल्कि अपने आप में, मानवीय स्पर्श के उस सरल, पवित्र ठहराव में वापसी।




