पवित्र बाइबल

विश्वास की विजय: राजा आसा

यहूदा के पहाड़ी इलाके में दोपहर की गर्मी स्थिर थी, ऐसी लग रही थी जैसे हवा ने भी साँस लेना छोड़ दिया हो। यरूशलेम की पथरीली गलियों से उठती धूल, राजमहल के ऊँचे बुर्ज पर बैठे आसा के चेहरे पर जम रही थी, पर वह बेखबर था। नीचे, नगर में एक अलग ही सन्नाटा था—डर का नहीं, बल्कि गहरी, थकी हुई शांति का। इतने वर्षों के बाद भी यह शांति उसे अजनबी सी लगती थी।

उसके सामने, मेज पर फैले हुए खाके और पुराने अभिलेख पड़े थे। उसके दादा, राजा सुलैमान ने जो भव्य मंदिर बनवाया था, उसकी छाया में भी इस देश ने इतनी अशांति देखी थी। मूर्तियाँ, ऊँचे स्थान, अशेरा के नगाड़े—यह सब अब धीरे-धीरे स्मृति बन रहे थे। आसा ने अपने पिता अबिय्याह के अल्प शासनकाल को याद किया, जो सदैव युद्धों में उलझा रहा। पर उसने ठान लिया था कि उसका रास्ता अलग होगा। उसने अपने हाथों से उन विदेशी वेदियों को गिरवाया था, उन मूर्तियों को तोड़ा था जिन्हें लोग पूजते थे। कुछ बुजुर्गों ने कड़वी शिकायतें भी की थीं—”परंपरा का क्या होगा?” पर आसा ने एक ही बात कही: “हम केवल एक परमप्रभु की परंपरा को मानेंगे।”

देश ने साँस ली। उन चालीस शांतिपूर्ण वर्षों में, आसा ने यहूदा के गढ़ बनवाए। मिस्पा, गबा, अदोरैम—ये नगर अब सुरक्षित चहारदीवारियों से घिरे थे। उसने सेना को संगठित किया, यहूदा से तीन लाख ढाल और भाला धारण करने वाले योद्धा एकत्र किए, और बिन्यामीन से दो लाख अस्सी हजार धनुर्धर। पर उसकी असली ताकत योद्धाओं की संख्या नहीं थी। वह प्रतिदिन प्रार्थना में घंटों बिताता, मानो परमप्रभु से कोई गुप्त मंत्रणा कर रहा हो। उसकी प्रजा उसे देखती—एक दुबला-पतला राजा, जिसकी आँखों में एक अटल विश्वास था—और वे भी निश्चिंत हो जाते।

पर शांति सदैव नाजुक होती है। एक दिन, दक्षिण से समाचार आया। कूशी सेना, जिसका सेनापति जेरह था, मारेशा की ओर बढ़ रही थी। एक लाख सैनिक… और उनके साथ तीन सौ रथ। संख्या इतनी भयावह थी कि दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ सलाहकारों ने संधि की बात छेड़ी, कुछ ने पहाड़ियों में छिप जाने का सुझाव दिया। आसा ने सबकी बात सुनी, उसका चेहरा पत्थर की मूर्ति सा अटल। फिर उसने आज्ञा दी: सेना मारेशा के समीप जाफा तलवादी में एकत्र होगी।

जब यहूदा की सेना उस विशाल घाटी में पहुँची, तो दृश्य हृदय विदारक था। सामने, दूर तक, कूशी सेना का समुद्र लहरा रहा था। उनके रथों की धूप में चमकती धातु, ढोलों की गड़गड़ाहट, युद्ध के नगाड़ों की आवाज़—सब कुछ मिलकर एक भयानक सिम्फनी रच रहे थे। यहूदा के सैनिकों के हाथों से पसीना बह रहा था, उनकी ढालें अचानक बहुत भारी लगने लगी थीं।

तब आसा सेना के सबसे आगे खड़ा हुआ। उसने अपना हथियार नीचे रखा, और उसकी आवाज़, जो साधारणतः शांत रहती थी, पहाड़ियों में गूँज उठी: “हे परमप्रभु! तुझे बलवान और निर्बल में फर्क करने में कोई कठिनाई नहीं है। हमारी सहायता कर, क्योंकि हम तेरे ही भरोसे इस विशाल सेना के विरुद्ध खड़े हैं। हे परमप्रभु, तू हमारा परमेश्वर है। मनुष्य को तेरे सामने शक्तिहीन न होने दे।”

प्रार्थना समाप्त हुई। एक पल के लिए सब कुछ ठहर सा गया। फिर, ऐसा लगा जैसे आकाश स्वयं हिल उठा। कोई तूफ़ान नहीं, कोई आग नहीं, बस एक अदृश्य ताकत जो सबके भीतर से होकर गुज़री। यहूदा के सैनिकों ने जोर से नारा लगाया, और वे आगे बढ़े—डरते हुए नहीं, बल्कि एक ऐसे विश्वास के साथ जो उन्हें स्वयं अचरज में डाल रहा था।

युद्ध घंटों चला। पर यह युद्ध नहीं, एक तरह की भगदड़ थी। कूशी सेना, जो अजेय मानी जाती थी, तितर-बितर हो गई। यहूदा के सैनिक गेरार तक उनका पीछा करते रहे, जब तक कि कोई भी शत्रु खड़ा नहीं बचा। रथ टूटे पड़े थे, हथियार बिखरे हुए थे। विजय इतनी पूर्ण थी कि लूट का सामान—भेड़-बकरियाँ, ऊँट, अनाज—इतना अधिक था कि उसे ले जाने के लिए बैलगाड़ियों की कतारें लग गईं।

वापसी यरूशलेम की ओर एक उत्सव की तरह थी। पर आसा चुप था। जब वह नगर के फाटक से होकर गुज़रा, तो एक वृद्ध भविष्यद्वक्ता, ओदेद का पुत्र अजर्याह, उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी आँखें चमक रही थीं। “सुन, हे राजा आसा!” उसकी आवाज़ दर्शकों के शोर को चीरती हुई आई। “परमप्रभु तुम्हारे साथ है, जब तक तुम उसके साथ हो। यदि तुम उसे ढूँढोगे, तो वह तुम्हें मिलेगा। पर यदि तुम उसे छोड़ दोगे, तो वह भी तुम्हें छोड़ देगा।”

ये शब्द आसा के हृदय में उसी तरह धँस गए, जैसे नक्काशीकार का औज़ार पत्थर में। उसने पूरे यहूदा और बिन्यामीन में, और एप्रैम के पहाड़ी इलाकों में भी, जो उसने हाल ही में जीते थे, एक बड़ी सभा बुलाई। लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए, उनके चेहरे विजय के उल्लास और भविष्य की चिंता के बीच झूल रहे थे।

आसा ने उन सबके सामने, उसी शांत, दृढ़ स्वर में फिर से प्रतिज्ञा की। उन सभी ने शपथ ली कि वे परमप्रभु, अपने पूर्वजों के परमेश्वर की, सारे मन और सारी आत्मा से खोज करेंगे। और जो कोई इसकी अवहेलना करेगा, वह मार डाला जाएगा—चाहे वह कितना ही छोटा हो या बड़ा।

उस दिन की गोधूलि में, जब भीड़ विदा हो चुकी थी, आसा फिर से अपने महल के बुर्ज पर खड़ा था। नीचे, नगर शांत था। चहारदीवारियों के पार, अँधेरे पहाड़ दिख रहे थे। उसने एक गहरी साँस ली। आज का युद्ध जीत लिया गया था। पर वह जानता था कि सबसे बड़ी लड़ाई तो हर दिन, हर पल, अपने ही हृदय में लड़ी जाती है—विश्वास बनाम भय की, आज्ञाकारिता बनाम अहंकार की। हवा में ठंडक आने लगी थी। उसने अपना चोगा कसकर लपेट लिया, और अंधेरे में धीरे-धीरे उतर गया, जहाँ महल के दीये टिमटिमा रहे थे, और देश की शांति, एक बार फिर, नाज़ुक और अनमोल, रात भर सोने की प्रतीक्षा कर रही थी।

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