धूप तेज थी, पर हवा में अब भी एक नमी, एक गंध थी—पानी और नई मिट्टी की। नूह ने जहाज के दरवाजे के बाहर खड़े होकर गहरी सांस ली। चारों तरफ सन्नाटा, एक ऐसा सन्नाटा जो उसके कानों के लिए अजनबी था। इतने महीनों तक जीव-जंतुओं की आवाज़ों, उनके पैरों की टापों, पंखों की फड़फड़ाहट से गूंजता हुआ जहाज… और अब यह खामोशी। बस हवा का सीटी जैसा स्वर।
वह धीरे-धीरे नीचे उतरा। पैर नरम, गीली जमीन पर पड़े। पत्नी, बेटे, बहुओं सबके चेहरे पर एक ही भाव था—थकान, राहत, और एक अजीब सा डर। सब कुछ नया था। पहाड़ों के शिखर दिखने लगे थे, पर आस-पास का अधिकांश भू-भाग चिकनी मिट्टी और पत्थरों का मैदान था, जहाँ कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे अंकुर फूट रहे थे।
पहले कुछ दिन तो बस इधर-उधर घूमने, देखने में बीते। शेम, हाम और येफेत अपने-अपने परिवारों के साथ अलग-अलग दिशाओं में गए। रहने के लिए गुफाएं ढूंढीं, अस्थायी झोंपड़ियाँ बनाईं। एक दिन नूह ने सबको इकट्ठा किया। आग के पास बैठे थे, रात की ठंडक बढ़ने लगी थी।
“अब हमें फैलना होगा,” नूह ने कहा, उसकी आवाज़ में वह पुराना दृढ़ स्वर था। “यह धरती भर देने का समय है।” पर उसकी आँखों में एक सवाल भी था। क्या फिर वही होगा? क्या मनुष्य की बुराई फिर से बढ़ेगी? उसने यह सवाल किसी से नहीं पूछा, बस परमेश्वर की ओर देखा।
और तब वह दिन आया। आकाश साफ था, बादलों का नामोनिशान नहीं। नूह अपने खेत के एक टुकड़े पर काम कर रहा था, जहाँ उसने कुछ बीज बोए थे। अचानक एक आवाज़, एक आंतरिक आवाज़, लेकिन इतनी स्पष्ट जैसे कोई पास खड़ा बोल रहा हो।
“नूह।”
वह ठिठक गया। हल उसके हाथ में रुक गया।
“मैं तुम्हारे और तुम्हारी संतान के साथ अपनी वाचा स्थापित करता हूँ। और हर जीवित प्राणी के साथ, चिड़ियों, पशुओं, सबके साथ। फिर कभी सारे प्राणी जलप्रलय से नष्ट नहीं होंगे। पृथ्वी का सर्वनाश करने वाला फिर कभी जलप्रलय नहीं होगा।”
नूह का गला भर आया। वह घुटनों के बल बैठ गया। यह वाचा का वचन था। केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि हर उस जीव के लिए जो उस जहाज से बाहर आया था। उसकी पीढ़ियों के लिए। एक वादा।
फिर परमेश्वर ने कहा, “मेरी वाचा का चिह्न यह होगा। मैं बादल में अपना धनुष रखूंगा। जब कभी मैं पृथ्वी पर बादल लाऊंगा, तब वह धनुष बादल में दिखाई देगा। और मैं अपनी वाचा स्मरण रखूंगा।”
नूह ने आँखें उठाईं। और तब हुआ। बादल तो था नहीं, पर आकाश में, सूर्य की किरणों के बीच, रंगों का एक विशाल, जीवंत चाप प्रकट हुआ। लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, बैंगनी… रंग इतने स्पष्ट, इतने जीवंत कि नूह की सांस रुक गई। यह कोई साधारण प्रकाश का खेल नहीं था। यह एक निशानी थी। एक मुहर। ईश्वर का वचन, आकाश पर लिखा हुआ।
वह चिल्लाया, अपने सबको बुलाने के लिए। लोग दौड़े-दौड़े आए। सब ने देखा। कोई बोल नहीं पा रहा था। हाम की आँखों में आंसू थे। शेम ने अपने बच्चों को ऊँचा उठा लिया, दिखाया। येफेत मुस्कुराया, एक गहरी, शांत मुस्कान। यह डर का प्रतीक नहीं था। यह अनुग्रह का प्रतीक था। एक वादा कि अब विनाश नहीं होगा। बारिश अब श्राप नहीं, बल्कि धरती को जीवन देने वाली होगी।
समय बीता। नूह बूढ़ा होता गया। उसकी दुनिया बदल गई थी। एक दिन उसने दाख की बारी लगाई। शायद नए सिरे से जीवन शुरू करने का, जड़ जमाने का एक प्रयास। उसने दाखरस बनाया, और एक शाम, अकेले बैठकर, उसने पी लिया। ज्यादा पी लिया। वह अपने तम्बू में गहरी नींद में सो गया, बेहोश, उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त।
हाम, जो उधर से गुजर रहा था, ने देखा। वह अंदर गया। और वहाँ जो देखा, उस पर उसकी प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उसने अपने पिता की इस दशा को देखा, और उसके बजाय उन्हें ढँकने के, उसकी लज्जा की रक्षा करने के, वह बाहर निकला और अपने भाइयों के पास गया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हल्की-सी खिलखिलाहट थी, “देखो तो, पिताजी कैसे पड़े हैं।”
शेम और येफेत ने एक-दूसरे की ओर देखा। बिना एक शब्द कहे, उन्होंने एक चादर उठाई, पीछे की ओर से तम्बू में गए। उन्होंने अपने चेहरे दूसरी ओर फेर लिए, ताकि अपने पिता की नग्नता न देखें, और धीरे से उन्हें चादर से ढँक दिया।
जब नूह की नींद खुली और उसे पता चला कि हाम ने क्या किया है और शेम व येफेत ने क्या, तो उसका हृदय भारी हो गया। यह केवल नग्नता का प्रश्न नहीं था। यह आदर, संयम और कुल की मर्यादा का प्रश्न था। हाम ने जो कुछ देखा, उसे छिपाने, सम्मान से सँभालने के बजाय उसे फैलाया था। और भाइयों ने पिता की गरिमा बचाई थी।
नूह ने हाम को आशीर्वाद नहीं दिया। उसने कनान को श्राप दिया—हाम का बेटा। वह दासों का दास होगा। यह एक भविष्यवाणी थी, कुलों के भविष्य के बारे में। और शेम व येफेत को आशीष दी। शेम के परमेश्वर की स्तुति होगी। येफेत का विस्तार होगा।
नूह ने आकाश की ओर देखा। इंद्रधनुष कभी-कभी दिखाई देता था। वह वाचा का चिह्न अब भी वहाँ था। परमेश्वर का वादा कायम था। पर मनुष्य का हृदय… वह अब भी वही था। नई शुरुआत के बाद भी, पाप की जड़ें गहरी थीं। आशीष और श्राप दोनों इस नई दुनिया का हिस्सा बनने वाले थे। नूह ने एक लंबी सांस ली। जहाज का सफर तो खत्म हो गया था, पर मानवता का सफर अभी लंबा था। और आकाश में रंगों का वह धनुष, वह वादा, उस पूरी यात्रा पर मंडराता रहेगा।




