दो सपने। एक ही रात। और एक राजा जो सोच में डूब गया।
नील नदी के किनारे बसे उस महान शहर में हवा भारी थी। दिन भर की चिलचिलाती धूप के बाद रात का सन्नाटा भी बेचैन करने वाला था। महल के भीतर, फिरौन का विशाल शयनकक्ष एक अजीब-सी उदासी से भरा हुआ था। वह सोया, पर उसकी नींद गहरी नहीं थी। तभी, सपनों का सिलसिला शुरू हुआ।
पहला दृश्य स्पष्ट था। वह स्वयं नदी के किनारे खड़ा था। सामने से सात गायें आईं, स्वस्थ, सुडौल, उनकी चमड़ी चमकदार और मांसपेशियाँ ताकत से भरी हुईं। वे नील नदी के उस हरे-भरे तट पर चर रही थीं, जहाँ का मिट्टी का रंग गहरा लाल था। फिर अचानक, नदी के पानी से ही सात और गायें निकलीं। पर ये कैसी गायें थीं! दुबली-पतली, अस्थियाँ चमक रही थीं, आँखें धंसी हुईं। उन्होंने पहली सात स्वस्थ गायों पर हमला कर दिया, और उन्हें निगल लिया। पर निगलने के बाद भी उनकी दुर्बलता जस की तस रही, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
फिरौन की नींद टूटी। वह पसीने से भीगा हुआ बैठ गया। दिल धड़क रहा था। उसने आँखें मूँदीं, पानी पिया, और फिर लेट गया। शायद यह केवल मन का भ्रम था।
लेकिन नींद फिर आई, और इस बार का सपना और भी विचित्र था। एक हरे-भरे खेत में एक मजबूत डंठल उगा, जिस पर सात भरी हुई, सुनहरी बालें लगीं। हवा के झोंके से वे मधुर स्वर में खनखना रही थीं। तभी, उनके पीछे से सात और बालें फूटीं, पर ये पतली, सूखी, पूर्वी हवा से झुलसी हुईं। उन सूखी बालों ने भरी हुई सात बालों को निगल लिया। और वे भी, निगलने के बाद, वैसी की वैसी सूखी और बेजान ही रहीं।
इस बार फिरौन की आँख खुली तो सुबह का पहला उजाला महल की खिड़कियों से झाँक रहा था। पर उसके मन पर एक अदृश्य बोझ चढ़ गया था। यह केवल नींद का खलल नहीं था; यह कुछ और था। उसकी आत्मा व्याकुल थी। उसने तुरंत मिस्र के सभी ज्योतिषियों और बुद्धिमानों को बुलवाया। वे आए, अपने-अपने ग्रंथ लिए, चेहरे पर गंभीरता लिए। फिरौन ने विस्तार से दोनों सपने सुनाए।
महल का वह कक्ष गूँज उठा विभिन्न व्याख्याओं से। कोई कहता कि यह नील नदी के बाढ़ चक्र का संकेत है, कोई कहता कि यह पड़ोसी देशों से संबंधित है। पर हर व्याख्या अधूरी लगती। कोई भी उस आंतरिक डर को दूर नहीं कर पा रहा था जो फिरौन की आँखों में साफ झलक रहा था। वह निराश हो रहा था। ये सब ज्ञानी, ये सब पुस्तकें, और एक साधारण सपने का अर्थ तक नहीं बता पा रहे।
तभी, महल का एक पुराना सेवक, जो शायद सारी बहस चुपचाप सुन रहा था, आगे बढ़ा। उसकी आँखों में एक चमक थी, जैसे किसी भूले हुए स्मरण ने अचानक उसे झकझोर दिया हो। उसने सिर झुकाकर कहा, “हे महाराज, मेरा एक अपराध याद आता है। बहुत समय पहले, आपके पित्यामह के शासनकाल में, मैंने और शाही महारसौदागर ने, एक ही रात में सपने देखे थे। उस समय कारागार में एक युवक था, एक इब्रानी। उसने हमारे सपनों का अर्थ बताया था। और जैसा उसने कहा था, वैसा ही हुआ। मैं बच गया, और महारसौदागर… उसकी भविष्यवाणी भी सच हुई।”
उस क्षण महल में सन्नाटा छा गया। फिरौन की आँखों में एक नई उम्मीद जगी। “उस युवक को लाओ। अभी।”
कारागार गहरा, नम और उदास था। यूसुफ को जब यह संदेश मिला कि राजा ने उसे बुलाया है, तो उसके मन में क्या चला होगा? वर्षों की उपेक्षा, भुला दिया जाना, निरंतर अंधेरा… और अचानक यह बुलावा। पर उसकी आस्था डगमगाई नहीं। उसने सबसे पहले स्नान किया, अपने बाल संवारे, और साफ वस्त्र पहने। वह जानता था कि यह घड़ी उसके लिए नहीं, बल्कि उसके ईश्वर की महिमा प्रकट करने के लिए थी।
जब यूसुफ महल के विशाल सिंहासन कक्ष में प्रविष्ट हुआ, तो उसकी साधारण छवि और गंभीर चेहरे ने सबका ध्यान खींचा। फिरौन ने सीधे कहा, “मुझे सपने देखे हैं, और कहा जाता है कि तू सपनों का अर्थ जानता है।”
यूसुफ ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “महाराज, यह मेरी योग्यता नहीं है। परमेश्वर ही आपकी शांति के लिए उत्तर देगा।”
और फिर, फिरौन ने पूरी बात दोहराई। सात मोटी गायें, सात दुबली गायें। सात भरी हुई बालें, सात सूखी बालें।
यूसुफ ने शांत भाव से सुना। उसकी आँखें किसी दूरस्थ बिंदु पर टिक गईं, मानो वह स्वयं नहीं, बल्कि कोई और ही उसके माध्यम से बोलने वाला हो। फिर उसने स्वर उठाया। उसकी आवाज़ में एक दिव्य स्पष्टता थी।
“महाराज, दोनों सपने एक ही हैं। परमेश्वर ने आपको बताया है कि वह क्या करने वाला है। सात सुंदर गायें और सात भरी हुई बालें—ये सात वर्ष हैं। सात वर्षों तक मिस्र में अभूतपूर्व समृद्धि होगी। फसलें इतनी होंगी कि लोग गिनती भूल जाएँगे।”
वह रुका, और उसके चेहरे पर गंभीरता और गहरी हो गई। “और उसके बाद आने वाली सात दुबली गायें और सात सूखी बालें—ये भी सात वर्ष हैं। उन सात वर्षों में ऐसा भयंकर अकाल पड़ेगा कि पहले की सारी समृद्धि विस्मृत हो जाएगी। अकाल इतना तीव्र होगा कि लोगों को समृद्धि के वर्ष भी याद नहीं रहेंगे। यह इसलिए हुआ कि परमेश्वर ने इस बात को दृढ़ किया है, और शीघ्र ही यह सब होने वाला है।”
सिंहासन कक्ष में सन्नाटा पसर गया। फिर यूसुफ ने आगे कहा, और अब उसके शब्दों में केवल भविष्यवाणी ही नहीं, बल्कि एक योजना भी थी। “अतः महाराज को एक बुद्धिमान और समझदार व्यक्ति ढूँढना चाहिए, और उसे मिस्र का प्रभार सौंपना चाहिए। पूरे देश में अधिकारी नियुक्त करने चाहिए, ताकि आने वाले समृद्धि के सात वर्षों में पूरे मिस्र की भूमि का पाँचवाँ हिस्सा एकत्र किया जाए। राजकीय भंडारों में अनाज इकट्ठा करना चाहिए, नगरों के नीचे। यह भोजन भविष्य के अकाल के सात वर्षों के लिए संचित रखा जाए, ताकि मिस्र की भूमि उस अकाल से नष्ट न हो।”
फिरौन और उसके सभी दरबारी यूसुफ को देखते रह गए। यह केवल सपनों की व्याख्या नहीं थी; यह एक संपूर्ण प्रशासनिक नीति थी, ज




