पवित्र बाइबल

नियमों का जीवंत सूत्र

चिलचिलाती धूप रेगिस्तान की रेत को तपा रही थी, और मूसा के शिविर के बीचोंबीच खड़ा एलीआजर अपने पिता की छायादार तम्बू के प्रवेश द्वार पर बैठा, मन ही मन उन नए नियमों को दोहरा रहा था जो परमेश्वर ने सीनै पर्वत से दिए थे। हवा में उड़ती महीन रेत की आभा, ऊँटों के बोझ से दबे कुछ व्यापारियों का कारवाँ दूर से गुज़रता, और शिविर में फैली एक नई, अजीब सी शांति। यह शांति केवल चुप्पी नहीं थी, बल्कि एक प्रतीक्षा थी, जैसे भूमि बीज के अंकुरण की राह देखती है।

पिछले दिनों की घटनाएँ—सोने का बछड़ा, गुर्राता हुआ पर्वत, पिता हारून का पश्चाताप—उसके मस्तिष्क में अब भी ताज़ा थीं। पर अब जो बातें सुनाई गई थीं, वे भिन्न थीं। वे केवल ‘तू न करे’ की आज्ञाएँ नहीं थीं। वे ‘तू कर’ के निर्देश थे, जो जीवन की धूल-धकड़ और रोजमर्रा की उलझनों में उतरने को तैयार लगते थे।

उसकी सोच में खलल डालते हुए, शिमोन नाम का एक युवक, जिसका चेहरा चिंता से तन गया था, तेजी से उसके पास आया। “एलीआजर! तुम्हारे पिता यहाँ हैं क्या? एक… एक विवाद है।”

विवाद साधारण सा था, पर उसमें वही जटिलता थी जो मनुष्य के हृदय में होती है। दो पड़ोसी—याकूब और नाथान—एक गाय को लेकर झगड़ रहे थे। याकूब का आरोप था कि नाथान की गाय उसके खेत में घुसकर नवपल्लवित फसल चर गई। नाथान इनकार कर रहा था। दोनों के हाथों में डंडे थे, और आँखों में क्रोध की लपटें।

मूसा धीरे-धीरे तम्बू से बाहर आए। उनकी उपस्थिति में ही भीड़ थोड़ी शांत हुई। उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल याकूब की ओर देखा, फिर नाथान की ओर। उसके बाद उनकी नजर दूर, उस विस्तृत रेगिस्तान पर टिक गई, मानो वहाँ से कोई उत्तर ढूँढ रहे हों।

अचानक उन्होंने कहा, “क्या तुममें से किसी ने कोई गवाह देखा? कोई व्यक्ति नहीं, तो शायद कोई पक्षी, या रेत पर कोई निशान?”

याकूब बोला, “गवाह? भला इस उजाड़ में कौन गवाह होगा? केवल झरबेरी का वह पेड़ और वह पत्थर है।”

मूसा ने सिर हिलाया। “फिर तो यह झूठी गवाही का मामला है। एक का शब्द दूसरे के विरुद्ध। परमेश्वर का वचन स्पष्ट है—‘तू झूठी अफवाह न फैलाना, और दुष्टों के साथ मिलकर अधर्म का गवाह न बनना।’ तुम दोनों अपनी-अपनी बात पर अटल हो। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?”

वे आश्चर्यचकित थे। मूसा उन्हें शिविर के बाहर, उसी झरबेरी के पेड़ के पास ले गए, जिसका जिक्र याकूब ने किया था। वहाँ रेत पर पगचिन्ह थे, बिखरे हुए, उलझे हुए। मूसा ने नाथान से कहा, “तुम्हारी गाय किस बाड़े में है?” नाथान ने एक दिशा दिखाई। फिर मूसा ने याकूब के खेत की ओर इशारा किया। पगचिन्हों का रास्ता स्पष्ट रूप से नाथान के बाड़े से याकूब के खेत की ओर जाता था, और फिर लौट आता था।

नाथान का चेहरा फक्क पड़ गया। मूसा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में क्रोध नहीं, एक गहरा दुख था। “न्याय करते समय भीड़ के बहकाव में नहीं आना चाहिए,” मूसा ने धीरे से कहा, मानो स्वयं से बात कर रहे हों, “और न ही किसी गरीब का पक्ष इसलिए लेना चाहिए कि वह गरीब है। सत्य ही तो परमेश्वर का आसन है।”

उन्होंने नाथान से कहा, “तुम्हारी गाय ने याकूब की फसल नष्ट की है। परमेश्वर का नियम कहता है कि यदि कोई किसी दूसरे के खेत को नुकसान पहुँचाए, तो उसकी भरपाई उत्तम चीज़ से करे। तुम याकूब को अपनी उस गाय में से दो स्वस्थ बछड़े दो, जो अभी तक दूध नहीं दे रही। और जो फसल नष्ट हुई है, उसका दाम भी अगले फसल के समय अदा करना।”

नाथान का सिर लज्जा से झुक गया। उसने हाँ में सिर हिलाया। याकूब के चेहरे पर राहत थी, पर विजय का भाव नहीं। मूसा ने दोनों के कंधे पर हाथ रखा। “याद रखो, तुम दोनों इस शिविर के भाई हो। तुम्हें एक-दूसरे का बोझ उठाना है। यहाँ तक कि यदि तुम्हारे बैरी का बैल या गधा भटक जाए, तो उसे लौटाकर उसके पास पहुँचा देना। परमेश्वर की दृष्टि में यही सच्चा धर्म है।”

घटना शांत हो गई, पर एलीआजर के मन में बात घर कर गई। ये नियम केवल पत्थर की तख्तियों पर उकेरे गए शब्द नहीं थे। ये तो जीवन का सूत थे, जिससे समाज का ताना-बाना बुना जाना था।

कुछ दिन बाद, सातवें दिन की बात है। शिमोन फिर आया, इस बार उत्साहित। “चलो, एलीआजर! आज तो विश्राम का दिन है। मैंने दूर पश्चिम में एक हरित-क्षेत्र देखा है, शायद कुछ विशेष जड़ी-बूटियाँ मिल जाएँ। हम दो-चार घंटे में लौट आएंगे।”

एलीआजर ने इनकार कर दिया। “नहीं, शिमोन। छह दिन तो तू अपना सारा काम करना, पर सातवें दिन विश्राम करना। इसलिए कि तेरे बैल और गधा भी चैन से रहें। तू क्या समझता है, यह आज्ञा केवल हमारे लिए है? यह तो सृष्टि के हर श्रमिक के लिए है—तेरे दास, परदेशी, यहाँ तक कि तेरे पशु भी।”

शिमोन हँसा। “पर यह तो छोटा सा काम है! हम चलेंगे ही नहीं, घोड़े पर चढ़कर जाएंगे!”

“नहीं,” एलीआजर का स्वर दृढ़ था। “आज का दिन तो परमेश्वर के लिए पवित्र है। इसका उल्लंघन करना, उस आशीष को ठुकराना है जो उसने इस विश्राम में रखी है। आज हम इकट्ठा होंगे, उसकी स्तुति के गीत गाएंगे, अपने बच्चों को उसके काम सुनाएंगे। यही हमारी खेती है आज के दिन।”

शिमोन की उत्सुकता ठंडी पड़ गई। वह बैठ गया। दोनों तम्बू के साये में बैठे, और एलीआजर ने उसे उन तीन पर्वों के बारे में बताया, जिनका उल्लेख नियमों में था—अखमीरी रोटी का पर्व, फसल कटनी का पर्व, और फलों की कटनी का पर्व। “पिता कहते हैं, ये केवल उत्सव नहीं हैं,” एलीआजर ने कहना जारी रखा, “ये याद दिलाने के लिए हैं कि हमारा जीवन उसकी उदारता पर निर्भर है। और जब हम ये मनाएं, तो परमेश्वर के सामने खाली हाथ नहीं जाना। हर कोई, अपनी समर्था के अनुसार, कुछ न कुछ भेंट अवश्य लाए।”

धीरे-धीरे सूर्य अस्ताचल की ओर ढलने लगा। शिविर में एक अलग ही गतिविधि शुरू हो गई थी। लोग एक-दूसरे के तम्बुओं में जा रहे थे, बूढ़े लोग बच्चों को कहानियाँ सुना रहे थे, स्त्रियाँ एक साथ बैठकर गीत गा रही थीं। कोई काम नहीं हो रहा था, फिर भी एक पवित्र कार्य हो रहा था—मन और आत्मा का पोषण।

एलीआजर ने देखा, शिविर के किनारे पर बने एक छोटे से तम्बू से एक परदेशी, जो हाल ही में उनके साथ आया था, बाहर निकला और पानी की तलाश में इधर-उधर देखने लगा। एलीआजर तुरंत उठा, अपना पानी का मशक लिया, और उसके पास पहुँचा। “लो, पियो।”

परदेशी ने कृतज्ञता से देखा। “तुम्हारे लोग… अजीब हो। तुम्हारे नियम अजीब हैं। दूसरों के बारे में इतना सोचना… यहाँ तक कि हम जैसे अजनबियों के लिए भी।”

एलीआजर मुस्कुराया। “हमारा परमेश्वर कहता है—‘तू परदेशी पर उत्पीड़न न करना, क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी रहे हो।’ यह नियम नहीं, यह हमारी स्मृति है। और यह हमारा भविष्य भी। वह हमें

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *