यह कहानी शेमुएल नाम के एक बूढ़े इज़राइली और उसके पोते याकूब के इर्द-गिर्द घूमती है। समय वसंत का था, जब बादल हल्के होने लगे थे और हवा में गेहूं की बालियों की मधुर गंध तैर रही थी। अबीब का महीना चल रहा था।
शेमुएल अपने खेत के किनारे बैठा, एक पुरानी दाढ़ी पर हाथ फेर रहा था। याकूब, जो बारह साल का था, उसके पास आकर बैठ गया। “दादा, आज सब लोग क्यों इतने व्यस्त हैं? अम्मी ने घर की हर चीज साफ की है, और अब्बा एक दोषरहित मेम्ने को चुन रहे हैं।”
शेमुएल ने आँखों में एक चमक लाते हुए कहा, “बेटा, यह वह समय है जिसकी प्रतीक्षा हमारे पूर्वज साल भर से करते थे। फसह का पर्व आने वाला है। हमें याद है कि कैसे परमेश्वर ने हमें मिस्र की दासता से निकाला। वह रात, जब मृत्यु दूत गुज़रा था… हमारे घरों के चौखट पर भेड़ के खून के निशान ने हमें बचाया था। हम इसे कभी नहीं भूल सकते।”
याकूब ने गंभीर होकर सुना। शेमुएल ने आगे कहा, “कल हम यरूशलेम की यात्रा पर निकलेंगे। वह स्थान जिसे परमेश्वर ने अपना निवास स्थान ठहराया है। वहीं हम फसह का मेम्ना बलि देंगे, उसे भूनकर अखमीरी रोटी और कड़वी जड़ी-बूटियों के साथ खाएंगे। यह हमारी जल्दबाज़ी में निकलने की याद दिलाता है, और दासता की कड़वाहट भी।”
अगली सुबह, पूरा गाँव एक कारवाँ बनाकर चल पड़ा। गधों पर सामान लदा था, बच्चे उत्साह से इधर-उधर दौड़ रहे थे, और बड़े गंभीर मन से यात्रा कर रहे थे। रास्ते भर शेमुएल याकूब को पुरानी कहानियाँ सुनाता रहा – लाल सागर का फटना, मन्ना और बटेर, और सिनाई पर्व पर दिया गया व्यवस्था का वचन। यह कोई साधारण सैर नहीं थी; यह विश्वास की एक पुनर्यात्रा थी।
यरूशलेम पहुँचने पर दृश्य अद्भुत था। शहर पहाड़ी पर बसा था, और मिलाप के तम्बू के आसपास हज़ारों लोग इकट्ठे थे। हवा में धूप और पकते मांस की गंध मिल रही थी। लेवीय याजक व्यवस्थित ढंग से बलियाँ चढ़ा रहे थे। शेमुएल का परिवार भीड़ में शामिल हो गया। जब उनका मेम्ना बलि के लिए ले जाया गया, तो शेमुएल ने याकूब का हाथ पकड़ लिया। “देखो,” उसने फुसफुसाकर कहा, “यह सिर्फ एक रस्म नहीं है। यह हमारा धन्यवाद है, हमारा पश्चाताप है, और उस वाचा की याद है जो हमारे और परमेश्वर के बीच है।”
फसह के भोज के बाद, वे कई दिन वहीं रुके। शेमुएल याकूब को नगर के फाटकों के पास ले गया, जहाँ न्यायी बैठे थे। “देखो,” उसने कहा, “यहाँ न्याय किया जाता है। किसी के साथ पक्षपात नहीं होता, न छोटे का दमन, न बड़े का समर्थन। सच्चा न्याय ही हमारे समाज की नींव है।”
कुछ हफ्ते बाद, गेहूं की फसल पककर तैयार थी। अब सप्ताहों के पर्व (पेंटिकोस्ट) का समय था। फिर से वे यरूशलेम गए, इस बार अपनी स्वैच्छिक भेंट लेकर – हर एक ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिया। खलिहान से नए अनाज का अर्पण, संगीत, और आनंद का समय था यह। याकूब ने देखा कि कैसे गरीब, अनाथ और परदेशी भी इन भोजों में शामिल थे। शेमुएल ने समझाया, “हम भी एक समय मिस्र में परदेशी थे। परमेश्वर की दया हम पर थी। अब यह हमारा फर्ज है कि हम उसी दया को दूसरों पर बरसाएँ।”
वर्ष के अंत में, पतझड़ में, तीसरा पर्व आया – झोपड़ियों का पर्व (सुक्कोत)। पूरा परिवार खेत के पास एक अस्थाई झोपड़ी बनाने में जुट गया। खजूर की डालियाँ, मूर के पेड़ की शाखाएँ, और विलो की टहनियों से बनी उस झुग्गी में वे सात दिन रहे। रात को टूटते तारों के नीचे, अलाव की लपटों के सामने, शेमुएल ने कहानियाँ सुनाईं – चालीस वर्ष जंगल में भटकने के दिन, जब परमेश्वर का बादल उनका मार्गदर्शक था और वे अस्थाई डेरों में रहते थे। “यह झोपड़ी,” उसने कहा, जबकि एक हवा का झोंका उसकी दाढ़ी को हिला रहा था, “हमें याद दिलाती है कि यह धरती हमारी स्थायी घर नहीं है। हमारी नींव परमेश्वर में है, ईंट और गारे में नहीं।”
यात्राएँ खत्म हुईं। गाँव लौटते हुए, याकूब ने एक दिन पूछा, “दादा, क्या यह सब करते रहना ज़रूरी है? इतनी लंबी यात्राएँ, इतनी तैयारियाँ…”
शेमुएल ने एक पत्थर उठाया और एक झरने में फेंक दिया। पानी में गोलाकार लहरें फैल गईं। “देखो, बेटा। हर छलाँग एक कहानी शुरू करती है। ये पर्व हमारे जीवन में वैसे ही हैं। ये हमें रुकने, याद करने, और आनंद मनाने के लिए मजबूर करते हैं। अगर हम इन्हें भूल गए, तो धीरे-धीरे हम अपने इतिहास, अपनी पहचान, और अपने परमेश्वर को भी भूल जाएंगे। और सावधान रहना,” उसकी आवाज़ गंभीर हो गई, “जब तुम बड़े होकर इस धरती पर बसोगे, तो लोग कहेंगे कि दूसरे देवताओं की उपासना करो, जो तुम्हें सीधे दिखाई देते हैं। वह चाँद, वह सूरज, कोई मूर्ति… लेकिन याद रखना, हमारा परमेश्वर अदृश्य है, पर वही सच्चा है। उसके नियमों से चिपके रहना, चाहे कितनी भी आकर्षक दूसरी राहें क्यों न दिखें।”
वर्ष बीतते गए। शेमुएल बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी आँखें सदा के लिए बंद हो गईं। लेकिन याकूब, जो अब एक परिपक्व व्यक्ति बन चुका था, हर साल अपने परिवार के साथ तीन बार यरूशलेम की यात्रा करता। जब वह फसह की रात अखमीरी रोटी तोड़ता, सप्ताहों के पर्व पर अनाथ को अपने साथ भोजन कराता, या झोपड़ियों में अपने बच्चों को तारे दिखाता, तो उसे दादा की आवाज़ सुनाई देती – धीमी, दृढ़, और प्रेम से भरी। यह सिर्फ व्यवस्था का पालन नहीं था; यह एक जीवंत विरासत को आगे बढ़ाना था। एक ऐसी आग जो हर पीढ़ी में, यादों और आज्ञाकारिता के ईंधन से, सदा जलती रहे।




