सब कुछ शांत था। वह शांति जो भविष्यवाणी के बाद, तूफान के पहले क्षणों में छा जाती है। स्वर्ग के उस हिस्से में, जहाँ समय की धारा ठहर सी गई थी, मैंने एक और महान और अद्भुत चिह्न देखा। आकाश न तो नीला था, न काला। वह एक तरह की गहरी, जीवंत चमक से भरा था, जैसे संध्या की लाली और भोर के उजास का मिलन हो।
और फिर वह दिखाई दिया – काँच के समान एक सागर, जिसमें आग मिली हुई थी। यह कोई सामान्य जल नहीं था। यह पारदर्शी था, इतना कि उसकी गहराईयों तक देखा जा सकता था, पर उसमें एक दहकती हुई ज्वाला का प्रतिबिंब था, जो ऊपर कहीं, उस सिंहासन से आ रही थी जिसका वर्णन शब्दों में कर पाना असंभव है। वह सागर शांत था, एकदम चिकना, पर उसकी सतह पर जो आग तैर रही थी, वह बिना धुँए के जल रही थी। यह विजय का सागर था।
और उसके किनारे पर खड़े थे वे सब जिन्होंने उस जंगली जानवर, और उसकी मूरत पर, और उसके नाम के अंक पर जय पाई थी। उनकी गिनती नहीं की जा सकती थी। हर जाति, हर भाषा, हर कौम के लोग। उनके चेहरे पर थकान के चिह्न थे, कई के शरीर पर उत्पीड़न के घाव थे, पर उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो संसार के किसी भी कष्ट से अधिक तेजस्वी थी। उनके हाथों में सारंगियाँ नहीं, बल्कि परमेश्वर के दिये हुए सारंगी जैसे वाद्य थे।
और वे गा रहे थे। उनका गीत केवल स्वरों का मेल नहीं था, वह उनके अस्तित्व से निकल रहा था। वह मूसा के गीत जैसा था, उस दासता से मुक्त हुए भगवान के सेवक का गीत। पर उसी के साथ मेल खाता हुआ मेम्ने का गीत भी था। बोल स्पष्ट थे, और हर शब्द उस काँच के सागर में गूंज रहा था:
“हे प्रभु परमेश्वर, सर्वशक्तिमान,
तेरे काम महान और अद्भुत हैं!
हे राष्ट्रों के राजा,
तेरी ही चाल सच्ची और ठीक है!”
वह गीत सरल था, गहरा था। उसमें कोई जटिल सिद्धांत नहीं, कोई दार्शनिक बहस नहीं। केवल एक मानव हृदय की वह गूंज थी जो अपने सृष्टिकर्ता के सामने पूरी तरह नतमस्तक था। उनका गायन बंद हुआ, पर मौन में भी वह धुन वहाँ हवा में रह गई, जैसे स्वर्ग की नब्ज पर एक स्थायी धड़कन।
तभी, उस सभा-भवन के भीतर से, जो सिंहासन के निकट था और जिसका द्वार खुल गया था, धुआँ निकलने लगा। यह कोई साधारण धुआँ नहीं था। यह परमेश्वर की महिमा और उसकी शक्ति से भरा हुआ था। उस धुएँ के कारण कोई भी उस भवन में प्रवेश नहीं कर सकता था, जब तक कि सातों स्वर्गदूतों के सातों विपत्तियाँ पूरी न हो जाएँ।
और फिर वे बाहर आए। सात स्वर्गदूत। वे उस धुएँ से निकले, जो भवन से भर रहा था। उनके वस्त्र चमकीले और शुद्ध थे, जैसे पत्थर कीमती, और उनकी कमर सोने के पटुकों से कसी हुई थी। उनके चेहरे न तो क्रोध से तमतमाए थे, न ही उदासीन थे। उनमें एक भयंकर गंभीरता थी, न्याय की उस घड़ी की गंभीरता जो टल नहीं सकती। उनमें से एक ने उस सजीव सृष्टि में से, जो सिंहासन के चारों ओर थी, सात सोने के कटोरे लिए। वे खाली नहीं थे। वे परमेश्वर के उस अंतिम क्रोध से भरे हुए थे, जो सदा के लिए जीवित रहने वाले परमेश्वर का क्रोध था।
वह दृश्य अवर्णनीय था। एक ओर काँच के समान सागर के किनारे खड़े विजेताओं का समूह, जो अब शांत था, उनकी आँखों में एक शांत आश्चर्य था। दूसरी ओर, सात दूत, उनके हाथों में वह भयानक भरा हुआ अंतिम न्याय। आग और काँच का सागर, और सोने के कटोरे। महिमा और भय। करुणा और न्याय। सब कुछ एक साथ, एक ही सत्य के दो पहलू।
और भवन धुएँ से भर गया। वह महिमा का धुआँ था, जो यह दर्शाता था कि अब परमेश्वर की उपस्थिति का कोई और माध्यम नहीं है, कोई और दया का द्वार नहीं है। जो कुछ लिखा जा चुका था, वह पूरा होना था। सातों दूत आगे बढ़े। उनके कदमों से कोई आवाज नहीं आई, पर हर कदम संसार की नींव को हिला रहा था। उन्होंने कटोरे सँभाल रखे थे। और मैं जानता था कि जब वे उन्हें खाली करेंगे, तो पृथ्वी का इतिहास उस अंतिम, भीषण, और अपरिहार्य अध्याय में प्रवेश कर जाएगा। वह गीत अब भी हवा में था… “तेरे काम महान और अद्भुत हैं।” और न्याय, स्वयं परमेश्वर का न्याय, अपने पूरे शब्द पर खरा उतरने को तैयार था।




