वह दिन ठंड की एक हल्की सफेद चादर ओढ़े हुए था, जब मोहन ने अपनी झोपड़ी की देहरी पर बैठकर सोचा कि उसकी ज़िंदगी कहाँ जा रही है। हवा में सरसों के खेतों से आती मदहोश गंध थी, और दूर तक फैले आकाश में बादल धीरे-धीरे रंग बदल रहे थे। उसके मन में, हालाँकि, एक तूफ़ान सा चल रहा था। गाँव की पंचायत में कल फिर विवाद हुआ था – जमीन के एक टुकड़े को लेकर, जो शायद उसके पिता के नाम था या शायद पड़ोसी रामलाल के। बहस बढ़ी, गाली-गलौज हुई, और मन में एक कड़वाहट की रेखा खिंच गई। रात भर वह सो नहीं पाया, उस झगड़े को जीतने की योजनाएँ बनाता रहा, यह सोचता रहा कि कैसे दूसरे को नीचा दिखाया जाए।
उसकी पत्नी सीता ने सुबह चाय बनाई तो उसके चेहरे पर एक शांत उदासी थी। “इतना क्यों लड़ते हो, मोहन?” उसने पूछा, आवाज़ धीमी और थकी हुई। “क्या इसी के लिए रह गए हो? दो टूकड़े ज़मीन के लिए दिल में इतनी आग?”
मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका मन तो बाजार में लगे हुए नए ठेले के बारे में सोच रहा था। रामलाल से जीती हुई ज़मीन पर वह एक छोटी दुकान खोल सकता था। शहर से आने वाली बस वहीं रुकती थी। पैसा आएगा, इज़्ज़त बढ़ेगी। उसकी इच्छाएँ उसके भीतर एक अदृश्य युद्ध छेड़े हुए थीं, जैसे कोई छोटा सा दानव उसकी आत्मा के कोनों में सरसराता फिरता हो। वह प्रार्थना करना भी भूल चुका था। मंदिर जाना तो बहुत पुरानी बात हो गई थी। उसका विश्वास, जो कभी उसकी माँ की कोमल लोरियों में बुना गया था, अब एक धुंधली सी याद बनकर रह गया था।
एक दिन, जब वह बाजार से लौट रहा था, तो रास्ते में बूढ़े गुरुदयाल से मुलाकात हो गई। गुरुदयाल गाँव के सबसे बुजुर्ग थे, और उनकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जो सीधे मन के अंधेरों को छू लेती थी। “बेटा,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ में सर्द हवा जैसी कर्कशता थी, “तेरे चेहरे पर लड़ाई के निशान हैं। तू अपनी ही इच्छाओं से लड़ रहा है, और हार रहा है।”
मोहन ने इन्कार किया, अपनी योजनाओं का बखान करने लगा। गुरुदयाल ने हाथ उठाकर उसे रोका। “तू जो चाहता है, वह माँगता नहीं। या माँगता है तो गलत इरादों से – अपनी इच्छापूर्ति के लिए। परमेश्वर की इच्छा को तो तूने कब पूछने की कोशिश की? वह तेरे पास आना चाहता है, पर तू दुनिया से दोस्ती करके उसका विरोधी बना बैठा है।”
ये शब्द मोहन के कानों में पिघले सीसे की तरह उतर गए। वह चुपचाप अपने घर लौट आया। उस शाम, झोपड़ी के पीछे बने छोटे से आँगन में, वह अकेला बैठा रहा। हवा ठंडी हो रही थी, और आकाश में तारे टिमटिमाने लगे थे। उसके भीतर का संघर्ष एक चरम पर पहुँच गया था। रामलाल के प्रति जलन, पैसे की लालसा, इज़्ज़त की भूख – ये सब उसके सामने एक विशालकाय दीवार की तरह खड़े थे। और तभी, जैसे कोई कोमल प्रकाश उसके अंधकार में उतरा, उसे याद आया उसकी माँ का वह मुहावरा, जो वह बचपन में दोहराया करती थी: “परमेश्वर घमंडियों का विरोध करता है, पर दीन-हीनों पर अनुग्रह करता है।”
एक गहरी साँस लेकर, उसने अपने घुटने टेक दिए। उसकी प्रार्थना में कोई शब्द नहीं थे, बस एक कराहन थी, एक आत्म-समर्पण की मूक पुकार। “मैं हार गया,” उसने फुसफुसाया। “मेरी इच्छाएँ मुझे खा रही हैं। मैं तुझसे दूर भटक गया हूँ।” आँसू, जो शायद सालों से सूखे हुए थे, उसके गालों पर बह निकले। वह एक तरह से टूट गया था। और उसी टूटन में, एक अजीब सी शांति ने जन्म लिया। जैसे कोई भारी बोछ उतर गया हो।
अगली सुबह, वह रामलाल के घर गया। उसके मन में अब जीतने की जलन नहीं, बस शांति की एक धुंधली समझ थी। “रामलाल भाई,” उसने कहा, “वह ज़मीन का टुकड़ा… तुम्हारा ही है। मेरे पिता ने कभी उसकी हदबंदी गलत कर दी थी। मैं… मैं माफ़ी चाहता हूँ।”
रामलाल हैरान रह गया। उसकी आँखों में संदेह था, फिर विस्मय, और अंततः एक चमक। उसने मोहन के हाथ थाम लिए। उस दिन, गाँव में कोई नया झगड़ा नहीं हुआ। बल्कि, दो पुराने दुश्मन एक-दूसरे के घर चाय पीने बैठ गए।
मोहन ने अपने ठेले की योजना त्याग दी। उसने उस टुकड़े पर एक छोटा सा बगीचा लगाना शुरू किया, जिसके फल सबके लिए थे। उसकी प्रार्थना फिर से जीवित हो उठी – अब वह लंबे-चौड़े शब्दों की नहीं, बल्कि मौन की, सेवा की, और दूसरों को समझने की प्रार्थना थी। उसने महसूस किया कि परमेश्वर सचमुच उसके निकट आ गया था, जब उसने अपनी इच्छाओं को, अपने अहंकार को, दरवाज़े से बाहर कर दिया था।
सीता ने एक दिन कहा, “तुममें एक शांति आ गई है, जैसे बरसात के बाद धुली हवा में होती है।”
मोहन ने मुस्कुराते हुए देखा बगीचे में लगे नन्हे पौधों की ओर। “हाँ,” उसने कहा, “क्योंकि अब मैं उसकी इच्छा की तलाश करता हूँ। और उसकी इच्छा में ही असली शांति है। बाकी सब तो बेकार की दौड़ है।”
और फिर, जैसे याकूब ने अपने पत्र में कहा था, मोहन ने भी अनुभव किया कि जब वह परमेश्वर के समीप आया, तो परमेश्वर भी उसके समीप आया। शत्रुता का भाव दूर हुआ, और एक नम्र हृदय ने वह आशीष पाई, जो उसके सभी स्वार्थी सपनों से कहीं अधिक मीठी थी।




