(जिन्न रेगिस्तान का वह हिस्सा जहाँ से कादेश बरनिया आता है, बिल्कुल सूनापन लिए हुए था। हवा चलती तो धूल के बारीक कण मुँह में चरमरा जाते, और चट्टानें दोपहर की तपिश में ऐसी टिमटिमाती दिखतीं जैसे उनके भीतर आग सुलग रही हो। इज़राइल के लोगों का यह समूह, जो कभी विशाल और आशाओं से भरा हुआ करता था, अब ऐसे खिंचे हुए चेहरों और उदास आँखों का पिंड बन चुका था। उनकी चर्चाओं में अब विजय के गीत नहीं, बल्कि पानी की किल्लत का वही पुराना, घिसा-पिटा रोना था।)
वह दिन भी कुछ खास नहीं था। सूरज चढ़ते ही शिकायतों का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ बूढ़े, जिनकी याददाश्त में मिस्र की नहरों का पानी अभी भी बहता था, छाया तलाशते हुए फुसफुसा रहे थे। “यह कैसी जगह है?” एक ने कहा, अपनी सूखी जीभ होंठों पर फेरते हुए। “न अंजीर है, न अंगूर, न अनार… और अब तो पीने के लिए पानी भी नहीं बचा।” उसकी बात हवा की तरह खेमों के बीच फैल गई। शुरुआत में बड़बड़ाहट थी, फिर गुनगुनाहट, और देखते-देखते वह एक कोलाहल में बदल गई। लोग एकत्र होने लगे, उनके चेहरों पर वह भाव था जो मूसा बरसों से देखता आया था—आक्रोख और निराशा का मिला-जुला रूप।
मूसा और उसका भाई हारून, जिनके कंधों पर यह भीड़ चढ़ी हुई थी, मिलापवाले तम्बू के सामने खड़े थे। मूसा की दाढ़ी की सफेदी पर धूल की परत जम गई थी। उसने भीड़ की ओर देखा, उन आँखों में झाँका जो एक समय विश्वास से चमकती थीं, अब केवल अधीरता से भरी थीं। उसके मन में एक थकान उमड़ आई, वह थकान जो हड्डियों तक में बस जाती है। यह पहली बार नहीं था जब लोग पानी के लिए विद्रोह कर रहे थे, लेकिन हर बार यह घटना उसकी आत्मा से कुछ छीन ले जाती थी। हारून चुपचाप उसके बगल में खड़ा था, उसके हाथ काँप रहे थे—शायद बुढ़ापे से, या शायद उस दबाव से जो इस भीड़ ने उन पर डाल रखा था।
लोग और निकट आए। उनकी आवाज़ें तीखी होती जा रही थीं। “हमारे भाइयों की लाशें तो यहीं गिर जातीं, ऐसा क्यों नहीं हुआ?” एक जवान आदमी चिल्लाया, उसकी आँखें लाल थीं। “हमें इस निर्जन स्थान में क्यों लाया गया? हमारे मवेशी और हम सब प्यास से मर जाएँगे!” एक औरत ने अपने सूखे होंठों पर हाथ फेरते हुए कहा। बच्चे रोने लगे थे, उनका रुदन उस गर्म हवा में मिलकर और भी भारी लग रहा था।
मूसा और हारून ने एक-दूसरे की ओर देखा। शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने मिलापवाले तम्बू के द्वार से मुड़कर भीड़ को पीछे छोड़ दिया। उनके कदम धीमे थे, जैसे हर कदम पर कोई बोझ उन्हें खींच रहा हो। वे तम्बू के अंदर गए, वह स्थान जहाँ यहोवा की महिमा प्रकट हुआ करती थी। वे मुंह के बल गिर पड़े। मूसा का माथा ठंडी भूमि से लगा था, लेकिन उसका मन आग की तरह जल रहा था। उसकी प्रार्थना में कोरे शब्द नहीं थे, वह तो एक कराह थी, एक गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति। “हे परमेश्वर,” उसकी आवाज़ फटी हुई थी, “मैं इन लोगों का भार कब तक उठाता रहूँगा? यह सब मेरे लिए क्यों? क्या मैंने इन्हें जन्म दिया है, कि तू मुझसे कहता है इन्हें अपनी गोद में लेकर चलूँ, जैसे कोई धाय अपने दूधपीते बच्चे को लेकर चलती है?” उसकी आवाज़ रुक गई। “अगर ऐसा ही है, तो मुझे मार डाल, बस इस संकट को देखते न रहना पड़े।”
एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, वहाँ एक उपस्थिति का आभास हुआ। यह कोी भयानक दृश्य नहीं था, बल्कि एक गहरी, धधकती हुई महिमा का अहसास था, जैसे चट्टान के भीतर की आग प्रकट हो रही हो। यहोवा की वाणी सुनाई दी।
“तू लोगों के सामने से निकल,” वाणी ने कहा, “और अपने भाई हारून को साथ ले। वह चट्टान, जो तुम्हारे सामने है, उसके सामने अपनी लाठी ले जाना, और लोगों को एकत्र कर। उनके सामने चट्टान से बात करना, और वह अपना पानी देगी। इस प्रकार तू उनके लिए चट्टान में से पानी निकालना, और समुदाय और उनके पशुओं को पिलाना।”
शब्द स्पष्ट थे। मूसा उठा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी रौनक थी, जैसे बोझ कुछ हल्का हुआ हो। उसने हारून को आँख से इशारा किया, और वे दोनों बाहर निकले। भीड़ अब भी वहीं जमा थी, उनकी शिकायतें थमी नहीं थीं। मूसा ने वह लाठी उठाई, वही लाठी जो कितने ही अद्भुत कामों का साक्षी बन चुकी थी। भीड़ ने उसे देखा, और धीरे-धीरे शोर थमने लगा। एक उम्मीद की किरण, हल्की सी, उनके चेहरों पर दौड़ गई। शायद कुछ होने वाला था।
मूसा और हारून भीड़ को लेकर उस विशाल चट्टान के सामने पहुँचे, जो मरियबा के नाम से जानी जाती थी। चट्टान गर्म थी, उस पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी। लोग इकट्ठा हुए, उनकी निगाहें दोनों भाइयों पर टिकी थीं। मूसा ने चट्टान की ओर देखा। परमेश्वर ने कहा था—’उससे बात करना’। बस, बात करनी थी। लेकिन फिर क्या हुआ, यह मूसा स्वयं भी पूरी तरह नहीं समझ पाया। शायद उन चिल्लाते हुए चेहरों की याद आ गई, शायद उस पुरानी थकान ने फिर से जोर मारा, या शायद उस क्षण में उसे लगा कि केवल शब्द पर्याप्त नहीं होंगे, कुछ ठोस करना होगा, कुछ ऐसा जिससे ये विद्रोही लोग डर जाएँ।
उसकी आवाज़ गर्जन की तरह फटी। “सुनो, हे विद्रोहियों!” उसने कहा, और उसके शब्द हवा में काँप गए। “क्या हम इस चट्टान में से तुम्हारे लिए पानी निकाल लाएँ?” यह ‘हम’—यह शब्द वहाँ अनजाने में आ गया, जैसे परमेश्वर के स्थान पर स्वयं को और हारून को रख दिया हो। और फिर, बिना एक पल और सोचे, उसने अपनी लाठी उठाई और चट्टान पर जोर से प्रहार किया। एक बार नहीं, दो बार। लकड़ी का फटकार और पत्थर की गूँज मिली हुई थी।
और तब, चमत्कार हुआ।
चट्टान से पानी फूट निकला। वह कोई रिसाव नहीं था, बल्कि एक ज़ोरदार धार थी, ठंडे, स्वच्छ पानी की। वह धरती पर बहने लगा, नालियाँ बनाती हुई, धूल को चीरती हुई। लोगों ने एक पल हैरानी से देखा, फिर खुशी के चीत्कार के साथ वे पानी की ओर दौड़ पड़े। वे अपने हाथ फैलाते, प्यास बुझाते, अपने सिर और चेहरे भिगोते। बच्चे उछलने लगे, मवेशी रंभाने लगे। एक जीवनदायी कोलाहल फैल गया, जहाँ कुछ ही पल पहले केवल मृत्यु की धमकी थी।
लेकिन मूसा वहीं खड़ा रहा, उसकी लाठी अब भी हाथ में थी। उसने हारून की ओर देखा, जिसकी आँखें चौड़ी थीं—शायद चमत्कार से, या शायद उन शब्दों से जो मूसा ने कहे थे। उनके हृदय में कोई उल्लास नहीं था, बल्कि एक गहरी, भारी चुप्पी थी। वे जानते थे। कुछ गलत हो गया था।
समय बीतता गया। लोगों ने अपने मशक भरे, अपनी प्यास बुझाई। खेमों में फिर से जीवन लौट आया। लेकिन मूसा और हारून के लिए, एक प्रतीक्षा का समय था। और वह वाणी फिर आई, शांत परंतु अटल।
“क्योंकि तुमने इज़राइलियों के सामने मुझ पर विश्वास नहीं किया, और उनके सामने मेरी पवित्रता प्रकट नहीं की, इसलिए तुम इस सभा को उस देश में नहीं पहुँचा पाओगे, जो मैंने उन्हें दिया है।”
यह बात एक चोट की तरह लगी। वह चट्टान, जिसे मेरिबा—’झगड़े की जगह’—कहा जाता




