वह दिन भी क्या दिन था। हवा में एक अजीब-सी गर्माहट थी, ऐसी गर्मी जो न सिर्फ त्वचा को, बल्ती रूह को झुलसा दे। विजय अपनी झोपड़ी के बरामदे में खड़ा, दूर आसमान की तरफ देख रहा था। बादलों का रंग कुछ अजीब था, जैसे ताँबे की चमक उनमें घुल गई हो। गाँव में पिछले कुछ महीनों से एक अफवाह सी फैली हुई थी – कि एक महान नेता आने वाला है, जो सब कुछ ठीक कर देगा। बेरोजगारी, बीमारी, सब खत्म। लोग उसके नाम का जाप करने लगे थे। उसका नाम था, मिहिर। शुरू में तो वह सामान्य सा लगा, एक सामाजिक कार्यकर्ता, जो गरीबों के लिए अन्नक्षेत्र चलाता था। लेकिन धीरे-धीरे उसकी बातें बदलने लगीं।
विजय की दादी माँ, जो गाँव की सबसे बुजुर्ग और समझदार मानी जाती थीं, बैठकर अपनी पुरानी, मोटी बाइबल के पन्ने पलट रही थीं। उनकी आँखें कमजोर थीं, पर होंठ फिर भी हिल रहे थे, शब्दों को महसूस करते हुए। विजय ने पूछा, “दादी माँ, ये मिहिर… लोग कहते हैं वह भगवान का अवतार है। सच में?”
दादी माँ ने अपना चश्मा साफ किया, बिना सिर उठाए। उनकी आवाज में एक गहरा, थका हुआ ज्ञान था। “बेटा, पौलुस प्रेरित ने थिस्सलुनीकिया के लोगों को लिखा था। उन्हें भी ऐसी ही बातों ने घबरा दिया था। याद रखो, उस दिन से पहले, वह ‘पाप का रहस्य’ पूरी तरह से काम करेगा। और वह ‘अधर्म का इंसान’ प्रकट होगा, वही विनाश का पुत्र।”
विजय को समझ नहीं आया। “पर दादी, मिहिर तो बहुत अच्छे काम कर रहा है। उसने नदी पर पुल बनवाया, स्कूल खुलवाए। लोग तो उसे मसीह ही मान बैठे हैं।”
दादी माँ ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुराना दर्द उभर आया हो। “शैतान भी कभी-कभी प्रकाश के दूत का रूप धर लेता है, बेटा। वह झूठे चमत्कार दिखाएगा, बड़े-बड़े आश्चर्यकर्म। लोगों की मुश्किलें दूर करने का वादा करेगा। पर उसकी नीयत में घड़ी-भर की भी विनम्रता नहीं होगी। वह खुद को ही परमेश्वर के सिंहासन पर बैठाना चाहेगा। मंदिर में।”
यह बात सुनकर विजय की रूह काँप उठी। मिहिर ने तो अभी-अभी पुराने मंदिर के परिसर की मरम्मत का ऐलान किया था, और कहा था कि वहाँ एक ‘सार्वभौमिक आराधना स्थल’ बनेगा।
दिन बीतते गए। मिहिर का जादू चलता रहा। उसके भाषणों में एक अद्भुत मिठास थी, जो लोगों के दिलों में उतर जाती। वह हर धर्म की बात करता, पर हर बात का अंत अपनी महानता के भव्य दावे पर होता। फिर एक दिन, उसने घोषणा की कि वह ‘सार्वभौमिक सत्य’ की घोषणा करेगा। सभी धर्मगुरुओं को एक साथ बुलाया गया। विजय भी भीड़ में खड़ा था, दादी माँ की चेतावनी उसके कानों में गूँज रही थी।
मंच पर मिहिर आया। उसकी मुस्कान में एक अलग ही चमक थी, ऐसी चमक जो आँखों को चुभती थी। उसने बड़ी-बड़ी बातें कीं: एकता, शांति, समृद्धि। फिर, अचानक, उसकी आवाज़ बदल गई। उसमें एक धातु की ठंडक आ गई। “मानवता को एक नई दिशा चाहिए,” उसने कहा, “और वह दिशा मैं हूँ। पुराने नियम, पुराने भगवान, सब समय की धूल हैं। आज का देवत्व मानवता का सेवक है, और वह सेवक… मैं हूँ।” उसने अपने हाथ उठाए। और तब कुछ हुआ जिसे देखकर पूरी सभा स्तब्ध रह गई।
मंच के पीछे लगी विशाल स्क्रीन पर, अचानक पूरे गाँव के लोगों के चेहरे दिखाई देने लगे, उनकी निजी बातचीत के अंश सुनाई देने लगे। लोग दहशत में एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। मिहिर मुस्कुराया। “देखो, मैं सब कुछ जानता हूँ। मैं ही सुरक्षा हूँ। मेरी छत्रछाया में आ जाओ।”
वह पल विजय के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। यह वही ‘झूठ के सब चिन्ह और आश्चर्यकर्म’ थे, जिनकी चेतावनी दादी माँ ने दी थी। भीड़ में से कुछ लोग डरकर, हैरानी से घुटने टेकने लगे। पर कुछ चेहरे ऐसे भी थे जो सख्त और अविश्वास से भरे थे। वे वे लोग थे जिनके दिल में पवित्र आत्मा की छाप थी, जो सत्य से प्रेम करते थे। उन्होंने अपना सिर नहीं झुकाया।
उस रात, विजय डरा हुआ सा दादी माँ के पास लौटा। उन्होंने उसका हाथ अपने हाथों में लिया। उनके हाथ ठंडे थे, पर जकड़न में एक अटल शक्ति थी। “डरो मत,” उन्होंने कहा, “यह तो होकर रहेगा। पर याद रखो, प्रभु यीशु उसी को अपने मुंह की सांस से नष्ट करेगा, और अपने आगमन के प्रकाश से मार डालेगा। वह दिन आएगा, बेटा। हमारा काम है, उन शिक्षाओं को थामे रहना जो हमें सिखाई गईं, चाहे बातें कितनी भी मीठी क्यों न लगें। सच्चाई प्रेम है, न कि डर पर राज।”
बाहर, अँधेरा गहरा हो रहा था। पर विजय की झोपड़ी में, एक छोटा-सा दीया जल रहा था। वह दीया उस विश्वास का प्रतीक था जो न तो चमत्कारों से डगमगाता है, न ही दबावों से। वह सिर्फ जलता रहता है, प्रतीक्षा में, उस सुबह की राह देखता हुआ जो अवश्य आनी है।




