उस रोमी कारागार की गंध—नम पत्थर, बासी पानी, और मानवीय पीड़ा की मिली-जुली गंध—अभी भी मेरी नासिकाओं में समाई है। लेकिन उस दिन, जब पौलुस ने बोलना शुरू किया, तो वह गंध भी जैसे फीकी पड़ गई। वह बैठा था, उसकी बेड़ियाँ हल्की सी खनखना उठतीं, पर उसकी आँखों में एक ऐसी ज्वाला थी जो लोहे से भी मजबूत लगती थी।
“देखो,” उसकी आवाज़ खुरदुरी थी, पर उसमें एक अजीब सी मधुरता भी थी, “अगर कोई और सोचता है कि उसे शरीर पर भरोसा करने का कारण मिला है, तो मुझे और भी अधिक कारण हैं।”
उसने अपना हाथ उठाया, और मैंने देखा—उन उँगलियों पर स्याही के पुराने निशान, शास्त्री का चिन्ह। वह एक कहानी सुनाने लगा, पर वह उसकी अपनी कहानी थी। आठवें दिन का खतना, इस्राएल के वंश से, बिन्यामीन के गोत्र से, इब्रानियों में से इब्रानी, व्यवस्था के अनुसार फरीसी… शब्द गर्व से भरे हुए थे, पर उसके चेहरे पर कोई गर्व नहीं था। यह एक सूची थी, एक ऐसी सूची जिसे वह अब कूड़े के ढेर के समान समझता था।
“परन्तु जो बातें मेरे लिए लाभ की थीं, उन्हीं को मैंने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।” उसने ‘हानि’ शब्द पर जोर दिया, ऐसे जैसे कोई व्यापारी सोने की अशर्फियों को गिनते-गिनते अचानक उन्हें मिट्टी के ढेले समझकर फेंक दे।
कारागार की खिड़की से एक तिरछी किरण आ रही थी, और उस धूल भरी रोशनी में उसके चेहरे के झुर्रियों वाले नक्शे और भी गहरे दिख रहे थे। वह आगे बोला, “वरन् मैं अपने प्रभु मसीह को जानने के उस उत्तम ज्ञान की अधिकता के कारण सब बातों की हानि समझता हूँ।” ‘जानने’ शब्द उसने ऐसे बोला, मानो कोई भूखा आदमी रोटी का ज़िक्र कर रहा हो। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं था; यह अनुभव का, आत्मा के स्पर्श का, एक ऐसे संबंध का ज्ञान था जिसने उसे पलटकर रख दिया था।
तभी उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई, गम्भीर। “और उसमें पाया जाऊँ।” वह बोला, “मेरी धार्मिकता नहीं, जो व्यवस्था से होती है, वरन् वह जो मसीह पर विश्वास करने से होती है—अर्थात् परमेश्वर की ओर से विश्वास पर दी जाने वाली धार्मिकता।” उस पल, कारागार का वह छोटा सा कमरा, जहाँ हम कुछ शिष्य जमा थे, एक पवित्र स्थान जैसा लगने लगा। यहाँ कोई नियमों का बोझ नहीं था, कोई ‘कर लो, न करो’ का झंझट नहीं। बस विश्वास। खाली हाथों से आया विश्वास, जो परमेश्वर के अनुग्रह से भर जाता है।
पौलुस ने आगे कहा, “मैं उसको और उसके मृत्युंजय की शक्ति को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के अनुभव को जानूँ।” उसकी आवाज़ में एक कंपन था। मैंने उसकी बेड़ियों की ओर देखा, और फिर उस शान्त चेहरे की ओर। यह दुख उसके लिए अपमान नहीं, एक गौरव था। मसीह के दुखों में हिस्सा पाने का गौरव।
फिर वह एक दौड़ के बारे में बोलने लगा। “भाइयो, मैं यह नहीं समझता कि मैंने अभी तक इसे पा लिया है। परन्तु एक बात करता हूँ: जो बातें पीछे हैं, उन्हें भूलकर, और आगे की बातों के लिए तनते हुए, मैं उस लक्ष्य की ओर दौड़ा चला जाता हूँ।” उसने अपनी मुट्ठी बाँधी, और मैंने सोचा—यह बूढ़ा, जंजीरबद्ध कैदी, इससे ज्यादा स्वतंत्र और मुक्त कोई नहीं दिख रहा था। वह दौड़ रहा था। उसकी आत्मा उन जंजीरों से परे, एक ऐसे लक्ष्य की ओर बढ़ रही थी, जिसकी परछाई भर ने उसे बदल डाला था।
“हम सब जो सिद्ध हैं, यही मन रखें।” उसने हम सबकी ओर देखा। उस नज़र में कोई ताड़ना नहीं, बल्कि एक आमंत्रण था। एक साथ दौड़ने का आमंत्रण।
जब वह बोल चुका, तो कुछ क्षणों तक सन्नाटा रहा। बाहर से रोम की गलियों के शोरगुल की आवाज़ें आ रही थीं, पर हमारे भीतर एक अद्भुत शान्ति थी। मैंने अपने जीवन के उन ‘लाभों’ के बारे में सोचा—मेरी जाति, मेरी उपलब्धियाँ, वे चीज़ें जिन पर मैं इतराता था। और अचानक वे सब फीकी लगने लगीं। एक नया मानदंड मिल गया था: मसीह।
वह दिन बीत गया। पौलुस की बेड़ियाँ तो शायद कभी नहीं खुलीं, पर उस दिन उसके शब्दों ने हमारी मानसिक जंजीरों को तोड़ डाला। मैं उस कारागार से निकला, तो रोम की भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर चलते हुए भी, मेरा मन एक और नगर की ओर उन्मुख था—वह स्वर्गीय नगर, जहाँ का हम नागरिकत्व रखते हैं, और जहाँ से हम एक उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु मसीह की बाट जोह रहे हैं।
और मैं जान गया कि यह दौड़ अकेले दौड़ने के लिए नहीं है। हम सब, जो इस आशा में जीते हैं, एक साथ हैं। पीछे मुड़कर नहीं देखना, दौड़ते रहना है। क्योंकि लक्ष्य, स्वयं प्रभु, इतना मूल्यवान है कि सब कुछ छोड़ देने भर का है।




