सूरज ढलने लगा था, और यरदन नदी के पार के उन पहाड़ों पर एक सुनहरी सी चादर बिछ रही थी। यीशु, थके हुए कदमों से, अपने चेलों के बीच चल रहे थे। रास्ता कठिन था, धूल भरा। उनके चेले आपस में कुछ बड़बड़ा रहे थे – किसी ने कल दोपहर के भोजन में बड़ा टुकड़ा पा लिया था, किसी को लग रहा था कि उसने ज्यादा काम किया है। यह सब एक सामान्य झगड़े की तरह ही था।
यीशु ने एक पत्थर पर बैठकर सांस ली। उनकी आँखों में थकान थी, पर चमक कम नहीं थी। “सावधान रहो,” उनकी आवाज़ नर्म, पर भारी थी। “ठोकर खिलाने वाली चीज़ों से बचो। लेकिन अगर तुम्हारा भाई तुमसे पाप कर बैठे, तो उसे समझाओ। अगर पश्चाताप करे, तो माफ़ कर दो। एक दिन में सात बार भी गलती करे और सात बार लौटकर कहे ‘पछताता हूँ’, तो माफ़ कर देना।”
पतरस ने, जो हमेशा की तरह सबसे आगे खड़ा था, आँखें फैलाकर कहा, “प्रभु, क्या सात बार काफी नहीं?” उसके स्वर में आश्चर्य और थोड़ी सी हताशा थी। उसे लगा, सात बार तो बहुत उदारता है।
यीशु ने उसकी ओर देखा, एक हल्की सी मुस्कान उनके होंठों पर तैर गई। “मैं तुमसे कहता हूँ, सात बार ही नहीं, बल्कि सात गुना सत्तर बार।” फिर, शांत गंभीरता से उन्होंने आगे कहा, “विश्वास की बात है। राई के दाने जितना विश्वास भी अगर तुम्हारे पास हो, तो इस शहतूत के पेड़ से कह सकते हो कि जड़ से उखड़कर समुद्र में जा लग, और वह तुम्हारी सुन लेगा।”
चेले चुप हो गए। शहतूत का वह पेड़, जिसकी छाया में वे बैठे थे, उसकी पत्तियाँ हल्की हवा में सरसरा रही थीं। उसकी जड़ें जमीन में गहरी धँसी थीं। यीशु की बात कल्पना से परे लगी। फिर भी, उनके चेहरे पर ऐसी अटल निश्चयता थी कि संदेह के लिए जगह नहीं बचती थी।
थोड़ी देर बाद, जब वे एक गाँव की ओर बढ़ रहे थे, यीशु ने एक दृष्टांत सुनाया। “मान लो, तुम में से किसी के पास एक सेवक है, जो हल चलाता है या भेड़ें चराता है। जब वह मैदान से लौटेगा, तो क्या तुम उससे कहोगे, ‘आ, जल्दी से बैठ जा और भोजन कर’? नहीं न। बल्कि तुम उससे कहोगे, ‘मेरे खाने की तैयारी कर, फिर अपनी पोशाक बाँधकर मेरी सेवा कर, जब तक मैं खाऊँ-पीऊँ; उसके बाद तू खाना-पीना।’ क्या वह सेवक इस बात के लिए धन्यवाद का पात्र है कि उसने आज्ञा पालन किया? ऐसे ही तुम भी, जब वह सब कर चुको जिसकी आज्ञा तुम्हें दी गई है, तो कहना, ‘हम तो अयोग्य सेवक हैं; हमने तो बस अपना कर्तव्य किया है।’”
उनकी बात सुनकर चेले गहरे विचार में डूब गए। यह शिक्षा उनकी उम्मीदों से एकदम उलट थी। वे तो महानता और प्रतिष्ठा की कल्पना कर रहे थे।
अगले दिन, जब वे सामरिया और गलील की सीमा के पास से गुजर रहे थे, एक दृश्य ने उनका रास्ता रोक लिया। दूर, गाँव के बाहर, कुछ आकृतियाँ खड़ी थीं। उन्होंने एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी थी, पर उनकी आवाज़ें, फटी हुई और दर्द भरी, हवा में तैर रही थीं। “यीशु, हे गुरु, हम पर दया कर!”
दस कोढ़ी थे। उनकी दशा देखकर रोंगटे खड़े हो जाते। किसी की उँगलियाँ गल चुकी थीं, किसी के चेहरे पर घावों के निशान। व्यवस्था के अनुसार, उन्हें सबसे अलग रहना होता था। वे चिल्लाए, “यीशु, हे गुरु, हम पर दया कर!”
यीशु रुक गए। उनकी नज़र उन दसों पर पड़ी, एक-एक को देखा, जैसे उनकी हर पीड़ा को पहचान रहे हों। फिर उन्होंने स्पष्ट, दृढ़ स्वर में कहा, “जाओ, अपने आप को याजकों को दिखाओ।”
यह आदेश अजीब था। व्यवस्था कहती थी कि कोढ़ के ठीक हो जाने पर ही कोई याजक के पास जाकर शुद्ध घोषित हो सकता है। अभी तो उनका कोढ़ वैसा का वैसा था। पर उन दसों ने, शायद उस आवाज़ में छिपे अधिकार को पहचानते हुए, मुड़कर जाना शुरू किया।
और तभी, रास्ते में ही, चमत्कार हुआ।
एक के बाद एक, उनके शरीर पर बिखरे घाव साफ़ होने लगे। मांस लौट आया, त्वचा नवजात शिशु की तरह कोमल और स्वस्थ हो उठी। खुशी से उनमें से नौ व्यक्ति और तेजी से दौड़े, शायद याजक के पास, शायद अपने घरों की ओर, अपनी नई जिंदगी की ओर।
लेकिन एक रुक गया।
वह, देखते ही देखते, वापस लौटा। उसके कदम जोरों से जमीन पर पड़ रहे थे, और उसकी आवाज़ आकाश को चीरती हुई गूंज उठी, “परमेश्वर की महिमा हो!” वह यीशु के पैरों पर गिर पड़ा, और धन्यवाद देने लगा। उसका चेहरा आँसुओं से भीगा था, पर अब वे दुख के नहीं, बल्कि एक अकथनीय कृतज्ञता के आँसू थे।
यीशु ने धीरे से पूछा, “क्या दसों शुद्ध नहीं हुए? फिर नौ कहाँ हैं? क्या इस विदेशी के सिवा और कोई नहीं मिला, जो परमेश्वर की महिमा करने लौट आता?”
उनकी आवाज़ में एक गहरा दुख था, एक ऐसी निराशा जो केवल दिया जाने वाले की उपेक्षा से ही पैदा हो सकती है। फिर उन्होंने नीचे झुके हुए उस व्यक्ति को देखा, और उनका स्वर कोमल हो गया। “उठो, जा। तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है।”
शाम ढल चुकी थी। फरीसियों के एक समूह ने, जो इन सब घटनाओं को दूर से देख रहे थे, यीशु के पास आकर पूछा, “परमेश्वर का राज्य कब आएगा?”
यीशु ने उनकी ओर देखा, उनकी जिज्ञासा और छिपे हुए इरादों को पढ़ते हुए। “परमेश्वर का राज्य ऐसे नहीं आता कि उसे देखा जा सके। न यह कहा जाएगा कि देखो, यहाँ है, या वहाँ है। क्योंकि देखो, परमेश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर ही है।”
फिर उन्होंने अपने चेलों से कहा, “ऐसे दिन आएँगे जब तुम मनुष्य के पुत्र के एक दिन को देखने की लालसा करोगे, और नहीं देखोगे। लोग तुमसे कहेंगे, ‘देखो, वह यहाँ है,’ या ‘देखो, वह वहाँ है।’ पर तुम मत जाना, और मत दौड़ना। क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से चमकती हुई दूसरे छोर तक दिखाई देती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में होगा।”
उनकी बातें भविष्य के एक गहन, अकल्पनीय दुख की ओर इशारा कर रही थीं। “पहले उसे बहुत दुख उठाना होगा, और इस युग के लोग उसे ठुकरा देंगे। और जैसे नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। लोग खाते-पीते थे, ब्याह-शादी करते थे, जब तक कि नूह जहाज पर नहीं चढ़ गया। और जल-प्रलय आया, सबको नाश कर दिया।”
वह मौन हो गए। आसपास का वातावरण गंभीर हो उठा था। “सोमर्रा की नगरी की तरह। वे लोग खाते-पीते थे, खरीदते-बेचते थे, पेड़ लगाते और मकान बनाते थे। पर जिस दिन लूत सदोम से निकला, उसी दिन आकाश से आग और गंधक बरसी और सबको नाश कर दिया। मनुष्य के पुत्र के प्रगट होने के दिन भी ऐसा ही होगा।”
अंत में, उन्होंने एक चेतावनी दी, जिसमें एक सूक्ष्म आशा का स्पर्श भी था। “उस दिन जो कोई छत पर हो, और उसका सामान घर में हो, तो वह उसे लेने नीचे न उतरे। और जो खेत में हो, वह भी पीछे मुड़कर न देखे। लूत की पत्नी को याद करो। जो कोई अपने प्राण बचाना चाहे, उसे खोएगा; और जो उसे खोएगा, वह उसे बचाएगा। मैं तुमसे कहता हूँ, उस रात दो आदमी एक ही खाट पर होंगे; एक ले लिया जाएगा, और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।”
चेले स्तब्ध थे। उन्होंने पूछा, “कहाँ, प्रभु?”
यीशु ने उत्तर दिया, “जहाँ शव होगा, वहाँ गिद्ध इकट्ठे होंगे।”
यह कहकर वे आगे बढ़ गए, गहरी संध्या की ओर, अपने चेलों को उन रह




