हवा में ठंडक थी, पर उस सुबह सूरज ने अपनी पहली किरणों से यरूशलेम के पत्थरों को सोने सा रंग दे दिया था। मन्दिर के प्रांगण में, एलियाकीम नाम का एक युवा याजक, वेदी के सामने खड़ा, अपने हाथों को देख रहा था। उन पर मेमने के रक्त के छींटे सूखकर भूरे पड़ चुके थे। एक ओर, बलि के लिए लाया गया एक और पशु बेचैन होकर रस्सी खींच रहा था—एक अंधा, लंगड़ा बकरा, जिसके पैर में फोड़ा था और आँखों में सफेद मोतिया।
उसके सामने, वरिष्ठ याजक नतानियाह, जिसकी दाढ़ी में सफेदी बढ़ती जा रही थी, जल्दी-जल्दी में मन्त्र पढ़ रहा था। उसकी आवाज़ में एक थकी हुई, रटी-रटाई लय थी, जैसे पहाड़ी से उतरता पत्थर, बिना किसी उत्साह के। “सर्वशक्तिमान यहोवा का नाम धन्य है,” उसने कहा, पर उसकी आँखें बकरे के उस फोड़े पर टिकी थीं, जिससे पीब टपक रही थी।
“नतानियाह जी,” एलियाकीम ने धीरे से कहा, “यह पशु… क्या यह उचित है? व्यवस्था में तो लिखा है—”
“लिखा बहुत कुछ है, बेटा,” नतानियाह ने एक लम्बी साँस लेते हुए कहा, अपना हाथ उठाकर उसे चुप कराते हुए। “लोग क्या लाएँगे? अकाल के दिन हैं। उनके पास स्वयं खाने को कम है। फिर, परमेश्वर तो दयालु है। वह समझ जाएगा।”
पर एलियाकीम का मन नहीं माना। उसकी स्मृति में उसके बचपन के दिन ताज़ा हो आए, जब उसके पिता, स्वयं एक याजक, भोर से पहले उठकर झुंड में से सबसे निर्दोष, सबसे स्वस्थ मेमने को चुनते थे। उसकी ऊन चमकदार, आँखें साफ हुआ करती थीं। बलि देते समय उनके चेहरे पर एक गम्भीर श्रद्धा होती थी, जैसे वह कोई साधारण कर्म नहीं, बल्कि एक पवित्र सम्पर्क हो।
अब? अब तो बाज़ार में जानवरों के दलाल, मन्दिर के गुप्त समझौतों के तहत, याजकों को सस्ते दामों पर ऐसे ही टूटे-फूटे जानवर बेचते थे। लोग अपनी भेड़-बकरियों के झुंड में से जो बीमार या लँगड़ा होता, उसे ‘यहोवा के नाम’ पर छुटकारा पाने के लिए ले आते। मन्दिर की वेदी, जो एक समय पवित्रता और भय का स्थान हुआ करती थी, अब एक ऐसा स्थान बन गई लगता था जहाँ लोग अपना कचरा फेंक आते थे।
उसी शाम, जब धूप अल्तार पर चढ़ाई जा चुकी थी और धुएँ की गन्ध हवा में तैर रही थी, एलियाकीम अकेला प्रांगण में टहल रहा था। तभी उसे एक कर्कश आवाज़ सुनाई दी। दो किसान, अपने सिर पर कपड़े की गठरियाँ लादे, एक बूढ़े याजक से बहस कर रहे थे।
“लेकिन यह तो अनाज का सबसे सस्ता भाग है! इसमें धूल मिली है, कीड़े हैं!” याजक ने कहा, पर उसकी आवाज़ में आग नहीं थी, बस एक औपचारिक झल्लाहट।
“तो क्या हुआ? आप तो इसे जला ही देंगे न? यहोवा तो सब ग्रहण कर लेता है,” एक किसान ने हँसते हुए कहा। “हमारे पास अपने बच्चों के लिए अच्छा अनाज बचाना है। यह पर्याप्त है।”
और याजक ने झुककर वही अनाज स्वीकार कर लिया। एलियाकीम का हृदय एक भारी पत्थर की तरह डूब गया। उसे याद आया मलाकी की वह वाणी, जो उसने अपने गुरु से सुनी थी: “मैं तुम से प्रेम रखता हूँ, यहोवा का यही वचन है। फिर तुम कहते हो, ‘तू हम से कैसा प्रेम रखता है?’ क्या एसाव याकूब का भाई नहीं था? फिर भी मैंने याकूब से प्रेम किया।”
प्रेम। यही तो बात थी। परमेश्वर का वह प्रेम, जो चुनाव में, वाचा में प्रकट हुआ—उसका उत्तर अब कहाँ था? एक तिरस्कार में बदल गया था। लोग और याजक, परमेश्वर को वह चढ़ावा देते थे जिसे वे स्वयं कुत्ते के सामने भी नहीं डालते। अगर कोई राज्यपाल उनके पास आता, तो क्या वे उसे टूटे फर्नीचर और सड़ा हुआ भोजन देते? नहीं, तो वे सोने-चाँदी और बढ़िया वस्त्र निकाल लाते। फिर उस सर्वशक्तिमान, अदृश्य राजा के लिए, जिसने उन्हें अस्तित्व दिया, उनकी यह हिमाकत?
एलियाकीम ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। उसकी कल्पना में एक दृश्य उभरा: एक महान, ज्वलन्त सिंहासन, और उस पर बैठा हुआ वह जिसका नाम सारी सृष्टि काँपते हुए लेती है। और वहाँ, नीचे, यह मन्दिर, यह राष्ट्र—एक छोटा-सा, धुँधला दीपक जो बुझने को है। उसे लगा जैसे स्वयं आकाश से एक आवाज़ गूँज रही हो: “हे याजकों, जो यहोवा के नाम का तिरस्कार करते हो! तुम कहते हो, ‘हम ने तेरे नाम का कैसा तिरस्कार किया है?’ तुम यह कहकर कि यहोवा की मेज साधारण है, उस पर मलिन वस्तु चढ़ाते हो।”
अगली सुबह, जब बलिदान की तैयारी हो रही थी, एलियाकीम ने एक निर्णय लिया। जब नतानियाह ने एक और लँगड़ी भेड़ को वेदी की ओर खींचा, तो एलियाकीम आगे बढ़ा और उसकी रस्सी थाम ली।
“नहीं,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर दृढ़ थी। “आज नहीं।”
सब की निगाहें उस पर टिक गईं। नतानियाह का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”
“हमारी हिम्मत कैसे हुई?” एलियाकीम ने कहा, और उसकी आँखों में आँसू आ गए। “हम उसकी वेदी पर वह चढ़ा रहे हैं जिसके लिए हम राज्यपाल से कहेंगे कि ‘यह स्वीकार करो और हम पर प्रसन्न हो जा’? क्या वह हम पर प्रसन्न होगा? हम उस सर्वशक्तिमान से झूठ बोल रहे हैं। हम कहते हैं कि उसकी सेवा बोझ है, और फिर टूटे-फूटे को चढ़ाकर साँस छोड़ते हैं। उसका नाम, जो सारे जगत में महान है, हम उसे यहाँ, अपने घर में, कलंकित कर रहे हैं।”
एक गहरी सन्नाटा छा गया। उस पल, मन्दिर के बाहर से, कहीं दूर, एक व्यापारी के कारवाँ की घंटियों की आवाज़ आई। अन्यजातियों के बीच, शायद, परमेश्वर का नाम अधिक महान था। क्योंकि वे तो ईमानदारी से किसी ऐसी शक्ति की पूजा करते थे जिसे वे जानते भी नहीं थे। और यहाँ, जिन्हें ज्ञान दिया गया था, जिनके साथ वाचा बँधी थी, वे सोते जा रहे थे।
कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। एलियाकीम का यह विरोध शायद एक बग़ावत की चिंगारी न बन पाया। नतानियाह ने शायद उसे डाँटा, समझाया कि दुनिया का चलन ऐसा ही है। पर उस दिन के बाद, जब भी कोई याजक बलि के लिए एक दोषपूर्ण पशु लाता, उसकी आँखें अनजाने में एलियाकीम की ओर मुड़ जातीं, जो चुपचाप दूर खड़ा रहता। और शायद, किसी के हृदय में, एक प्रश्न उमड़ता—क्या सच में यहोवा इससे प्रसन्न है? क्या यही वह भय है, वह आदर है, जो उस महान प्रेम का उत्तर होना चाहिए?
शाम के धुएँ ने आकाश को फीका बना दिया। मन्दिर का दरवाज़ा बन्द हुआ। पर एक प्रार्थना, एक पश्चाताप, एक असुविधा—वह हवा में तैरती रही, जैसे किसी महान, दुखी राजा के लिए एक अधूरा, किन्तु सच्चा पत्र, जो अभी तक लिखा जाना बाकी था।




