येरदन नदी के किनारे की हवा में एक अजीब सी गर्मजोशी थी, ऐसी नहीं जो चेहरे को झुलसाए, बल्कि जो दिल के अंदर तक एक उम्मीद की सिहरन पैदा कर दे। जंगली शहद की मीठी गंध हवा में तैर रही थी, और दूर, पथरीले रास्तों से, लोगों के झुंड एक टकटकी लगाए चले आ रहे थे। उनकी निगाहें एक आदमी पर टिकी थीं, जो ऊँट के बालों का एक रुखा सा चोगा पहने, नदी के किनारे खड़ा था। उसकी आवाज़ में एक ऐसी दरार थी जो सीधी आत्मा तक उतर जाती थी – यूहन्ना।
वह पानी और पश्चाताप की बात कर रहा था। “मन फिराओ!” उसकी आवाज़ चट्टानों से टकराकर गूँजती, “क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।” लोग, जिनके चेहरे पर रोजमर्रा की पीड़ा और आशा के धब्बे साफ़ दिख रहे थे, एक के बाद एक पानी में उतरते। यह कोई रस्म नहीं थी, बल्कि एक ज़बरदस्त हिलोर थी, जैसे कोई अंदर की सारी गंदगी, सारे झूठ, इस बहते पानी के साथ बह जाए। कुछ रोते थे, कुछ की आँखों में एक नई चमक होती। यूहन्ना उनसे कहता, “मैं तो जल से तुम्हारा बपतिस्मा देता हूँ, पर मेरे बाद वह आने वाला है जो तुम्हें पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देगा। मैं उसके जूतों का बंधन खोलने के योग्य भी नहीं।”
और फिर एक दिन, वह आया।
वह भीड़ में से कोई खास नहीं लग रहा था। नज़ारथ का एक साधारण बढ़ई, धूल से सने पाँव, चेहरे पर लम्ही सफ़र की थकान। पर यूहन्ना की नज़र उस पर पड़ते ही, जैसे सब कुछ थम गया। उसकी साँसें रुक सी गईं। भीड़ का शोर, पानी का कलरव, सब दूर हो गया। यीशु चुपचाप पानी में उतरा, यूहन्ना की ओर देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी, जैसे समय की शुरुआत का सागर उसमें समाया हो।
“मुझे आपसे बपतिस्मा लेने की आवश्यकता है,” यूहन्ना फुसफुसाया, विचलित होकर, “और आप मेरे पास आते हैं?”
यीशु ने मुस्कुराते हुए, एक कोमल पर दृढ़ स्वर में कहा, “अभी ऐसा ही होने दे; क्योंकि हमें इसी रीति से सभी धार्मिकता को पूरा करना उचित है।”
यूहन्ना ने हिचकिचाते हुए उस पर पानी डाला। और तभी, ऐसा हुआ जैसे आकाश की एक झिलमिली हुई परत फट गई हो। बादल नहीं चीरे गए, बल्कि वह आसमान जो हमेशा सृष्टि और सृष्टिकर्ता के बीच एक पारदर्शी दीवार-सा खड़ा रहता है, वह उस एक पल के लिए गायब हो गया। एक कबूतर, शुद्ध और उज्ज्वल, सीधा नीचे उतरा और यीशु पर ठहर गया। यह कोई पक्षी नहीं था, बल्कि शांति और सामर्थ्य का एक सजीव प्रतीक था। और फिर एक आवाज़, ऐसी आवाज़ जो कानों में नहीं, बल्कि हड्डियों के भीतर, आत्मा की नस-नस में गूँज उठी: “यह मेरा प्यारा पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।”
वह पल टूटा। आकाश फिर से वैसा ही हो गया। पर यूशु के चेहरे पर एक अलौकिक प्रकाश सा छा गया था, जो धीरे-धीरे समा गया। वह चुपचाप नदी से बाहर निकला, और भीड़ को पीछे छोड़ता हुआ, जंगल की गहराइयों की ओर चल पड़ा।
अगले चालीस दिन और चालीस रातें वह जंगल में रहा। यह कोई शांत प्रार्थना नहीं थी। यह एक भयंकर युद्ध था। पत्थरों जैसी भूख ने उसकी पसलियाँ उभार दीं। जंगली जानवर उसके आसपास मंडराते, पर उससे दूर रहते, जैसे उन्हें पता हो कि यह संघर्ष उनसे बड़ा है। और फिर शैतान आया। कोई राक्षसी रूप नहीं, बल्कि एक घातक, तार्किक फुसफुसाहट के रूप में।
“अगर तू परमेश्वर का पुत्र है,” आवाज़ हवा में घुली हुई थी, “तो इन पत्थरों से रोटियाँ बना ले। तेरा पेट तो खाली है।”
यीशु के होंठ सूखे और फटे थे। पास ही एक पत्थर, गेहूँ की एक ढेरी जैसा दिख रहा था। पर उसने कहा, “यह लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, बल्कि हर एक बात से जो परमेश्वर के मुख से निकलती है, जीवित रहेगा।’”
फिर वह आवाज़ उसे यरूशलेम के मंदिर के शिखर पर ले गई, ऊँचाई पर जहाँ नीचे पत्थरों का फर्श बहुत दूर दिख रहा था। “खुद को नीचे गिरा दे,” फुसफुसाहट फिर आई, “क्योंकि लिखा है कि परमेश्वर तेरे लिए अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों पर उठा लेंगे।”
यीशु ने नीचे घूरते हुए, थकी पर अडिग आवाज़ में कहा, “यह भी लिखा है, ‘तू प्रभु, अपने परमेश्वर, को परखने न देना।’”
आखिरी प्रलोभन सबसे शक्तिशाली था। अचानक वह एक ऊँचे पहाड़ पर था, और उसके सामने धरती के सारे राज्य, उनकी शान-शौकत, उनकी ताकत, एक पल में फैली हुई थी। “यह सब कुछ मैं तुझे दे दूंगा,” वह आवाज़ गूँजी, “बस तू एक बार मेरे आगे झुक जा।”
यीशु की आँखों में एक क्षण के लिए दुनिया की सारी भव्यता तैर गई। फिर उसने अपनी नज़रें फेर लीं, और उसकी आवाज़ में एक अंतिम, निर्णायक थकान थी, “हे शैतान, दूर हो! क्योंकि यह लिखा है, ‘तू प्रभु, अपने परमेश्वर, को ही दण्डवत कर, और केवल उसी की उपासना कर।’”
शैतान चला गया। और तभी, जंगल की चुप्पी में, स्वर्गदूत आए और उसकी सेवा करने लगे। एक साधारण भोजन, एक सुखदायी स्पर्श। यीशु ने आखिरकार आराम की साँस ली।
जब वह जंगल से लौटकर गलील आया, तो खबर पहले ही फैल चुकी थी कि यूहन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया है। हेरोदेस के सैनिकों ने उसे उसके सच बोलने के अपराध में पकड़ लिया था। यीशु ने इस खबर को सुना, उसकी आँखों में एक दुखद समझदारी उभरी, और फिर वह समुद्र के किनारे चला गया।
वहाँ, कफरनहूम के पास, दो भाई, शमौन और उसका भाई अंद्रियास, जाल डाल रहे थे। उनके हाथ मछली के छींटों और जाल के रस्सों से चिपचिपे थे। यीशु ने उनकी ओर देखा, और उसकी आवाज़ में वही अधिकार था जो यूहन्ना ने नदी के किनारे महसूस किया था, पर उसमें एक आकर्षण भी था, एक ऐसा बुलावा जिसे नकार पाना मुश्किल था।
“मेरे पीछे चले आओ,” उसने कहा, “और मैं तुम्हें मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊँगा।”
शमौन ने अपने भाई की ओर देखा। उनकी आँखों में एक सवाल था – यह कौन है? पर कुछ था, शायद उस आवाज़ में, या उस टकटकी में, जिसने उनके दिल की गहराई में जवाब दे दिया। उन्होंने अपने जाल, अपनी नाव, वो सब कुछ वहीं छोड़ दिया। बस ऐसे, बिना एक शब्द कहे। और वे उसके पीछे हो लिए।
थोड़ा और आगे चलकर, उसने जब्दी के बेटों, याकूब और यूहन्ना को अपने पिता की नाव में जाल सुधारते देखा। वे मजदूर थे, पेशेवर। यीशु ने उन्हें भी उसी तरह पुकारा। और हैरानी की बात यह कि वे भी उठे, अपने पिता और मजदूरों को नाव में छोड़कर, उसके पीछे चल पड़े।
अब वह चार हो चुके थे। वे कफरनहूम की ओर बढ़ रहे थे, और सब्त का दिन था। यीशु सीधे आराधनालय में गया, और वहाँ उपदेश देने लगा। लोग दंग रह गए। वे धर्मशास्त्रियों की रटी-रटाई, सूखी शिक्षाओं के आदी थे। पर यह आदमी ऐसे बोल रहा था जै




