पवित्र बाइबल

अवियाह और अनंत याजक

शाम ढल रही थी। यरूशलेम के बाहर, एक पहाड़ी की तलहटी में स्थित एक छोटी सी कुटिया के सामने, अवियाह नाम का एक बूढ़ा व्यक्ति लकड़ी के एक स्टूल पर बैठा हुआ था। उसकी आँखें पश्चिम की ओर थीं, जहाँ सूरज सोने और लाल रंग के बादलों के पीछे डूब रहा था। उसकी गोद में एक पुराना, हाथ से लिखा हुआ चर्मपत्र था। वह इब्रानियों की उस पत्री के अध्यायों को पढ़ रहा था जो उसे रोम से उसके भतीजे ने भेजी थी। पाँचवाँ अध्याय। उसके होंठ धीरे-धीरे शब्दों को दोहरा रहे थे, “हर एक महायाजक… लोगों में से नियुक्त किया जाता है…”

उसकी याददाश्त ताजा हो उठी। वह स्वयं लेवीय गोत्र से था, भले ही अब याजकीय सेवा नहीं रह गई थी। उसके पिता और दादा, मंदिर की सेवा के दिनों के बारे में बातें किया करते थे। वह खुद भी, एक बालक के रूप में, महायाजक को धूप चढ़ाते, प्रायश्चित के दिन के अनुष्ठान करते देख चुका था। वह जानता था कि एक महायाजक का पद कितना पवित्र, कितना दायित्वपूर्ण, और कितना मानवीय होता था। वह “लोगों की ओर से परमेश्वर के सामने बातें करने” के अर्थ को समझता था।

“वह उन अज्ञानियों और भटकने वालों के लिए कोमलता से पेश आ सकता है, क्योंकि वह स्वयं निर्बलताओं से घिरा रहता है,” अवियाह ने फुसफुसाते हुए पढ़ा। उसकी आँखें नम हो आईं। कितनी सच्चाई थी इन शब्दों में। उसे याद आया कैसे उसके अपने दादा, एक याजक होते हुए भी, अपनी कमजोरियों के बारे में बात करते थे – धैर्य की कमी, क्रोध का एक क्षण, ईश्वर के सामने अपराध बोध। वे पूर्ण नहीं थे। वे चुने हुए थे, परन्तु गड़े हुए मिट्टी के बरतन की तरह।

और फिर पत्री ने एक नाम लिया – हारून। पहला महायाजक। अवियाह ने आँखें बंद कर लीं और कल्पना की एक युवा हारून की, मूसा के साथ खड़ा, फिरौन के सामने। वह हारून जिसकी वाणी में ईश्वरीय शक्ति थी, पर जिसके हाथों ने सोने का बछड़ा बनाया। वह हारून जो मिलाप वाले तम्बू में सेवा करता, भय और कंपकंपी के साथ, यह जानते हुए कि वह स्वयं भी पापी है। यही तो नियुक्ति का रहस्य था। परमेश्वर निर्बल मनुष्यों को चुनता था, ताकि वे निर्बलों के प्रति करुणा रख सकें।

रात का अंधेरा घिरने लगा। अवियाह ने अंदर जाकर एक दिया जलाया। मंद पीली रोशनी में चर्मपत्र के शब्द और भी गहरे लग रहे थे। वह आगे पढ़ता गया, और उसका दिल एक नाम सुनकर धड़क उठा – मसीह। पत्री कहती थी कि मसीह ने भी स्वयं को महायाजक के रूप में नहीं ग्रहण किया। नहीं। वह एक और, ऊँचे क्रम का था – मलिकिसेदक के रूप में।

अवियाह ने सिर उठाया। मलिकिसेदक। यरूशलेम का राजा, धर्म का राजा। जिसका कोई आदि न था, अंत न था। जो इब्राहीम से मिला था और उसे आशीर्वाद दिया था। एक रहस्यमय व्यक्तित्व। और पत्री कह रही थी कि मसीह उसी की रीति पर महायाजक बना।

कितना विचित्र, कितना गहरा सत्य। हारून का याजकत्व वंश परम्परा से चलता था – जन्म से। पर मलिकिसेदक का याजकत्व? वह जीवन की शक्ति से, एक अटूट जीवन से। अवियाह को समझ आने लगा। मसीह का याजकत्व मानवीय व्यवस्था से ऊपर था। वह नश्वर पुरुषों की तरह पापबलि चढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को एक सिद्ध बलिदान के रूप में अर्पित करने के लिए आया था।

पत्री के शब्द उसके मन में गूँजने लगे, “उसने… महान क्लेश के दिनों में अपनी प्रार्थनाओं और विनतियों को ऊँचे स्वर से रोते-पीटते उससे जो उसे मृत्यु से बचा सकता था, मनवाईं, और उसकी श्रद्धा के कारण उसकी सुनी गई।”

अवियाह ने साँस रोक ली। उसे गतसमनी की वह रात याद आई, जिसके बारे में शिष्य बताया करते थे। यीशु, जो मसीह था, पसीने की बूँदों के रूप में लहू बहाते हुए, धरती पर गिरकर प्रार्थना कर रहा था। “हे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझसे टल जाए।” कितनी गहरी पीड़ा, कितनी सच्ची मानवीय घबराहट। यही तो था वह “आज्ञाकारिता सीखना” जिसकी बात पत्री कर रही थी। पुत्र होकर भी, उसने दुखों में आज्ञा माननी सीखी। उसने अपनी इच्छा पिता की इच्छा के आगे झुका दी।

और फिर, क्रूस। वह भीषण, अपमानजनक क्रूस। अवियाह की आँखों के सामने एक दृश्य उभर आया – यीशु, नग्न और घायल, लकड़ी पर कीलों से जड़ा हुआ। यही था उसकी महायाजकीय सेवा का चरमबिंदु। हारून जैसा याजक मंदिर में बलि चढ़ाता, पर यह याजक स्वयं बलि बन गया। उसने अपना लहू, अपनी जान, एक ही बार में, सदा के लिए परमेश्वर के सामने रख दिया। यह बलिदान इतना परिपूर्ण था कि उसे दोहराने की आवश्यकता ही न रही।

रात गहरा चुकी थी। दिये की लौ टिमटिमा रही थी। अवियाह ने चर्मपत्र को सावधानी से लपेटा। उसका मन अद्भुत शांति से भर गया था। इब्रानियों का यह लेखक, शायद पौलुस, या कोई और, उसके हृदय की गहराई तक पहुँच गया था।

वह बूढ़ा यहूदी, अपनी परम्परा में पला-बढ़ा, आज एक नये सत्य को नहीं, बल्कि पुराने सत्य की पूर्णता को देख रहा था। हारून का याजकत्व एक छाया थी, एक प्रतिबिंब। मलिकिसेदक का याजकत्व एक प्रतिज्ञा थी। और यीशु मसीह – वह साक्षात सत्य था। वह वह महायाजक था जिसकी प्रतीक्षा थी। जो हमारी निर्बलताओं में हमसे सहानुभूति रख सकता था, क्योंकि उसने स्वयं मानव दुख झेला था, पर वह पाप से सर्वथा मुक्त था। जिसने आज्ञाकारिता के मार्ग से होकर, पूर्णता प्राप्त की और हम सब के लिए अनन्त छुटकारे का स्रोत बन गया।

अवियाह ने दिया बुझाया और खिड़की की ओर देखा। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उसे लगा जैसे वे साक्षी हैं – उस पुराने याजकत्व की, जो अब समाप्त हो चुका था, और उस नये, जीवित याजकत्व की, जो सदा के लिए बना रहने वाला था। एक ऐसा महायाजक जो कभी नहीं मरता, जो सर्वदा जीवित है ताकि हमारी ओर से विनती कर सके।

उसने मन ही मन एक प्रार्थना कही, उसी महायाजक के नाम पर, जिसने स्वर्ग में प्रवेश करके, हमारे लिए मार्ग खोल दिया था। और उस रात, उस बूढ़े अवियाह की नींद में, कोई डर नहीं था, केवल एक गहरा, अवर्णनीय विश्वास था कि उसकी विनती, उसकी निर्बलताएँ, उसकी आशाएँ, एक ऐसे महायाजक के हाथों में हैं जो समझता है, और जिसके पास अनन्त महिमा है।

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