पवित्र बाइबल

लंगड़े का चमत्कारिक उपचार

यरूशलेम की सुबह धीरे-धीरे खुल रही थी। मन्दिर की ओर जाने वाली सँकरी गलियों में लोगों का हलचल भरा शोर पहले ही गूँजने लगा था। पतरस और यूहन्ना, दोनों उसी भीड़ में शामिल थे, जैसे हर रोज़ होता था। वे ‘सुंदर’ कहलाने वाले फाटक के पास से गुज़रे, जहाँ हमेशा की तरह एक लंगड़ा आदमी बैठा भीख माँग रहा था। उसकी नज़रें उम्मीद से भरी थीं, पर शायद सिक्कों के लिए। पतरस ने अचानक रुककर उसकी ओर देखा। “हमारे पास सोना-चाँदी तो नहीं,” उन्होंने कहा, आवाज़ में एक अजीब सा दृढ़ विश्वास था, “पर जो हमारे पास है, वही तुझे देते हैं। यीशु मसीह नाज़री के नाम पर, उठ और चल।”

यह कोई जादू की मंत्र-तंत्र नहीं था। एक साधारण सा आदेश, पर उसमें एक ऐसी ताकत भरी हुई थी जो देखने वालों की साँसें रोक दे। और वह आदमी, जिसके पैर जन्म से ही बेकार थे, उठ खड़ा हुआ। उछलता-कूदता हुआ, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ। भीड़ स्तब्ध थी। आश्चर्य, खुशी, और कुछ लोगों के चेहरों पर एक सनसनीखेज डर।

यही डर शायद उन धर्मगुरुओं तक पहुँच गया, जो सदूकी पंथ के थे। वे इस तरह की ‘परेशान करने वाली’ बातों से बहुत खुश नहीं थे। मुर्दों के जी उठने की बात करने वाले ये गली-मुहल्ले के अनपढ़ लोग उनकी स्थापित व्यवस्था के लिए खतरा थे। सो, पतरस और यूहन्ना को पकड़ लिया गया। अगली सुबह तक उन्हें कैद में रखा गया।

सुबह हुई तो वे सन्हेद्रिन के सामने पेश हुए – महायाजक, बुज़ुर्ग, शास्त्री। वह कमरा ऊँची छत वाला, पत्थरों से ठंडा, गंभीरता से भरा हुआ था। बीच में खड़े थे दो मछुआरे, जिनके हाथ मछली पकड़ने वाले जाल से पटे हुए थे, चेहरे पर कोई विशेष हाव-भाव नहीं। “तुमने किस सामर्थ्य से, किस नाम से यह काम किया?” महायाजक का सवाल कमरे में गूँजा।

पतरस ने सीधे उत्तर देने के बजाय, एक गहरी साँस ली। उनकी आवाज़ अब वह नहीं थी जो कई हफ्ते पहले तक डर के मारे काँपती थी। “हे इस्राएल के हाकिमों,” उन्होंने कहा, “अगर आज हमसे उस कृपा के विषय में पूछा जा रहा है जिससे एक लंगड़ा चंगा किया गया, तो जान लो कि वह यीशु मसीह नाज़री के नाम से हुआ है… जिसे तुमने क्रूस पर चढ़ाया, और जिसे परमेश्वर ने मुर्दों में से जिलाया। उसी के नाम से यह आदमी तुम्हारे सामने पूरी तरह चंगा खड़ा है।”

कमरे में सन्नाटा पसर गया। ये लोग ‘अनपढ़ और साधारण’ कहलाते थे, पर उनके जवाब में एक ऐसी धार थी जो शास्त्रों की गहरी समझ दिखाती थी। वे यीशु के साथ रह चुके थे, यह साफ़ झलक रहा था। सन्हेद्रिन के सदस्य अलग-अलग कोने में फुसफुसाने लगे। “इनसे क्या करें? यरूशलेम के सभी लोग जानते हैं कि यह आश्चर्यकर्म हुआ है। इनकार नहीं किया जा सकता।” अंत में, उन्हें धमकी देकर छोड़ने का फैसला हुआ – “किसी को भी इस नाम से उपदेश नहीं देना, न ही शिक्षा देना।”

पतरस और यूहन्ना का जवाब सीधा और स्पष्ट था। “सुनो, परमेश्वर की नज़र में, तुम्हारी सुनना ज़्यादा ज़रूरी है या परमेश्वर की? हम जो देख चुके हैं, जो सुन चुके हैं, उसे बताए बिना नहीं रह सकते।”

उन्हें छोड़ दिया गया। धमकियाँ देकर। वे दोनों अपने लोगों के पास लौटे, जो एक साधारण से घर में इकट्ठा हुए थे। बाहर का खतरा मंडरा रहा था, पर भीतर एक अजीब सी शांति थी। सबने मिलकर परमेश्वर से प्रार्थना की। कोई भव्य शब्द नहीं, कोई लम्बी-चौड़ी याचना नहीं। बस एक साधारण सा निवेदन – “स्वामी, धमकियों को देख। और हमें, तेरे दासों को, तेरा वचन पूरे साहस से सुनाने का अवसर दे। तू हाथ बढ़ाकर चंगाई करे, और चिन्ह और अद्भुत काम उस पवित्र सेवक यीशु के नाम से होते रहें।”

जैसे ही प्रार्थना खत्म हुई, वह जगह काँप उठी। सचमुच का कंपन। और हर एक व्यक्ति पवित्र आत्मा से भर गया। डर नहीं, एक नई हिम्मत से। वे जो कुछ भी थे, जैसे भी थे, एक दिल और एक जान होकर रह गए। कोई अपनी कोई चीज़ अपनी नहीं कहता था। जिसके पास ज़मीन या मकान था, वह बेचकर लाता और पैसे प्रेरितों के चरणों में रख देता। यह कोई बाध्यता नहीं थी, बल्कि अनुग्रह का एक स्वाभाविक उमड़ाव था। और उनमें से किसी में भी कमी नहीं थी।

यूसुफ, जिसे प्रेरितों ने बरनबस यानी ‘शान्ति के पुत्र’ का नाम दिया, एक लेवी व्यक्ति था। उसने अपना खेत बेचा और सब कुछ लाकर रख दिया। ऐसे ही और भी लोग थे। यह समाज नहीं था, यह एक परिवार था। जिसकी नींव प्रार्थना और एक-दूसरे की चिंता पर टिकी थी। और उस चेले यूहन्ना की पुस्तक में लिखी बात चरितार्थ हो रही थी – “हम प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि उसने पहले हमसे प्रेम किया।”

बाहर यरूशलेम में सन्हेद्रिन की धमकियाँ शायद अब भी मौजूद थीं। पर उस छोटे से घर के भीतर, जहाँ रोटी तोड़ी जाती थी और प्रार्थना की जाती थी, वहाँ एक ऐसी सामर्थ्य थी जो दुनिया की किसी भी ताकत से बड़ी थी। और वह सामर्थ्य उसी नाम में थी, जिसे चुप कराने की सारी कोशिशें नाकाम होने वाली थीं।

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