पवित्र बाइबल

विद्या और अटूट प्रेम

(यह कहानी एक काल्पनिक पात्र, विद्या, के जीवन के माध्यम से रोमियों 8 के सत्य को दर्शाती है। यह एक मानव रचना है, जो स्वाभाविक लय और अधूरेपन के साथ लिखी गई है।)

सुबह की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, पर विद्या को उसका एहसास तक नहीं था। उसकी आँखें टूटी हुई चारपाई के पाये पर टिकी थीं। डॉक्टर की रिपोर्ट वाला कागज़ अभी भी उसकी जेब में महसूस हो रहा था, एक जलते हुए कोयले की तरह। “लाइलाज” शब्द उसके दिमाग में गूँज रहा था, बार-बार, एक ऐसी घंटी की तरह जो बजना बंद ही नहीं करती। रसोई से आवाज़ आई – उसकी माँ बर्तन सजा रही थीं। एक सामान्य दिन की शुरुआत। पर विद्या के लिए सब कुछ अब सामान्य से अलग था। उसका शरीर, जो कल तक उसका अपना था, अब एक विदेशी भूमि लग रहा था, जहाँ विद्रोह हो रहा था। कोशिकाएँ उसके विरुद्ध षड्यंत्र रच रही थीं।

वह उठी और छोटे से आँगन में निकल आई। नीम का पेड़ हरा-भरा खड़ा था, उसकी पत्तियाँ हल्की हवा में काँप रही थीं। प्रकृति तो शांत थी, पर उसके भीतर एक तूफान था। डर, गुस्सा, एक तीखी निराशा। “क्यों?” यह सवाल उसके होठों तक नहीं आया, बस दिल में ही घूमता रहा। वह प्रार्थना करना चाहती थी, पर शब्द नहीं थे। सिर्फ एक कराह थी, एक भारी सिसकी जो उसकी आत्मा की गहराई से उठ रही थी।

तभी, बिना किसी खास वजह के, उसके बचपन की एक बात याद आ गई। दादी की आवाज़, धुँधली सी, कानों में गूँज उठी। “बेटा, परमेश्वर की आत्मा हमारी आत्मा के साथ मिलकर गवाही देती है कि हम उसके संतान हैं।” वह कहाँ पढ़ी थी यह बात? शायद रोमियों की कोई चिट्ठी। उस समय इसे सुनकर उसे एक अजीब सी शांति मिली थी, जैसे कोई दूर का, परिचित सा संगीत। अब, इस निराशा के बीच, वही शब्द वापस लौट आए।

वह अंदर गई और धूल भरी अलमारी में से बाइबल ढूँढ़ निकाली। पन्ने पलटते हुए उसने रोमियों 8 पाया। शब्द उसकी आँखों के सामने से गुज़रने लगे। “इसलिए अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” उसने पढ़ा। दण्ड। उसे लगा जैसे कोई भारी पत्थर उसके सीने से हट गया हो। यह बीमारी, यह दुःख – क्या यह परमेश्वर का दण्ड नहीं था? शब्द साफ कह रहे थे – नहीं। फिर आगे… “क्योंकि व्यवस्था की आत्मा ने जो जीवन दिया है, उसने मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया है।” मृत्यु की व्यवस्था। यही तो थी – शरीर की नाशमानता, क्षय। पर आत्मा का जीवन? वह अलग बात थी।

वह धीरे-धीरे पढ़ती गई। एक वाक्य ने उसे रोक दिया। “और न केवल यह, पर वरन् हम भी जो आत्मा की पहली प्राप्ति रखते हैं, हम भी अपने अन्दर कराहते हैं, और उस गोद लिये जाने की प्रतीक्षा में हैं, जिससे हमारे शरीर का छुटकारा हो।” कराह… यह शब्द उसकी अपनी कराह से कितना मिलता-जुलता था। पर यहाँ कराह अकेलेपन की नहीं थी। यह आत्मा की कराह थी, जो उसकी अपनी कराह में सम्मिलित हो रही थी। एक साझेदारी। जैसे कोई दोस्त चुपचाप बैठकर तुम्हारे दुःख को बाँट ले।

पूरा दिन वह इसी खोज में बीत गया। वह बगीचे में टहलती, फिर लौटकर उन शब्दों को फिर पढ़ती। “उसी आत्मा के सहारे हम पुकारते हैं, ‘हे अब्बा, हे पिता।'” अब्बा। बच्चों की वह सहज, भरोसेमंद पुकार। क्या वह, इस हालत में भी, ऐसे पुकार सकती थी? उसने कोशिश की। आँखें बंद करके, टूटी हुई सी आवाज़ में बस इतना कहा, “अब्बा।” कुछ नहीं हुआ। कोई आकाशीय आवाज़ नहीं आई, कोई चमत्कार नहीं हुआ। पर एक अजीब सी गर्माहट, जैसे कोई हाथ उसके सिर पर रख दिया गया हो, उसने महसूस की। वह रो पड़ी। लम्बे, चुपचाप, सालों के जमे हुए दुःख को बहा देने वाले आँसू।

दिन बीतते गए। बीमारी नहीं गई। दर्द कम नहीं हुआ। पर कुछ बदल गया था। पहले वह अपने शरीर के खिलाफ लड़ रही थी, उससे नफरत कर रही थी। अब वह समझने लगी कि यह शरीर “व्यर्थता के अधीन” है, जैसे पत्री में लिखा था। यह नश्वर था, टूटने के लिए बना था। पर उसके भीतर जो जीवन था, वह आत्मा का था, और वह अविनाशी था। यह विश्वास उसे डॉक्टर के चैम्बर में भी शांत रखता। जब डॉक्टर निराशा भरी बातें कहते, तो उसके मन में एक छंद गूँज उठता – “यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन है?”

एक शाम, जब दर्द विशेष रूप से तीव्र था, वह अपनी डायरी लिख रही थी। उसने लिखा, “आज फिर वही भय लौट आया। कल का भविष्य अन्धकारमय लगता है।” फिर उसकी नज़र बाइबल पर पड़ी, जो खुली पड़ी थी। अंतिम पंक्तियाँ उसे दिखीं। “क्योंकि मुझे निश्चय है, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्ग के दूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग कर सकेगी, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है।”

उसने अपनी डायरी बंद कर दी। बाहर बारिश होने लगी थी। पहली बूँदों की आवाज़ छत पर पड़ रही थी। उसने खिड़की खोल दी। ठंडी, ताज़ा हवा ने कमरे को भर दिया। मृत्यु नहीं, जीवन नहीं, न ही वर्तमान का यह दुःख, न भविष्य का भय – कुछ भी उस प्रेम से अलग नहीं कर सकता था। यह जानना चमत्कार नहीं था, यह एक गहरा, दृढ़ निश्चय था, जो उसकी हड्डियों में उतर गया था।

विद्या की कहानी का अंत नहीं हुआ। बीमारी रही। संघर्ष रहा। पर उसके भीतर एक और कहानी भी चल रही थी – आत्मा की कहानी, जो कराहती हुई भी आशा करती है, जो दुःख में भी “अब्बा” पुकारती है, और जो इस निश्चय में जीती है कि कोई भी चीज़ उसे उस अनंत प्रेम से अलग नहीं कर सकती, जिसकी जड़ें मसीह में हैं। और कभी-कभी, जब सुबह की किरण उसके कमरे में आती, तो वह उस प्रेम की एक मृदु झलक महसूस कर पाती, जो सब कुछ सह लेता है, और सब में बना रहता है।

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