पवित्र बाइबल

दो रास्ते, दो जीवन

उस गाँव में दो रास्ते थे। एक ऊँचाई पर, पुराने बरगद के पेड़ के पास से होकर जाता था, जहाँ धूप छनकर आती थी। दूसरा निचली घाटी में, नाले के किनारे-किनारे। उन रास्तों की तरह ही दो जीवन चलते थे वहाँ – केशव का और दीनानाथ का।

केशव के हाथ सदा मिट्टी से सने रहते। सुबह पहली रोशनी से पहले ही वह अपने खेत की मेड़ पर बैठा रहता, जैसे जमीन से कोई बात कर रहा हो। उसकी पत्नी गीता, चूल्हे की लौ से चेहरा रोशन करती, दोनों लड़कों को जगाती। “जागो, सूरज तुमसे पहले उठ गया तो शर्मिंदा रह जाओगे,” कहती। वह बात नहीं बनाती थी। सच में, केशव का परिवार सूरज से पहले जागता, और सूरज डूबने के बाद भी काम में लगा रहता। उनकी मेहनत चुपचाप बोली जाती थी – फसल के हरे-हरे खेतों में, घर की मजबूत दीवारों में, बच्चों की किताबों में जो स्कूल के बाद भी खुली रहतीं।

दीनानाथ का घर गाँव के बीच में था, दो मंजिला, पक्का। उसकी दुकान पर हमेशा भीड़ रहती – नमक, तेल, कपड़ा, सब कुछ। पर दीनानाथ की बातें उसके सामान से भी तेज बिकतीं। वह हर किसी के कान में कुछ न कुछ फुसफुसाता रहता। “सुना है केशव की फसल खराब होगी इस बार… मैंने तो बाजार का भाव पहले ही भाँप लिया था…” उसकी जुबान चलती रहती, जैसे पत्थर से पानी टपकता है – लगातार, और धीरे-धीरे खोखला कर देता है।

एक बार जब सूखा पड़ा, तो केशव ने अपने कुएँ का पानी पहले पड़ोसियों के खेतों में दिया। गीता ने रसोई से निकलकर सबको थोड़ा-थोड़ा आटा दिया। “हमारे पास जो है, उसमें से कुछ बाँट देने से घटता नहीं, बढ़ता है,” वह मुस्कुराती हुई कहती। उसका हाथ देते समय कभी नहीं काँपता था।

दीनानाथ ने उसी सूखे में पुराने अनाज को ऊँचे दाम पर बेचा। रात में उसके घर से पैसों की खनखनाहट की आवाज आती, पर दिन में वह मुँह फुलाए रहता। “दुनिया में कोई किसी का नहीं होता,” वह अपने बेटे को समझाता। पर उसका बेटा, रमेश, उन बातों को सुनकर चुपचाप बाहर चला जाता, नाले के किनारे वाले रास्ते पर टहलने लगता।

समय बीतता गया। केशव के लड़के पढ़-लिखकर शहर गए, पर हर महीने एक चिट्ठी जरूर आती – पिता को प्रणाम, माँ को पैर छूकर आशीर्वाद माँगने को कहते। घर खाली था, पर उनकी खुशबू से भरा हुआ। बुढ़ापे में केशव और गीता बरगद के नीचे बैठते, गाँव के बच्चों को पुरानी कहानियाँ सुनाते। उनकी बातों में मिठास थी, जैसे पके हुए फल में।

दीनानाथ का घर शोर से भरा रहता – रेडियो की आवाज, झगड़े की आवाज, गाड़ी के हॉर्न की आवाज। पर उसमें एक खालीपन था, जैसे अनाज का भरा हुआ बोरा जिसके अंदर की चीज सड़ गई हो। रमेश ने पिता की दुकान संभाली, पर उसकी बदनामी भी विरासत में मिली। लोग उस पर भी भरोसा नहीं करते थे। दीनानाथ अब अकेला पड़ गया था। उसकी जुबान अब भी चलती थी, पर सुनने वाला कोई नहीं था। उसकी बातें, बिना किसी सत्य के, हवा में विलीन हो जातीं।

एक बार जब भीषण बारिश हुई, तो निचला रास्ता पूरी तरह बह गया। नाले ने अपना रास्ता बदल लिया था। ऊँचा रास्ता, बरगद की जड़ों से मजबूती से बँधा हुआ, सुरक्षित था। गाँव वाले उसी रास्ते से आने-जाने लगे।

केशव एक शाम को बरगद के नीचे बैठा था। गीता ने उसके लिए एक कटोरी दही लाकर रखी। उसने देखा कि दीनानाथ का बेटा, रमेश, दूर से आ रहा है। वह झिझक रहा था। केशव ने उसे आवाज दी। “आ जा बेटा, बैठ जा।”

रमेश ने आकर चुपचाप दही का कटोरा लिया। उसकी आँखें नम थीं। उसने एक शब्द नहीं कहा, पर उसकी चुप्पी उस दिन बहुत कुछ कह गई। केशव ने उसके सिर पर हाथ रखा। सूरज डूब रहा था, और ऊँचे रास्ते पर आखिरी किरणें चल रही थीं, जैसे स्वर्णिम मार्ग दिखा रही हों। मेहनत के हाथ कभी खाली नहीं जाते। सच्चाई की जड़ें तूफान में भी टिकी रहती हैं। और जिसकी जुबान पर नियंत्रण हो, उसका जीवन भी संयम से भरा होता है। ये बातें पत्थर पर लिखे अक्षरों की तरह नहीं, बल्कि जीवित मिट्टी की सुगंध की तरह थीं – हल्की, पर हमेशा रहने वाली।

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