वह दिन ठीक वैसा ही था, जैसे रामकिशोर को पसंद था। सुबह की धूप अभी पूरी तरह से कटी हुई फसल के ठूंठों पर नहीं खेल रही थी, बस एक हल्की सुनहरी चादर बिछा रही थी। हवा में उस तेज़ गंध की जगह, जो बरसात के बाद उठती है, मिट्टी की एक हल्की सौंधी खुशबू थी। वह अपनी कुटिया के सामने बने चबूतरे पर बैठा, लकड़ी के एक पुराने स्टूल पर, और अपनी चाय की प्याली को दोनों हाथों में थामे हुए था। उम्र के साथ उसकी उंगलियों के जोड़ थोड़े मोटे हो गए थे, पर चाय की गर्माहट उन्हें सुकून दे रही थी।
रामकिशोर ने आज से कोई पचास बरस पहले, जब वह जवान था, यही ज़मीन अपने पिता से विरासत में पाई थी। तब से लेकर आज तक, हर साल की यही कहानी थी। बीज बोना, बारिश का इंतज़ार करना, फिर कटाई। पर आज सुबह-सुबह, उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। आसमान साफ़ था, पर पश्चिम में बादलों की एक पतली, धुंधली पट्टी दिख रही थी। मौसम का पता कभी नहीं चलता। कल तक तेज़ धूप निकल सकती थी, और अगले ही पल बादल छा सकते थे।
उसे याद आया कि कैसे उसके पिता, जिनकी स्मृतियाँ अब धुँधली सी हो गई थीं, अक्सर कहा करते थे, “अपना रोटी पानी का सामान जल्दी भेज दे, क्योंकि बहुत दिनों के बाद तू नहीं जानता कि क्या अनहोनी होनेवाली है।” वह मुस्कुराया। उस समय ये बातें बड़ी अटपटी लगती थीं। जवानी में तो लगता था कि सब कुछ पक्का है, निश्चित है। पर अब… अब वह समझता था। जीवन ठीक उसी नदी की तरह था जो उसके खेतों के पूर्वी किनारे से बहती थी – कभी शांत, कभी उफान पर, और उसका रास्ता कभी सीधा नहीं होता।
उसने चाय का आखिरी घूँट पिया और उठ खड़ा हुआ। आज उसके लिए एक निर्णय का दिन था। पिछली फसल से बचे कुछ बीज अभी भी कोठार में पड़े थे। अगले मौसम की तैयारी के लिए ज़मीन तैयार करनी थी। पर क्या करे? बादलों की उस पट्टी को देखकर लगता था कि शायद जल्दी ही बरसात हो जाए। अगर वह आज बीज बो दे, और कल तेज़ धूप निकल आए, तो बीज बर्बाद। अगर न बोए, और बरसात हो जाए, तो यह अच्छा मौसम हाथ से निकल जाएगा।
वह कोठार की ओर चल पड़ा। लकड़ी के पुराने दरवाज़े को खोलते हुए उसकी चरचराहट ने सन्नाटे को तोड़ दिया। अंदर की ठंडी हवा में सूखी मिट्टी और अनाज की गंध थी। उसने बोरियों को टटोला। फिर उसने सोचा – क्यों न वह आधी ज़मीन में आज ही बीज बो दे, और आधी के लिए इंतज़ार करे? पर यह विचार आते ही उसे अटपटा लगा। ऐसा करने से क्या फायदा? या तो पूरी शक्ति से एक काम करो, या फिर न करो।
दोपहर तक, रामकिशोर ने फैसला कर लिया। उसने अपने दोनों बैलों को हल के साथ जोता, और खेत की ओर चल पड़ा। हल की नोक जैसे ही सख्त ज़मीन में धँसी, एक नई गंध हवा में फैल गई। वह धीरे-धीरे, एक लकीर खींचता गया। पसीना उसकी पीठ पर बहने लगा, पर उसे एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। उसने सोचा, “तेरे हाथ में जो काम पड़े, उसे पूरी शक्ति से कर, क्योंकि अधेर में, कब्र में, जहाँ तू जानेवाला है, न काम है, न युक्ति, न ज्ञान, और न बुद्धि।”
शाम ढलते-ढलते, वह थका हुआ लेकिन संतुष्ट वापस लौटा। आधा खेत तैयार हो चुका था। अगले दिन सुबह, जब वह उठा, तो आसमान बिल्कुल साफ़ था। कोई बादल नहीं। उसका दिल एक पल को भारी हुआ। शायद उसने गलती की। पर वह फिर कोठार से बीज ले आया, और बिना किसी हिचकिचाहट के, उन्हें तैयार की हुई भूमि में बोने लगा। हर एक बीज को वह एक प्रार्थना की तरह भूमि में सौंपता गया।
दिन बीतते गए। बारिश नहीं हुई। रामकिशोर देखता रहा। कभी पूर्वी दिशा से बादल उठते, तो कभी पश्चिम से हवा चलती, पर बूंद नहीं गिरती। उसके पड़ोसी, मोहन, जो उससे कम उम्र का था, अक्सर आकर कहता, “काका, इतनी मेहनत की, और सब सूखे में। अगले साल देखेंगे।”
रामकिशोर मुस्कुरा देता। “कौन जानता है, बेटा,” वह कहता। “हवा किधर चल रही है, और गर्भवती स्त्री की कोख में हड्डियाँ कैसे बढ़ती हैं, यह तू नहीं जानता। उसी प्रकार परमेश्वर के काम को भी तू नहीं जानता, जो सब कुछ बनाता है।”
और फिर एक दिन, लगभग तीन सप्ताह बाद, ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। दोपहर के समय, अचानक आसमान में बादल छा गए। कोई साधारण बादल नहीं, बल्कि गहरे, भारी और फैले हुए। और फिर बारिश शुरू हुई। यह कोई तेज़, उगलती हुई बारिश नहीं थी, बल्कि एक कोमल, लगातार गिरने वाली फुहार थी, जो धरती के अंदर तक समा गई। यह पूरे तीन दिन और तीन रात तक चली।
जब बारिश रुकी और सूरज निकला, तो रामकिशोर का खेत एक नए जीवन से भरा हुआ था। उसके बोए हुए बीज, जो शायद सूखे में ही मर जाते, उस कोमल नमी ने उन्हें जीवित रखा था। और अब नन्हीं-नन्हीं हरी पत्तियाँ ज़मीन से फूट रही थीं, ऐसे जैसे कोई हँसी फूट पड़ी हो।
उस साल रामकिशोर की फसल बहुत अच्छी हुई। और उसने एक और काम किया। जब अनाज कटकर कोठार में आ गया, तो उसने उसमें से एक अच्छा भाग अलग कर लिया। उसने मोहन को बुलाया, जिसकी फसल उस साल अच्छी नहीं हुई थी क्योंकि उसने बीज बोने में देर कर दी थी। रामकिशोर ने उसे अनाज से भरी एक बोरी दी। “ले जाओ, बेटा,” उसने कहा। “सुबह को बोया, और सांझ को खाली न कर, क्योंकि तू नहीं जानता कि इनमें से कौन सा भला होगा।”
मोहन की आँखों में आँसू आ गए। वह कुछ बोल नहीं पाया। उस दिन शाम को, रामकिशोर अपने चबूतरे पर बैठा था। आसमान में तारे निकल आए थे। उसे लगा जैसे वह पूरी सृष्टि का एक छोटा सा, पर ज़रूरी हिस्सा है। जीवन का हर पल एक उपहार था, हर सुबह एक नया अवसर, हर शाम एक आशीर्वाद। चाहे हवा चले या बारिश हो, चाहे धूप हो या अँधेरा, सब कुछ एक ही सृष्टिकर्ता के हाथ में था। और उस हाथ में विश्वास रखते हुए, बिना यह जाने कि कल क्या होगा, आज पूरे मन से जीना और देना ही सच्चा ज्ञान था। उसने आँखें बंद कीं। हवा में खेतों से आती हरी फसल की मधुर गंध थी। और रामकिशोर के होंठों पर एक शांत मुस्कान थी।




