समुद्र के किनारे बसा तूर नगर उस समय विश्व का हृदय था। यहाँ से जहाज़ रवाना होते, सोना-चाँदी, बहुमूल्य कपड़े, दुर्लभ मसाले, और अनगिनत देशों के सौदागरों की आवाज़ें हवा में तैरती रहती थीं। शहर की नींव धन पर टिकी थी, और उसका घमंड आकाश को छूता था। लोग कहते, “तूर अविनाशी है। समुद्र की लहरें जहाँ तक जाती हैं, तूर की महिमा वहाँ तक पहुँचती है।”
लेकिन एक दिन, दूर देश सिदोन से आए एक यात्री ने बाज़ार में चुपचप एक खबर फैलाई। उसने कहा, “कित्तीम द्वीप के लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं। उनके जहाज़ खाली लौट रहे हैं।” बात धीरे-धीरे फैली। फिर एक सुबह, समुद्र के किनारे जमा हुए मछुआरों ने देखा – सामान्य दिनों की भीड़-भाड़ वाला समुद्री मार्ग सुनसान पड़ा था। एक भी पाल दिखाई नहीं दे रही थी। सिर्फ़ नीरस लहरें तट से टकरा रही थीं, मानो शहर को शोक सन्देश सुना रही हों।
शहर के बुजुर्ग, जिनके हाथों में सोने के छल्ले चमकते थे, महल के ऊँचे बुर्ज पर इकट्ठा हुए। उनकी आँखें उत्तर की ओर थीं, जहाँ से सिदोन के व्यापारी आया करते थे। एक ने कंपकंपाती आवाज़ में कहा, “सागर ने, जो हमारी माता थी, अपने को खाली कर दिया है। सिदोन का किला, जो सौदागरों से भरा रहता था, अब मौन है। समुद्र के पार बसे देशों ने, जिन्हें तूर ने समृद्ध किया, अब अपने द्वार बंद कर लिए हैं।”
तूर की धरती काँप उठी। समुद्र तट पर बने गोदाम, जो कभी अनमोल सामान से अटे पड़े रहते थे, अब केवल गूँजती खालीपन की आवाज़ें देते थे। बंदरगाह के मजदूर, जिनकी माँसपेशियाँ माल ढोने से पुख्ता थीं, अब बेकार घूम रहे थे। उनके चेहरे पर हैरानी और डर था। शहर की दीवारों पर बैठी चीलें भी जैसे हैरान थीं – उनके भोजन के ढेर, यानी कचरे के ढेर, सूख गए थे।
तब शहर के गायकों और कवियों ने, जो कभी तूर की महिमा के गीत गाते थे, एक नया विलाप शुरू किया। वे रेशमी वस्त्र पहने, अपने साज़ लिए, खाली बंदरगाह की ओर मुख करके बैठ गए। उनकी आवाज़ में एक तीखा दर्द था, “हे तूर, तेरी महिमा धूल में मिल गई। जो लोग समुद्र के रास्तों के ज्ञाता थे, वे अब गुमनामी के अँधेरे में खो गए हैं। तेरे व्यापार ने दुनिया के राजाओं को धनवान बनाया, उन्हें विलासिता दी। अब वही धन उन पर कलंक बन गया है।”
शहर की राजकुमारियाँ, जो कभी महीन सन के कपड़े और सोने के आभूषण पहनती थीं, अब सादे वस्त्रों में अपने महलों की खिड़कियों से समुद्र को देख रही थीं। उनकी आँखों में आँसू नहीं, एक सूनापन था। एक गहरी, दबी हुई पीड़ा, जो रोने से भी बड़ी थी। उनके पिता, सौदागर और सरदार, अपने मंदिरों में गए, लेकिन उनके देवताओं ने कोई उत्तर नहीं दिया। बाल देवता का मंदिर, जिसकी दीवारें फिरौती के धन से जड़ी थीं, एक भयानक मौन में डूबा था।
फिर एक दिन, समाचार आया। एक दूर देश, एक ऐसा साम्राज्य जिसका नाम लेते ही लोग काँप उठते थे, उसने तूर को नष्ट करने का संकल्प लिया था। यहोवा, स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता, ने इस विपत्ति की आज्ञा दी थी। उसने कहा था, “तूर, जो अपने घमंड में चूर था, जिसने कहा था कि मैं अमर हूँ, उसे अपने भव्य महलों और बाज़ारों सहित धूल चटाई जाएगी। यह इसलिए कि मनुष्य अपनी शक्ति पर नहीं, बल्कि स्वर्ग के प्रभु पर गर्व करे।”
तूर के लोगों ने जब अपने शहर के चारों ओर दुश्मन के जहाज़ों के पाल देखे, तो वे समझ गए। यह केवल किसी राजा का कोप नहीं था। यह उस सृष्टिकर्ता का निर्णय था, जिसे उन्होंने भुला दिया था। उनकी समृद्धि ही उनके पतन का कारण बनी। बंदरगाह में आग लग गई। जहाज़, जो कभी समुद्री रास्तों के राजा थे, लपटों के शिकार हो गए। धुआँ आकाश में इस तरह उठा, मानो स्वयं शहर का प्राण निकल रहा हो।
सत्तर वर्षों तक तूर एक गीत बनकर रह गया। लोग उसके बारे में गाते, एक ऐसी किंवदंती की तरह जो सच थी। नाविक अपनी कहानियों में कहते, “वहाँ जाओ मत, वह भूतों का शहर है।” लेकिन यहोवा की दया असीम है। भविष्यवक्ता की वाणी ने कहा, “सत्तर वर्ष बीत जाएँगे, और तूर फिर से अपने गीत गाएगा। उसकी वीणा पर धूल पड़ी रहेगी, लेकिन उसे साफ़ किया जाएगा। वह फिर से व्यापार करेगा, लेकिन इस बार उसकी कमाई यहोवा के लोगों, उसके विश्वासियों के लिए होगी। उसका धन और व्यापार पवित्र होगा, प्रभु के सामने स्वीकार्य होगा।”
क्योंकि परमेश्वर का न्याय अंतिम नहीं होता। उसकी योजना में विध्वंस के बाद पुनर्निर्माण है, शोक के बाद सांत्वना है। तूर का पतन एक चेतावनी थी, और उसका भविष्य में फिर से उठना, अनुग्रह की एक मधुर झलक।




