पवित्र बाइबल

अहंकार का पतन

तूर के राजा के विषय में एक वृत्तांत है, जो समुद्र के किनारे बसा एक व्यापारिक नगर था। उसकी गलियाँ शुद्ध सोने से पटी थीं, और उसके बाज़ारों में ऐसे माणिक और पन्ने बिकते थे, जिनकी चमक सूर्य के प्रकाश में झील के जल जैसी तरल और गहरी लगती थी। राजा स्वयं बुद्धि में अद्वितीय था; उसके विचार इतने गहरे और परिष्कृत थे कि उसके दरबार के ज्योतिषी और दार्शनिक भी कई बार उसकी बातों का अर्थ नहीं उतार पाते थे। वह सिंहासन पर ऐसे विराजमान होता, मानो वह सृष्टि के रहस्यों को जानने वाला कोई अदृश्य देवदूत हो। उसके वस्त्र बेबीलोन के बुनकरों के श्रेष्ठतम रेशम से बने होते, और उसके मुकुट में जड़े हुए नीलम इतने विशाल थे कि उनमें से देखने पर आकाश का एक टुकड़ा सा दिखाई देता था।

पर एक बात थी जो धीरे-धीरे उसके हृदय में ज़हर की तरह घुलने लगी। यह समझ कि वह सब कुछ जानता है, यह भाव कि उसकी बुद्धि अथाह है, उसे एक ऐसे मोड़ पर ले आई जहाँ से लौटना कठिन था। वह अपने महल के उस ऊँचे कक्ष में बैठता, जहाँ से समुद्र का विस्तार और नगर की समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती थी, और मन ही मन सोचता: “क्या यह सब मेरी ही प्रतिभा का फल नहीं है? क्या मैंने ही इन जहाज़ों को दूर-दूर के देशों में व्यापार करने भेजा? क्या मैंने ही इस नगर को सोने और रत्नों से भर दिया?” उसकी आँखों में एक अजीब सा अहंकार टिमटिमाने लगा, वह अहंकार जो प्रारंभ में तो एक धुंधली छाया की तरह होता है, पर धीरे-धीरे सूर्य को ढक लेने वाले बादल का रूप ले लेता है।

और फिर वह दिन आया जब उसने स्वयं को देवता घोषित कर दिया। उसने कहा, “मैं एक ईश्वर हूँ, मैं दिव्य सागर के मध्य विराजमान हूँ।” उसने ईश्वर के परमपवित्र पर्वत की बात सुनी थी, और अब वह स्वयं को उसका अधिपति समझने लगा। उसके हृदय में व्यापार की चतुराई, पदार्थों का ज्ञान, और कला-कौशल की प्रवीणता — ये सब एक विषैले मिश्रण में बदल गए। वह भूल गया कि ये सब उसे एक ऊपर वाले से प्राप्त हुए थे। वह तो केवल एक मनुष्य था, जिसे किसी ने यह सब सौंपा था, पर अब वह स्वयं को सृष्टिकर्ता समझ बैठा था।

तब परमेश्वर का वचन उसके पास पहुँचा, एक ऐसा संदेश जो आँधी की तरह आया और उसके सारे गर्व को धूल में मिला देने वाला था। वह वचन कहता था: “तू अपने हृदय में कहता है, ‘मैं ईश्वर हूँ,’ जबकि तू मनुष्य है, ईश्वर नहीं। तेरी बुद्धि और तेरा सौंदर्य तुझे भ्रष्ट कर गए हैं।” और फिर एक पुरानी याद दिलाई गई, एक ऐसा दृश्य जो समय के आरंभ का था। तूर का राजा केवल एक राजा नहीं था; उसकी कहानी एक और, गहरी कहानी की ओर संकेत करती थी — एक दिव्य दूत की, जो सिद्ध और निष्कलंक था, जो परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर चलता था, जिसके वस्त्र सब प्रकार के रत्नों से जड़े हुए थे। वह ज्ञान का खजाना था, वह सुंदरता का प्रतिबिंब था। पर उसने भी अपनी सुंदरता के कारण बुराई की। अपनी प्रतिभा के अहंकार में, वह भ्रष्ट हो गया। और उसका अंत निकट आ गया।

तूर के राजा के लिए भी वही न्याय खड़ा हो गया। वे विदेशी लोग आए, जो तलवार चलाने में निपुण और दया से रहित थे। वे उस सुंदर नगर में घुस आए, जो अब केवल सोने का पिंजरा बनकर रह गया था। राजा का वह गर्व, वह अहंकार, उसकी बुद्धि की चमक — सब कुछ उसी क्षण धूमिल हो गया, जब एक सैनिक की तलवार ने उसके रत्नजड़ित वस्त्रों को चीर डाला। वह महल, जो कभी संगीत और उत्सव से गूंजता था, अब केवल चीखों और ध्वंस की आवाज़ से भर गया। समुद्र की लहरें, जो कभी व्यापारिक जहाज़ों के स्वागत में गीत गाती प्रतीत होती थीं, अब केवल टूटते हुए तख्तों और डूबते हुए धन का शोकगीत गा रही थीं।

और राजा? वह अब नगर के खंडहरों के बीच, धूल और राख पर पड़ा हुआ था। उसका सारा सौंदर्य, उसकी सारी बुद्धि, उसकी सारी संपदा — सब कुछ उसी धूल में मिल चुका था, जिसे वह कभी अपने पैरों से ठुकराता था। वह जो स्वयं को ईश्वर समझता था, वह अब एक टूटे हुए, निस्सहाय मनुष्य से अधिक कुछ नहीं था। उसकी आँखें अब उस विस्तृत, नीले आकाश की ओर देख रही थीं, जिसे वह कभी अपना मानता था, और शायद उसने तब समझा होगा कि असली सिंहासन कहीं और है, किसी और का है। और वह समुद्र, जिसे वह अपना दिव्य सागर कहता था, उसकी लहरें अब केवल एक सबक दोहरा रही थीं: हर अहंकार, चाहे वह कितना भी चमकीला क्यों न हो, एक दिन धूल में मिल जाता है। और ईश्वर के सामने, सारी मनुष्य की बुद्धि और सारा मनुष्य का गर्व, केवल एक क्षणभंगुर छाया है।

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